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विज्ञापन का परदा

विष्णु नागर जनसत्ता 4 अक्तूबर, 2014: आर्थिक उदारीकरण का युग आने के बाद से खासतौर पर दिल्ली-मुंबई के बड़े अंग्रेजी अखबार बड़े शर्मीले-से हो चले हैं। बहुत ज्यादा परदा करने लगे हैं। जब देखो, तब वे विज्ञापन के परदे में पूरे छिपे रहते हैं। कभी-कभी संयोगवश या मजबूरी में माथे तक परदा करके भी उन्हें […]

Author October 4, 2014 10:50 AM

विष्णु नागर

जनसत्ता 4 अक्तूबर, 2014: आर्थिक उदारीकरण का युग आने के बाद से खासतौर पर दिल्ली-मुंबई के बड़े अंग्रेजी अखबार बड़े शर्मीले-से हो चले हैं। बहुत ज्यादा परदा करने लगे हैं। जब देखो, तब वे विज्ञापन के परदे में पूरे छिपे रहते हैं। कभी-कभी संयोगवश या मजबूरी में माथे तक परदा करके भी उन्हें काम चलाना पड़ जाता है। आजकल नवरात्रि, दशहरे और दिवाली के इस मौसम में तो परदे पर भी परदे चढ़े हैं। एक, दो या तीन नहीं, कभी-कभी तो चार-चार परदे तक होते हैं। यहां तक कि उनके रोज छपने वाले परिशिष्ट भी परदादारी करते हैं। मैं तो चूंकि शुरू से ही प्रगतिशील रहा हूं, इसलिए किसी भी किस्म का परदा मुझे पसंद नहीं आता और वह भी जब हम इक्कीसवीं सदी में आ चुके हों। तो मैं सुबह अखबार आते ही उसके सारे परदे उतार देता हूं और बेपर्द अखबार को पढ़ता हूं। दशहरे से एक दिन पहले भी मैंने यही किया था और अखबार पढ़ने बैठ गया था। पढ़ना शुरू करते ही खयाल आया कि यार विष्णु नागर, यह अखबार तेरे लिए है और विज्ञापन का यह परदा भी तो तेरे लिए है! तूने अखबार का परदाफाश कर दिया, मगर कम से कम आज के दिन एक बार देख तो ले कि यह परदा क्या कहता है। तो फट चुके उन परदों को मैंने जमीन पर से उठाया और बाद में अंदर हर दो-तीन पेज के बाद जो परदे टंगे हुए थे, उन्हें भी हटाया।

ऐसा किया तो मुझे बड़े-बड़े रत्न मिले। ‘जिन खोजा तिन पाइयां’ वाला मामला हो गया, हालांकि मैं गहरे पानी में पैठ नहीं रहा था! फिर भी चमत्कार कि रत्न मिल गए। कलयुग है न! रत्नों ने भी सोचा होगा कि बेचारा साठ पार का यह आदमी आखिर कितने गहरे पानी में जा पाएगा, सो इसे ऊपर ही ऊपर रत्न दे दो। तो बड़ा रत्न यह मिला कि आप लोग जब बाजार खरीदारी करने जाओगे (और जाओगे जरूर, क्योंकि दिवाली आ रही है) तो दरअसल आप खरीदने नहीं, बल्कि बचत करने जाओगे! खरीदारी तो मात्र संयोग है। सालभर आप बाजार से जो भी खरीदते हो, उसमें बचत नहीं होती। बचत तो अब होगी, क्योंकि यह दशहरे-दीपावली का शुभ अवसर है! इस शुभ अवसर पर हम आपकी जेब खाली नहीं करवा रहे हैं, बल्कि भरवा रहे हैं। एक कहता है कि हमारे यहां से पांच हजार की चीजें लो और पांच सौ की छूट हाथों-हाथ पाओ। दूसरा कहता है कि बहनजी, उधर नहीं, इधर आओ, बचत का असली मंत्र इधर है! यहां ढाई हजार की चीज पर साढ़े सात सौ की रियायत मिलेगी।

एक कहता है कि अब ठंड आ रही है तो ठंड के कपड़े खरीद लो और अगर वह अभी नहीं खरीदना चाहते हो तो फैशन-ज्वेलरी, बैग, जूते वगैरह जो भी चाहो खरीद लो और सिर्फ तीन हजार रुपए खर्च करके एक हजार रुपए का माल मुफ्त ले जाओ। एक कहता है कि क्रेडिट कार्ड-डेबिट कार्ड हमसे ले लो और अपनी पसंद का तोहफा मुफ्त में साथ ले जाओ। एक साहब हमारी साठ फीसद तक बचत करवाना चाहते हैं तो दूसरे कहते हैं कि साठ फीसद के साथ जो ‘तक’ जुड़ा है, वह खतरनाक है। उसके चक्कर में मत पड़ो। आप तो हमसे हर माल पर पचास प्रतिशत की छूट ले जाओ। मोबाइल खरीदने पर एक तरफ का ‘रिटर्न टिकट’ मुफ्त है और लैपटॉप खरीदने पर दोनों तरफ का टिकट।

एक जमाने में विज्ञापन होता था, लूट ही लूट, हमें लूट के ले जाओ! मगर अब ये इतने ‘विनम्र’ हो चुके हैं कि अपने को ‘लुटवा कर’ भी यह नहीं कहते कि हमें लूट ले जाओ। बल्कि हम आपकी बचत करवाने की समाज सेवा कर रहे हैं, आपको तोहफे दे रहे हैं, आपको एक तरफ का मुफ्त हवाई टिकट दे रहे हैं! ले जाओ! ऐसी उदारता, ऐसा बड़प्पन तो मैंने बड़े-बड़े लोगों, यहां तक कि महान लोगों में भी नहीं देखा। लाखों रुपए के एक-दो -तीन-चार पेज के विज्ञापन ये किसलिए दे रहे हैं? सिर्फ इसलिए कि आप बचत कर सकें, आपको मुफ्त तोहफा मिल जाए, जाने का टिकट खुद खरीद लो तो वापसी का हवाई टिकट आपको मुफ्त मिल जाए! कितने ज्यादा हितैषी हैं ये हम ग्राहकों के! ऐसे हितचिंतक आज की दुनिया में दिल्ली-मुंबई आदि की धरती पर इस ‘मोदी-युग’ में और कहां मिलेंगे। उधर अखबार वाले कह रहे हैं कि क्या बंधु-बहना, इन दिनों आप अखबार पढ़ने के चक्कर में क्यों पड़े हो! त्योहार के इस मौसम में पढ़ने के लिए हमने इतने विज्ञापन दिए हैं, उन्हें पढ़ो तो आपका त्योहार सुधर जाएगा। अखबार तो तुम सालभर पढ़ते ही रहते हो, अभी विज्ञापन पढ़ लो, काफी है! तुम्हारी भी कमाई और हमारा भी लाभ।

 

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