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एक अघोषित हत्याकांड

राजकिशोर जनसत्ता 22 सितंबर, 2014: भारत की गायों ने नरेंद्र मोदी को वोट नहीं दिया है। न ही भैंसों और सूअरों ने। बकरों और मछलियों ने भी नहीं। लेकिन नरेंद्र मोदी की जिम्मेदारी सिर्फ उनके प्रति नहीं है, जिन्होंने उन्हें वोट दिया है या जिनके पास वोट का अधिकार है। इनके कोलाहल को तो हम […]

Author September 22, 2014 1:13 PM

राजकिशोर

जनसत्ता 22 सितंबर, 2014: भारत की गायों ने नरेंद्र मोदी को वोट नहीं दिया है। न ही भैंसों और सूअरों ने। बकरों और मछलियों ने भी नहीं। लेकिन नरेंद्र मोदी की जिम्मेदारी सिर्फ उनके प्रति नहीं है, जिन्होंने उन्हें वोट दिया है या जिनके पास वोट का अधिकार है। इनके कोलाहल को तो हम रात-दिन सुनते रहते हैं और इसी कहने-सुनने को लोकतंत्र मानते हैं। प्रधानमंत्री मोदी की जिम्मेदारी उनके प्रति भी है, जो मूक हैं। गंगा उनमें से एक है। अगर नदियां सांस लेती हैं, तो गंगा का दम बीसियों साल से घुट रहा है। यह संयोग ही था कि मोदी ने वाराणसी से चुनाव लड़ा और गंगा की गंदगी उन्हें दिखाई पड़ गई। गंगा का यह क्षेत्र अब प्रधानमंत्री का स्थायी चुनाव क्षेत्र बन गया लगता है। वे अगर आगरा से चुनाव लड़ते, तो आज यमुना की सफाई हो रही होती। कौन कहता है कि भौगोलिक दूरी का कोई महत्त्व नहीं रह गया है?
कल्पना कीजिए कि अगर अनपढ़ और पढ़ों द्वारा खाद्य माने जाने वाले जानवरों को मताधिकार होता, तो वे किसे वोट देते? उनका वोट उस पार्टी के लिए होता जो यह वादा करती कि हम सरकार बनाएंगे, तो पशुओं को आहार बनाने के सिलसिले को खत्म कर देंगे; जो लोग खुद बकरा, गाय या भैंसा मार कर खाना चाहते हैं, उन्हें इसकी आजादी होगी, लेकिन पशु मांस का व्यापार- और निर्यात- हम तुरंत रोक देंगे। अगर कोई भी दल इस तरह का आश्वासन नहीं देता, तो पशु एनओए (इनमें से किसी को भी नहीं) का प्रयोग करते। वैसे हमारे नेताओं के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता। वे पशु हत्या को रोकने का वादा करेंगे और जीत जाने पर सबसे पहले अपने दोस्तों को चिकन या मटन बिरयानी की दावत देंगे। लोगों द्वारा आपत्ति करने पर वे कहेंगे, मेरे पास जादू की छड़ी नहीं है कि एक दिन में सब ठीक कर दूं।
भारत की छवि एक अहिंसक देश की रही है। अब भी यहां अन्य किसी भी देश के मुकाबले आदतन शाकाहारी लोगों की संख्या बहुत ज्यादा है। कई-कई राज्य ऐसे हैं जहां जाने पर मांसाहारियों को झुंझलाना पड़ेगा, क्योंकि वहां के नब्बे प्रतिशत होटलों या ढाबों के मेन्यू में मांस का कोई व्यंजन नहीं है। यह भी प्रसिद्ध है कि भारत ने अपनी स्वतंत्रता अहिंसक संघर्ष से पाया है। इस महाझूठ की पोल तब खुली जब देश विभाजन के दिनों में लाखों लोगों ने लाखों लोगों की जान ली और हजारों स्त्रियों को अगवा किया और उन्हें हिंदू या मुसलमान बना कर घर में रख लिया।
भारतीय संविधान (26 जनवरी, 1950 से लागू) की रचना करने वाले हमारे पूर्वजों ने अनुच्छेद 48 में लिखा: राज्य, कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने का प्रयास करेगा और विशिष्टतया गायों, बछड़ों और अन्य दुधारू और वाहक पशुओं की नस्लों के परिरक्षण और सुधार के लिए और उनके वध का प्रतिषेध करने के लिए कदम उठाएगा। इसके रूबरू तथ्य यह है कि 1912 में हमने लगभग साढ़े तीन करोड़ टन बीफ का उत्पादन किया। इसमें से करीब दो करोड़ टन मांस हमने खुद भखा और डेढ़ करोड़ टन विदेशियों के भखने के लिए भेज दिया। विश्व भर के बीफ उत्पादन में हमारा स्थान पांचवां, बीफ खाने में सातवां और बीफ का निर्यात करने में अव्वल है। मेरा अनुमान है कि बीफ का इतना निर्यात होने की वजह यह है कि अब भी हमारे देश में बहुमत शाकाहारियों का है। मांसाहार की आदत जिस तेजी से बढ़ रही है, उसे देखते हुए दावा किया जा सकता है कि दस-पंद्रह साल के बाद हम बीफ का निर्यात नहीं, आयात करने लगेंगे।
इस मामले में नरेंद्र मोदी से क्या उम्मीद की जाए, क्योंकि उनके द्वारा विकसित गुजरात में पिछले दस वर्षों में मांस का उत्पादन दोगुने से ज्यादा हो गया है। वहां उनतालीस बूचड़खाने हैं, जहां रोज एक हजार से ज्यादा पशुओं की हत्या होती है। एक अदद चिंकारे का शिकार करने पर सलमान खान कभी भी जेल जा सकते हैं, पर रोज लाखों पशुओं की हत्या के लिए कोई दोषी नहीं है। जिन जातियों में गोश्त का रिवाज है, उनके पूर्वजों के पास कोई विकल्प नहीं रहा होगा, लेकिन उनके गुजरने के बाद सभ्यता- भारतीय सभ्यता को शामिल करते हुए- में कुछ भी प्रगति नहीं हुई है? बेशक पशु प्रबंधन राज्य सरकार का विषय है और अनेक राज्यों ने कानून भी बनाए हैं, पर नरेंद्र मोदी यह तो घोषित कर ही सकते हैं कि आज से भारत विदेशों में मांस नहीं बेचेगा। उनसे हम अनुरोध करते हैं कि वे राष्ट्र को यह पवित्र उपहार दें।

 

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