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भाईचारे की इमारत

महेंद्र राजा जैन बर्लिन में पिछले कुछ वर्षों से जगह-जगह आकाश छूती इमारतों के निर्माण कार्य के दौरान क्रेनों की कानफोड़ू आवाज से वहां के लोगों को बड़ी शिकायत रहती है। कार से आने-जाने वालों के लिए सबसे अधिक परेशानी इस कारण होती है कि जगह-जगह अस्थायी रूप से या तो रास्ता बदल दिया गया […]

महेंद्र राजा जैन

बर्लिन में पिछले कुछ वर्षों से जगह-जगह आकाश छूती इमारतों के निर्माण कार्य के दौरान क्रेनों की कानफोड़ू आवाज से वहां के लोगों को बड़ी शिकायत रहती है। कार से आने-जाने वालों के लिए सबसे अधिक परेशानी इस कारण होती है कि जगह-जगह अस्थायी रूप से या तो रास्ता बदल दिया गया है या कुछ सड़कों को एकल मार्ग बना दिया गया है। इस वजह से लोगों को गंतव्य तक पहुंचने में जहां पहले कुछ ही मिनट लगते थे, वहां अब कभी-कभी आधा घंटा या अधिक समय भी लग जाता है। इसके लिए वे बड़ी-बड़ी कंपनियों के साथ सरकार को भी दोष देते हैं कि जनसाधारण को होने वाली परेशानियों का खयाल किए बिना धुआंधार तरीके से निर्माण कार्य की स्वीकृति दे दी जाती है।

लेकिन अब एक इमारत ऐसी भी है जिसके निर्माण कार्य से लोगों को शिकायत की अपेक्षा खुशी ही अधिक होगी। कुछ ईसाई, मुसलिम और यहूदी संस्थाओं ने मिल कर एक ऐसी इमारत बनाने की योजना बनाई है, जहां इन तीनों संप्रदायों के लोग मिल कर एक साथ एक ही समय पूजा-उपासना कर सकें। पूरा बन जाने पर बर्लिन का यह ‘हॉउस आॅफ वन’ दुनिया भर में एक मात्र ऐसा स्थान होगा, जहां एक ही छत के नीचे मस्जिद, चर्च और सिनेगाग (यहूदी धर्मस्थल) होंगे। इस योजना के डिजाइन के लिए दो वर्ष पहले आयोजित प्रतियोगिता में बर्लिन की ही निर्माण कंपनी कुहें मालावेजी की डिजाइन पास की गई थी। इसके अनुसार तीनों धर्मों के अनुयायी अलग-अलग कमरों में पूजा-पाठ कर सकेंगे। इन तीनों कमरों से जुड़े हुए बत्तीस मीटर ऊंचे गुंबद के आकार की छत वाले हॉल की तरह चौथे कमरे का उपयोग तीनों धर्मावलंबियों के लिए आपस में वार्ताएं, मीटिंग आदि के लिए किया जाएगा। इसमें एक मुख्य बात यह है कि तीनों धर्मों के कमरों के लिए बराबर जगह दी गई है। इसका मुख्य उद्देश्य यही है कि सभी मतों के लोग अपने-अपने धर्मों में पूरा विश्वास रखते हुए दूसरों की आस्था का भी सम्मान करें।

इसके लिए सबसे बड़ी समस्या धन जुटाने की थी। यह तो संभव नहीं था कि तीनों संप्रदायों के लोग या संस्थाएं बराबर-बराबर योगदान करें, क्योंकि बर्लिन की वर्तमान तीन करोड़ तीस लाख की आबादी में सैंतीस फीसद ईसाई हैं, जो आर्थिक दृष्टि से सबसे अधिक संपन्न हैं। जबकि यहूदी मात्र 0.3 फीसद हैं जो सबसे अधिक कमजोर हैं। अगर बड़े दाताओं से इसके लिए सहयोग लिया जाता तो शक्ति-संतुलन निश्चित ही बदलता। इसलिए तय किया गया कि कोई भी व्यक्तिदस यूरो प्रति र्इंट के हिसाब से चाहे जितनी र्इंटें खरीद सकता है। आशा की गई है कि 2016 तक चार करोड़ पैंतीस लाख यूरो इकट्ठे हो जाएंगे। इस प्रोजेक्ट की घोषणा होते ही अब तक तीन सौ अठहत्तर लोगों से लगभग तीस हजार यूरो मिल चुके हैं। इस प्रोजेक्ट के प्रबंधक रोलेंड स्तोल्ट ने कहा है कि दो-चार बड़े दाताओं की अपेक्षा हजारों-लाखों छोटे लोगों का निवेश हमारे लिए अधिक महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि हमें केवल धन के बजाय इस बात पर अधिक ध्यान देना है कि हम ऐसे लोगों के बीच भाईचारा स्थापित करने जा रहे हैं जो अलग-अलग धर्म में विश्वास रखते हैं।

इस प्रोजेक्ट के प्रशंसकों के साथ ही आलोचकों की भी कमी नहीं है। कुछ लोगों का कहना है कि यह कोई नई बात नहीं है, क्योंकि इसके पहले भी इसी उद्देश्य को लेकर थोड़ा अलग तरह से कुछ प्रयास किए जा चुके हैं, लेकिन कोई सफल नहीं हुआ। अमेरिका में भी ओमाहा (नेब्रास्का) में इस प्रकार की त्रिधर्मी इमारत की योजना बनाई गई है जो शायद अगले वर्ष तक बन कर तैयार हो जाए। बहरहाल, जर्मन उपन्यासकार मार्टिन मोर्स्बाख की राय में बर्लिन में प्रस्तावित भवन की योजना मिस्र के फराओ की कब्र के समान ‘नारकर’ है। कुछ यहूदी लोगों ने भी इस प्रोजेक्ट की सफलता पर संदेह जाहिर किया है। इस पर इस परियोजना के प्रबंधक का कहना है कि आप कुछ भी क्यों न कीजिए, उसका विरोध तो होना ही है। इसलिए इन आलोचनाओं पर ध्यान न देकर हमें अपना काम करते रहना है। अगर निर्धारित समय तक चार करोड़ पैंतीस लाख यूरो इकट्ठा नहीं हो पाता है तो भी प्रोजेक्ट का काम शुरू कर दिया जाएगा। प्रस्तावित योजना का मूलभूत ढांचा तैयार करने के लिए अभी केवल एक करोड़ यूरो ही पर्याप्त हैं। यह कोई बहुत बड़ी रकम नहीं है।

 

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