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गांव का चेहरा

उमेश चतुर्वेदी जनसत्ता 30 सितंबर, 2014: कुछ घरेलू मजबूरियों के चलते पूर्वी उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में स्थित अपने गांव जाना पड़ा। ऐसा नहीं कि गांव हमें नहीं बुलाता। दरअसल, जिस नागर सभ्यता में हम रहते हैं, उसमें अब मजबूरियां ही हमें गांव की तरफ धकेलती हैं। हमारे नॉस्टेल्जिया में स्थित गांव बड़ा सुंदर […]

Author September 30, 2014 10:34 AM

उमेश चतुर्वेदी

जनसत्ता 30 सितंबर, 2014: कुछ घरेलू मजबूरियों के चलते पूर्वी उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में स्थित अपने गांव जाना पड़ा। ऐसा नहीं कि गांव हमें नहीं बुलाता। दरअसल, जिस नागर सभ्यता में हम रहते हैं, उसमें अब मजबूरियां ही हमें गांव की तरफ धकेलती हैं। हमारे नॉस्टेल्जिया में स्थित गांव बड़ा सुंदर है। वहां बेशक गरीबी है, आधुनिकता के साजो-सामान नहीं हैं, लेकिन सांस्कृतिक तौर पर वे बेहद धनी हैं। उन गांवों में अभाव तो है, लेकिन अवसाद नहीं है। हम गांव लौटते हैं तो अपने नॉस्टेल्जिया के ही गांवों को तलाशते हैं। मगर जब वह गांव नहीं मिलता तब हमें सांस्कृतिक झटका-सा लगता है और फिर मन में उदासी भर जाती है। इस उदासी से बचाव का रास्ता आखिरकार उसी शहर की तरफ दौड़ के साथ खत्म होता है, जिससे पीछा छुड़ा कर हम गांव की तरफ लौटने की कोशिश करते हैं।

बदलाव प्रकृति का अटूट नियम है। लिहाजा गांवों में आ रहे बदलाव को भी उन्हीं अर्थों में लिया जाना चाहिए। लेकिन लगता नहीं कि गांवों में रहने वाले लोग इस नियम की सैद्धांतिकी को उसी पैमाने पर समझते हैं। इस आधार पर पता नहीं कितने लोग गांवों को स्वीकार करते हैं। हालांकि इतना तय है कि उन्होंने बदलाव को स्वीकार ही नहीं किया है, बल्कि आगे बढ़ कर इसका स्वागत भी कर रहे हैं। लेकिन यह पूरा का पूरा बदलाव भौतिकता की निजी परिधि तक सीमित है। इसीलिए उन गांवों में भी ऐसे बदलाव को अंगीकृत किया जा रहा है, जहां मौजूदा अवधारणाओं के मुताबिक विकास नहीं पहुंच पाया है। यानी सड़क। चाहे गांव के बगल से गुजरने वाला राज्य उच्च-पथ हो या फिर प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत बना बारहमासी संपर्क मार्ग या फिर मुहल्ले की सड़क या खड़ंजा- सभी प्लास्टिक कचरे, गोबर, दुर्गंध और घरों से निकलने वाले अपशिष्ट गंदे जल से बजबजा रहे हैं। यह अलग बात है कि इस गंदगी के लिए जिम्मेदार लोगों के घर में मोटरसाइकिल और कहीं-कहीं कारें भी दिख जाती हैं। फ्रिज और टीवी तो खैर है ही, बिजली हो या नहीं।

गांवों में लगातार पक्के मकान बन रहे हैं। उन्हें भी विकास और समृद्धि का पैमाना माना जाने लगा है। बेशक इन मकानों की उपयोगिता तेज बरसात के दौरान समझ में आती है। लेकिन बिजलीविहीन तेज गरमी बताती है कि इन मकानों से फायदा कितना है। किसी भट्ठी की तरह तपते इन मकानों में उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और मध्यप्रदेश की करोड़ों की जनसंख्या लगातार गरमी झेलने को अभिशप्त है या फिर लोगों ने इसे अपनी आदत में ढाल लिया है। फिर भी पक्के मकान के रूप में विकास का यह पैमाना बना हुआ है। किसी ने यह सोचने की जरूरत नहीं समझी कि रहने के लिए तो ठीक, लेकिन इस तरह के तकलीफदेह मकान आखिर क्यों! शहर तो इससे जूझ ही रहे हैं, सुकून के रूप में देखे जाने वाले हमारे गांव भी उसी मुश्किल में खुद को क्यों झोक रहे हैं? क्या गांवों की आबोहवा के अनुकूल कोई घर नहीं तैयार किया जा सकता? पर्यावरण के मुद्दे पर काम करने वाले कुछ स्वयंसेवी संगठनों ने ऐसे मकानों की उपयोगिता पर सवाल उठाए हैं। दरअसल, शहरी मॉडल पर आधारित आवासीय घरों के लिए चौबीसों घंटे बिजली अनिवार्य है। तभी इनमें रहने वाले लोगों को सुविधाजनक जिंदगी मिल सकती है। लेकिन सच यह भी है कि इन मकानों ने हमें प्रकृति से दूर किया है। जिन घरों में खर्च कम आए और सर्दी-गरमी से बचाव के लिए बिजली की जरूरत भी कम पड़े, वैसे घरों के निर्माण में सरकार का ध्यान नहीं जाता। नागरिक समुदाय तो इसे लेकर लापरवाह दिखता ही है।

आज गांवों की ओर रुख करते ही लगता है कि वे शहर की नकल बनने की कोशिश में हैं। इस कोशिश में गांव अब गांव नहीं रह गए हैं और न ही वे शहर बन पाए हैं। हमारे राजनीतिक उन गांवों को शहर बनने का सपना दिखा भी रहे हैं और उसी तरफ गांवों को धकेल भी रहे हैं। लेकिन मौजूदा गरमी में उबलते आलू की तरह पक्के मकानों में रह रही करोड़ों की ग्रामीण जनसंख्या को जागने और कम से कम गांवों के लिए अलग तरह के विकास मॉडल के बारे में सोचने का वक्त आ गया है। अगर ऐसा नहीं हुआ तो हम जिस श्रेष्ठ भारत का सपना देख रहे हैं, वह शायद ही पूरा हो पाएगा। इस दौड़ में गांव पीछे रह जाएंगे और शहर तेजी से आगे बढ़ते गांवों को बजबजाने, उबलने के लिए पीछे छोड़ता रहेगा।

 

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