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दिखावे का रोग

अंजलि सिन्हा अपनी जिंदगी के कोई पल यादगार बन पाएं, इसके लिए कुछ लोग न जाने क्या-क्या जतन करने लगते हैं। कोई खतरों से खेलता है, कोई अपनी पूंजी को स्वाहा करता है तो कुछ तरह-तरह की नौटंकी भी करते हैं। हांगकांग की सबसे ऊंची इमारत पर चढ़ कर तीन दोस्तों द्वारा ली गई सेल्फी […]

अंजलि सिन्हा

अपनी जिंदगी के कोई पल यादगार बन पाएं, इसके लिए कुछ लोग न जाने क्या-क्या जतन करने लगते हैं। कोई खतरों से खेलता है, कोई अपनी पूंजी को स्वाहा करता है तो कुछ तरह-तरह की नौटंकी भी करते हैं। हांगकांग की सबसे ऊंची इमारत पर चढ़ कर तीन दोस्तों द्वारा ली गई सेल्फी पिछले दिनों सोशल मीडिया में छा गई। इस वीडियो में शामिल एक छात्र डैनियल ने कहा कि पहले उसे जिंदगी बहुत उबाऊ लग रही थी, वह कुछ नया करना चाहता था। अब यह पल यादगार बन गया है। दरअसल, जो लोग अपनी जिंदगी में अपने लिए इतना बेचैन रहते हैं, जिन्हें मात्र अपनी खुशी के लिए कुछ ‘नया’ करना है, वे ऐसा शायद ही कुछ कर पाते हैं जिसे लोग याद करें।

हमारी बेटी ‘गार्डियन’ में प्रकाशित एक लेख के हवाले से बता रही थी कि तत्काल किसी भी मौके को कैमरे में कैद करने की प्रवृत्ति एक तरह से उस पल का आनंद उठाने से आपको वंचित करती है। आप रहते वर्तमान में हैं, लेकिन लगातार उस पल को अतीत में डालना चाहते हैं, ताकि कल उसे देख कर खुश हों। एक वक्त था, जब कैमरे में रील लगती थी और फोटो की संख्या सीमित होती थी। तब अलबम में लगे चंद फोटो का आनंद लिया जा सकता था। आज जबकि तकनीकी प्रगति ने हर मोबाइल फोन या आइपैड में कैमरे की सुविधा दी है तो ली जाने वाली सैकड़ों तस्वीरों को अधिक से अधिक कंप्यूटर में सुरक्षित करके रखने के अलावा अन्य कोई बात हो नहीं सकती। अगर अपने परिश्रम से रोजी-रोटी चलानी है और साथ में पारिवारिक-सामाजिक जिम्मेदारियों और जवाबदेहियों का भी निर्वहन करना है तो फिर क्या इतना समय बचता है कि जिंदगी उबाऊ हो जाए? विचारणीय मसला यह है कि दूसरों को प्रभावित करने का यह तरीका क्या वाकई कारगर होता है या क्या इससे सम्मान बढ़ता है!

शादी-ब्याह जैसे समारोह को यादगार बनाने के लिए भी लोग तरह-तरह के प्रयास करते हैं और इसमें वैभव का प्रदर्शन सिर चढ़ कर बोलता है। एक परिचित महिला अपनी बेटी की शादी आज के युग में भी चार दिन तक के उत्सव में करते हुए बोली कि ‘जरा लोगों को भी पता चलना चाहिए कि हम क्या हैं!’ वीडियो रिकॉर्डिंग वाले को निर्देश था कि आने वाले सभी लोग और बड़ी हस्तियों में से कोई छूटने न पाएं। कई बार आप खबर पढ़ते हैं कि किसी ने अपना जन्मदिन यादगार बनाने के लिए मित्रों-दोस्तों को किसी दुर्गम स्थान पर पार्टी दी तो कोई अपनी शादी आसमान में उड़ते हुए करता है, किसी ने बीच समुद्र में पानी का जहाज किराए पर लेकर कर शादी की तो कोई दुल्हन को हेलिकॉप्टर से ले आया। फ्रांसीसी कंपनी ‘बोरा बोरा’ (अंडरवाटर वेडिग कंपनी) दुनिया के कई देशों में शादी के पैकेज की सुविधा दे रही है। इसमें कुछ जोड़े समुद्र के अंदर जाकर शादी या सगाई की रस्म निभाते हैं, भले ही बीस मिनट के लिए दो-ढाई लाख रुपए खर्च करने पड़ें।

हाल में ताज होटल समूह ने एक सर्वेक्षण में यह दावा किया कि भारतीय शादियों का अंदाज अब बिल्कुल बदल गया है। लोग अपने शादी-समारोह को यादगार बनाने के लिए वैभव का बेइंतहा प्रदर्शन कर रहे हैं और धन की बर्बादी भी खूब हो रही है। कॉकटेल पार्टियों के पश्चिमी ढंग के साथ शादी में संगीत और स्थानीय परंपराएं भी जम कर निभाई जाती हैं। रस्मों की संख्या बढ़ती जा रही है। अपने स्थानीय पारंपरिक रस्मों में दूसरी जगह से सीखी रस्में भी जुड़ जा रही हैं। कुछ रस्में बाकायदा बॉलीवुड फिल्मों से उधार लेकर प्रचलित हो रही हैं। इन शादियों में पांच लाख से पांच करोड़ तक का खर्च किया जाता है। भारतीय शादियों का बाजार आज की तारीख में एक लाख चौदह हजार करोड़ तक पहुंच चुका है और इसमें पच्चीस से तीस फीसद का इजाफा हर साल होता है।

जिंदगी में कई महानुभावों ने बड़े काम किए, अपनी लगन और परिश्रम को अपना लक्ष्य साधने के लिए खुद को दांव पर लगाया। निश्चय ही यह उन्होंने किन्हीं उद्देश्य के तहत किया। अपने अनुसंधान के लिए दो बार नोबेल पुरस्कार से नवाजी गई मैडम क्यूरी ने अपनी लगन के लिए बेहद मुफलिसी में जिंदगी जीना कबूल किया। यहां तक कि अपनी खोजों का अपने नाम पेटेंट तक नहीं कराया, ताकि व्यापक मानवता उससे लाभान्वित हो सके। महज तेईस साल की उम्र में फांसी को चूमने वाले भगत सिंह ने अपनी छोटी उम्र में बड़े कामों को अंजाम दिया। ऐसे तमाम लोग महज कुछ ‘नया’ करने की वजह से प्रेरित नहीं थे और न ही वे इस बात के लिए काम कर रहे थे कि उनके न रहने पर लोग उन्हें याद करें।

 

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