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जनेर के गीत

पंकज कुमार झा जनसत्ता 7 अक्तूबर, 2014: बिहार में बाढ़ प्रभावित इलाकों में जब तटबंध और बांध नहीं बने थे, तब वहां के लोकजीवन में जनेर खेलना और उसके गीत गाने का खासा महत्त्व था। जनेर लोगों के बीच लोक-साहचर्य, सामाजिक पूंजी और सामुदायिक सहभागिता के अद्भुत रूपक के तौर पर स्थापित था। कोसी, कमला-बलान, […]

Author October 7, 2014 11:11 AM

पंकज कुमार झा

जनसत्ता 7 अक्तूबर, 2014: बिहार में बाढ़ प्रभावित इलाकों में जब तटबंध और बांध नहीं बने थे, तब वहां के लोकजीवन में जनेर खेलना और उसके गीत गाने का खासा महत्त्व था। जनेर लोगों के बीच लोक-साहचर्य, सामाजिक पूंजी और सामुदायिक सहभागिता के अद्भुत रूपक के तौर पर स्थापित था। कोसी, कमला-बलान, बागमती और महानंदा के इलाके में जनेर की प्रथा को स्थानीय जुबान में झिंझिर, झझेर, कस्तीखोरी या कस्तीबाजी भी कहा जाता था। पहले सावन-भादो के टहाटह इंजोरिया, यानी चांदनी रात में लोग-बाग नाव में सवार होकर जनेर खेलने जाते थे। बुजुर्गों, महिलाओं, युवक-युवतियों और बच्चों की पूरी टोली ढोल-बाजा, झाल-मृदंग के संग निकल पड़ते थे। बहुत सारे बाशिंदे तो परिवार के साथ नाव पर ही स्टोव और खाने-पीने की चीजें लेकर नौका-विहार करते थे। नदी में धीरे-धीरे नाव चल रही होती थी और उस पर ही लोग नाचते-गाते-झूमते और आनंदित होते थे। कई बार महिलाएं नाविक को चिढ़ाते हुए गीत भी गाया करती थीं। इन गानों का मर्म यही होता था कि नाविक हमें हाट-बाजार ले चलो, ताकि हम तेल, सिंदूर और नए कपड़े खरीद सकें। नवविवाहित महिलाओं का भी हुजूम कश्ती पर सवार होकर निकलता था। उनके लब पर भी अपनी कल्पना और अहसासों के गीत होते थे। मसलन, ‘धीरे चलो नदिया… तू धीरे चलो रे, जाना है मुझको पियाजी के पास हो’! पूरे साल लोग जनेर के मौके का इंतजार करते थे। जो लोग नाव में जनेर नहीं भी खेलते थे, वे दूसरों को यह खेल खेलते हुए देखने जरूर जाते थे।

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दिलचस्प है कि जनेर की इस प्रथा का जिक्र आंचलिक कथाकार फणीश्वर नाथ रेणु ने भी अपने रिपोर्ताज ‘ऋणजल धनजल’ में किया है। रेणु ने लिखा है- ‘गांव के लोग जिनके पास नाव की सुविधा नहीं होती, वे सामान्य तौर पर केले के पौधों को जोड़ कर भेला बना कर जनेर का आनंद लेते थे। वहीं जमींदार लोगों के पास नाव होते थे और वे नाव पर हारमोनियम-तबला के साथ झिंझिर या जल विहार करने निकलते थे’। गौरतलब है कि विकासवादी राज्य ने आधुनिकीकरण और प्रगति के सपने दिखा कर बांधों और तटबंधों का निर्माण किया, जिसके चलते जनेर के साथ-साथ उसके गीत भी लुप्त होते चले गए। बांधों और तटबंधों के रूप में प्रस्तुत किए गए आधुनिक भारत के इन मंदिरों-मस्जिदों ने लोगों से उनकी हंसी हमेशा के लिए छीन ली और लोकजीवन में नैराश्य, गरीबी, पलायन और भुखमरी थोप दी।

पहले जब नदियों पर बांध नहीं बांधे गए थे तो हर साल आने वाली बाढ़ का स्वभाव भी इतना उग्र नहीं था। बाढ़ के पानी के साथ आने वाली गाद काफी उपजाऊ होती थी, जिससे खूब खेती-किसानी होती थी। उत्तर बिहार में बलान नदी में आने वाली बाढ़ के पानी से धान जैसे फसल की इतनी ज्यादा अच्छी फसल होती थी कि उसे संभालने के लिए ग्रामीणों को बड़े-बड़े दालान बनाने पड़ते थे। स्त्रियां इस दौरान मैथिली में ‘आएल बलान त बंधल दलान, गेल बलान त टूटल दलान’ जैसे गीत गाती थीं। एक तरफ अच्छी खेती-किसानी, दूसरी तरफ तालाबों में मछलियों की तरह-तरह की किस्में- कबै, सिंघी, मांगुर, पटोरिया, बुआरी, गागर, हिलसा, इचना, पोठी, रेहू आदि बाढ़ के पानी के साथ खूब आती थीं। यानी बाढ़ जहां लोगों के जीवन को कुछ समय के लिए मुश्किलों से भर देती थी, वहीं अपने साथ कुछ तोहफे भी लाती था। महानंदा बेसिन में तो बाढ़ के दौरान ‘कैट फिश’, यानी अरिया मछली भी आती थी, जिसका वजन पांच-पांच किलो तक होता था। अंग्रेज विद्वान फ्रांसिस बुकानन ने भी पूर्णिया गजेटियर में लिखा था कि कोसी और आसपास की नदियों में एक सौ बत्तीस किस्म की मछलियां थीं। किसी जमाने में मिथिला में ‘पग-पग पोखर-पान-मखान’ की बात की जाती थी।

ऐसे में नदियों के किनारे बसा समाज जनेर के गीत गाकर अपने उत्साह और उमंग से आह्लादित हो जाता था। आज जबकि तालाब और पोखर सूख चुके हैं, मछलियों की प्रजातियां तेजी से विलुप्त हो रही हैं। ऐसे में बाढ़ प्रभावित इलाके में बांध और तटबंध का पूरा जाल जरूर बिछ गया है। तटबंध बनने के कारण जल-जमाव की समस्या सामने आ रही है। बाढ़ के जिस पानी के आने से से पैदा हुई मुश्किलों से पार पाकर लोग जनेर भी खेलते थे, खुशहाली मनाते थे, वह अभिशाप और त्रासदी में तब्दील हो गया है। ऐसे में जनेर खेलने वाला समाज विकासवादी राज्य से जनेर के गीत और परंपरा को फिर से लौटाने की गुहार ‘बाढ़ से जीयब बांध से मरब’ के रूप में करता है।

 

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