स्वच्छता का परदा

विनोद कुमार पिछले कुछ समय से स्वच्छता और सफाई को लेकर अजीब तमाशा हो रहा है। मोदीजी ने आह्वान किया और लोग निकल पड़े झाड़ू लेकर सड़कों पर। मानो इसी की प्रतीक्षा कर रहे थे। झाड़ू के साथ कैमरों का भी इंतजाम किया गया है और इसमें नेता, अधिकारी, एनजीओ के लोग, सभी शामिल हो […]

विनोद कुमार
पिछले कुछ समय से स्वच्छता और सफाई को लेकर अजीब तमाशा हो रहा है। मोदीजी ने आह्वान किया और लोग निकल पड़े झाड़ू लेकर सड़कों पर। मानो इसी की प्रतीक्षा कर रहे थे। झाड़ू के साथ कैमरों का भी इंतजाम किया गया है और इसमें नेता, अधिकारी, एनजीओ के लोग, सभी शामिल हो गए हैं। लेकिन यह उत्साह कितने दिन कायम रहेगा, कहना मुश्किल है। सफाई का संबंध थोड़ा बहुत विपन्नता और बढ़ती आबादी से है, लेकिन सबसे अधिक हमारी मानसिक बनावट से है, जिसका गठन सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक बुनावट से होता है। सूत्र रूप में कहें तो जब तक हम अपने दिमाग की सफाई नहीं करते, तब तक घर के भीतर और बाहर भी साफ-सफाई नहीं रख सकते।

मसलन, हमें इस बात को ईमानदारी से स्वीकार करना होगा कि कमोेबेश सफाई की समस्या तो देश भर में है, लेकिन सबसे गंभीर रूप में यह हिंदी पट्टी की है। उस भौगोलिक क्षेत्र की, जिसे हम मनुवादी क्षेत्र के रूप में भी चिह्नित कर सकते हैं। पर्वतीय अंचलों में सफाई की वैसी गंभीर समस्या नहीं। दक्षिण के राज्य, चाहे वह केरल हो, कर्नाटक, तमिलनाडु या फिर आंध्र प्रदेश, उत्तर भारत की तरह गंदगी से पटे नहीं। मथुरा-वृंदावन से लेकर इलाहाबाद, कानपुर, बनारस, बिहार के भागलपुर, मुंगेर, गया आदि को याद कीजिए। बजबजाती नालियां, कचरे से पटे चौक-चौराहे, बेखौफ घूमते नंदी और फिर इन शहरों के सरकारी दफ्तर, जिनकी दीवारें पीकदान बनी नजर आती हैं! कहीं भी ‘पिच्च’ से थूक देने की फितरत हिंदी पट्टी की खास पहचान है। गैर हिंदी भाषी इलाकों, राज्यों में आमतौर पर ऐसा नहीं।

वर्षों पहले ‘राग दरबारी’ में हिंदी पट्टी की झलक हमें श्रीलाल शुक्ल दिखा चुके हैं। वह है सुबह के धुंधलके में जब कोई लंबी दूरी की बस किसी कस्बे में प्रवेश करती है तो उसकी रोशनी में दूर तक गठरी बनी औरतें एक कतार में शौच आदि से निबटती नजर आती हैं, जो हड़बड़ा कर मुंह फेर कर अपनी जगह पर खड़ी हो जाती हैं। अपनी लज्जा बचाने का उनके पास कोई दूसरा रास्ता नहीं होता। यों एक जमाने में दिल्ली के गौतमनगर की रिहायशी कॉलोनी में भी भारी-भरकम बदन वाले पुरुषों को हमने छोटी-छोटी बोतलों में पानी लेकर सुबह की भागमभाग में देखा है। लेकिन ग्रामीण इलाकों में गठरी बनी महिलाओं के संकट के कुछ ठोस वस्तुगत कारण हैं। दलित और अति पिछड़े समुदाय के लोगों के पास इतनी जमीन नहीं रहती कि वे अपनी झोपड़ी भी खड़ी कर सकें। शौचालय बनाने की तो बात दूर। पहले सार्वजनिक वनखंड, परती जमीन, चरागाह आदि होते थे। अब तो इंच-इंच जमीन पर दबंगों का कब्जा है। ले-देकर बचते हैं सड़कों के किनारे के क्षेत्र, जिनका इस्तेमाल शौच आदि के लिए होता है। लूट-खसोट के लिए सड़क किनारे की बनी नालियों का इस्तेमाल इसी रूप में होता है। मोदी के आह्वान का यहां कितना असर होगा!

वर्णाश्रम धर्म से आक्रांत भारतीय समाज की एक गंभीर समस्या यह भी है कि हमारे यहां सदियों से सफाई का काम या यों कहिए कि सभी तरह का शारीरिक श्रम दलित जातियों के जिम्मे है, हमारे घरों के संडास से लेकर सड़कों, बजबजाती गलियों और चौक-चौराहों की सफाई तक। बहुत सारे कानून बने, सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन और संघर्ष हुए, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी वही है। यानी सफाई का काम दलितों के जिम्मे। हमारी सभ्यता की सारी चमक, शानो-शौकत उनके अमानवीय श्रम और जीवन पर ही निर्भर है। कोई शक हो तो नगरपालिकाओं में काम करने वाले, हमारे सेप्टी-टैंकों को साफ करने वाले कर्मचारियों, बजबजाती नालियों की सफाई करते लोगों की जाति की गणना करवा लीजिए। उनमें नब्बे फीसद दलित और कुछ अति पिछड़ी जातियों के लोग ही मिलेंगे। एक साजिश के तहत इस निम्नतम काम का पारिश्रमिक भी न्यूनतम। अधिकतर सफाई कर्मचारी दिहाड़ी मजदूर, जबकि सफाई कार्य एक नियमित प्रकृति का काम है। बिहार के मुंगेर में नीतीश कुमार के मुख्यमंत्रित्व काल में जब सफाई कर्मचारियों ने वेतन वृद्धि आदि के लिए आंदोलन किया तो उन्हें दौड़ा-दौड़ा कर पीटा गया- ‘कैसे काम नहीं करोगे!’

आमतौर पर हमारी सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था के निचले पायदान के इन लोगों के पास जीवन-यापन का कोई दूसरा विकल्प भी नहीं। इसलिए इन हालात में भी वे काम करने के लिए मजबूर रहते हैं और जीवन से इस कदर बेजार हो जाते हैं कि स्वच्छता और शुचिता को लेकर अजीब तरह की उदासीनता उनमें भर जाती है। इस मनोस्थिति से उबरने का उनके पास एक ही तरीका रह जाता है, वह है नशाखोरी। अगर सफाई कर्मचारियों को भी सम्मानजनक वेतन सुविधाएं मिलतीं तो अन्य जातियों के लोग भी शायद इस काम की तरफ प्रेरित होते। विकसित देशों में मानव श्रम की कीमत बढ़ने की वजह से सामाजिक भेदभाव भी टूटा है। लेकिन हमारे यहां तो आज भी निम्नतम काम और न्यूनतम पारिश्रमिक का सिद्धांत चल रहा है!

 

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