Editorial: Faces and Colours - Jansatta
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चेहरे और रंग

निखिल आनंद गिरि संपादन या एडिटिंग एक कमाल का कौशल है। ऐसा कह सकते हैं कि संपादन कला के माध्यम से अखबारी लेखन हो या किताबी, मौलिक लेखन कई बार एक तरह से ‘मौलिक’ नहीं रह जाता! अशुद्धियां दूर हो जाती हैं और लेख निखर कर सामने आता है। आज के दौर में इसी सिद्धांत […]

Author December 12, 2014 1:40 PM

निखिल आनंद गिरि

संपादन या एडिटिंग एक कमाल का कौशल है। ऐसा कह सकते हैं कि संपादन कला के माध्यम से अखबारी लेखन हो या किताबी, मौलिक लेखन कई बार एक तरह से ‘मौलिक’ नहीं रह जाता! अशुद्धियां दूर हो जाती हैं और लेख निखर कर सामने आता है। आज के दौर में इसी सिद्धांत पर तस्वीरों और वीडियो का भी पूरा व्यापार टिका है। जो जैसा है, वैसा ही दिखने लगे तो उपभोग की दृष्टि से शायद उतना आकर्षक न रह जाए। ‘सेल्फी’, यानी मोबाइल कैमरे या फिर किसी अन्य कैमरे से अपनी तस्वीर उतारने के नए चलन ने न सिर्फ पूरी दुनिया को एक कर दिया है, संपादन की इस तकनीक को भी पराकाष्ठा पर पहुंचा दिया है। आप सौ तस्वीरें खींचिए और उनमें से सबसे ठीक को चुन कर अपने चेहरे के तमाम दाग-धब्बे, तिल-मस्से एक डिजिटल आदेश की मदद से ‘डिलीट’ कर दीजिए, यानी मिटा दीजिए। फिर जितना हो सके, उतना उजाला अपने चेहरे पर भर लीजिए। इतनी सफेदी कि वही चेहरा कोई सामने से देखे और सोशल मीडिया के किसी मंच पर दिखे, तो लगे कि दो अलग-अलग चेहरे हैं। मगर किसी को अब तक ‘सेल्फी’ में अपने असली रंग से फीके रंग की तरफ जाते नहीं देखा या फिर गोरे से काले की ओर। जब संपादन में यह सुविधा है तो फिर हम ऐसा क्यों नहीं करते?

दरअसल, यह एक मानसिकता है जिसमें काले से सफेद की ओर जाना तो हमने सीखा है, सफेद या गोरे से काले की ओर आना हमारा मन-मिजाज खराब कर देता है। इतना कि हम रंग से होते हुए क्षेत्र, जाति, संप्रदाय, लिंग जैसे तमाम मामलों में बेहद आत्ममुग्ध, कुंठित और हिंसक होते जाते हैं। इतना कि हम अपने घर, पड़ोस या मोहल्ले में भाइयों, बेटों, रिश्तेदारों के लिए सिर्फ ‘मिल्की वाइट’, यानी दूधिया गोरी बहुएं ही ढूंढ़ते हैं! इतना कि हमारे घर में छोड़िए, पूरे मोहल्ले में कोई अफ्रीकी मूल का अश्वेत दिख जाए तो उसे हर तरीके से अपने समाज के लिए खतरा बता कर बेदखल कर देते हैं! इतनी कि हम देश की राजधानी के सबसे व्यस्त मेट्रो स्टेशन पर तीन अश्वेत मूल के लोगों को बिना सुने-समझे पीट-पीट कर अधमरा कर देते हैं। कई बार तो मार भी डालते हैं। दिल्ली के लाजपतनगर में पूर्वोत्तर के छात्र नीडो की ‘हत्या’ ज्यादा पुरानी नहीं है। मेरे कई दोस्त ऐसे हैं जो मुझ जैसा कोई चेहरा दिख जाए तो उसे दोस्ती के नाम पर ‘साउथ इंडियन’ कह-कह कर चिढ़ाते हैं। झारखंड में था तो ‘आदिवासी टाइप’ कह कर चिढ़ाते थे। कोई ज्यादा काला दिख जाए तो ‘वेस्टइंडीज वाला’ कह कर बुलाते हैं। ऐसे में ‘सेल्फी युग’ में हर कोई गोरा ही दिखना क्यों चाहता है, समझना मुश्किल नहीं है।

रंग सिर्फ एक पैमाना भर है। तेजाब से लड़की का चेहरा खराब कर देना या फिर सरेआम किसी दूसरे संप्रदाय का मखौल उड़ाना या फिर आतंकवादी करार देना इसी मानसिकता से निकली हुई कई जहरीली शाखाएं हैं, जिस पर ध्यान तो सबका जाता है, लेकिन इलाज कोई नहीं चाहता। हम अपनी-अपनी क्षमताओं के हिसाब से अपनी ये कुंठाएं दबाते रहते हैं। बाजार और राजनीति इसे दबाए रखना नहीं चाहते। टीवी पर समाचार चैनलों के स्टूडियो हों या तमाम टीवी धारावाहिकों के सेट, इतना उजाला लिए रहते हैं कि लगता है यह कोई और दुनिया है, जहां सफेद रंग का विलोम सिर्फ सफेद रंग ही हो सकता है। ‘स्टार प्लस’ टीवी चैनल के मशहूर धारावाहिक ‘सुहानी सी एक लड़की’ में एक दादी है, जिनकी तीन बहुएं हैं। दो गोरी और एक सांवली। सांवली बहू को दादी घर का कोई शुभ काम नहीं करने देती। उसके लिए गोरा होने की महंगी से महंगी क्रीम और लोशन मंगवाती है। सांवली बहू घर में जगह बनाने के लिए संघर्ष करती रहती है। ऐसे दर्जनों उदाहरण हैं।

यही हाल राजनीति का भी है। युवा आबादी की ओर इतनी उम्मीद से देखने वाले प्रधानमंत्री महोदय कभी इन मुद्दों पर युवाओं को चेताते नहीं हैं। उन्हें आईना नहीं दिखाते। सवाल है कि आईना कौन दिखाएगा? जो प्रेम कहानियों में ‘जिहाद’ या बलात्कारों में बेटों की ‘मामूली गलतियां’ ढूंढ़ते रहते हैं, उनसे ज्यादा उम्मीद भी ठीक नहीं। शेक्सपियर अगर आज सोशल मीडिया पर होते तो काली प्रेमिकाओं पर गीत लिखने के लिए उन्हें काले चेहरे ही नहीं मिलते। उन्हें इस सांवले देश में भी आईना लेकर भटकना पड़ता। काले चेहरे डरा-धमका कर, मजाक बना कर छिपा दिए गए हैं। ये ग्लोबल होने की पहली शर्त है!

 

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