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आचार्य के शहर में

ध्रुव शुक्ल रायबरेली पहली बार जाना हुआ। राजनीति की दुनिया में यह स्थान इंदिरा-स्मृति से जुड़ा हुआ है और अब उसकी प्रतिनिधि सोनिया गांधी हैं। राजमार्ग से जुड़ी रायबरेली की सड़कें चौड़ी और साफ-सुथरी हैं। यहां के लोग प्रियदर्शिनी इंदिरा गांधी को अब भी आदरभाव से याद करते हैं। रायबरेली को आचार्य-स्मृति का शहर भी […]

ध्रुव शुक्ल

रायबरेली पहली बार जाना हुआ। राजनीति की दुनिया में यह स्थान इंदिरा-स्मृति से जुड़ा हुआ है और अब उसकी प्रतिनिधि सोनिया गांधी हैं। राजमार्ग से जुड़ी रायबरेली की सड़कें चौड़ी और साफ-सुथरी हैं। यहां के लोग प्रियदर्शिनी इंदिरा गांधी को अब भी आदरभाव से याद करते हैं।
रायबरेली को आचार्य-स्मृति का शहर भी कहना चाहिए, जहां हिंदी साहित्य की दुर्लभ विभूति आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी हुए। दो दिनों के प्रवास में मेरे लिए रायबरेली उस बीते हुए को याद दिलाने वाली नगरी बन गई, जिसे याद करने से अपने समय की भी याद बनी रहती है, जिसे अक्सर हम भूल कर जीते रहते हैं। हमें कहां याद रहती है हमारी खोती जाती बोलियों और भाषा की पहचान की। भाषा के व्याकरण की कौन कहे, हम तो जीवन का व्याकरण भी भूल कर जीते रहते हैं। हमें सस्ती कीर्ति लूटने वालों के शोर के बीच कहां याद रह पाता है कि भाषा ही हमारी जाति की आत्मा है और उस आत्मा को बाजार की ताकतें रोज कुचल रही हैं। आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी याद दिला रहे हैं कि भाषा की उन्नति के बिना स्वराज्य की कल्पना ही व्यर्थ है।

मुझे याद आने लगा वह समय जब फिरंगियों का उपनिवेश बना भारत देश बीसवीं सदी में प्रवेश कर रहा होगा और सदी के प्रवेश द्वार पर खड़े आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी सरस्वती का आवाहन कर रहे होंगे। वे धीरे-धीरे अपने पांवों पर खड़ी होती हिंदी के हृदय में साहित्य, दर्शन, विज्ञान, इतिहास, संगीत, चित्रकला और नीति को उतार रहे होंगे। नए विश्व बाजार से बात कर सकने की तैयारी के लिए हिंदी में संपत्तिशास्त्र की रचना कर रहे होंगे। मैथिलीशरण गुप्त भारत भारती रच रहे होंगे और प्रेमचंद वह गांव रच रहे होंगे, जो सदियों से अन्याय को ढो रहा है, पीड़ा भोग रहा है। नई चाल में ढलती हिंदी स्वतंत्रता संग्राम की भाषा बन रही होगी। लगता है कि जैसे महात्मा गांधी के आगमन की तैयारी हो रही हो।

भव्य मंच पर प्रदर्शित आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी की तस्वीर के सामने खड़ा हूं- उनकी मूंछें आचार्य रामचंद्र शुक्ल से कुछ बड़ी हैं। अब तो हिंदी में मूंछों वाले आचार्य होते नहीं हैं, जो अच्छी-खासी डांट पिला सकें, मन-मानी को संशोधित कर सकें। पर इन दोनों हिंदी के हेडमास्टरों को देख कर लगता है जैसे कह रहे हों कि आओ हम सब भाषा और भाव के कलुष को धो डालें। आओ हम हिंदी को ऐसी कविता की भाषा बनाएं कि हमारा जीवन ही कविता बन जाए, तभी स्वराज्य का स्वाद हम चख सकेंगे। तभी तो पंडित नेहरू भी कह सके कि अपने जीवन को कविता बनाना चाहिए।

बहुतों की दृष्टि में आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी हिंदी के हेडमास्टर भले कहलाए हों, पर मेरी समझ से वे हिंदी भाषा और साहित्य के ऐसे डाकबाबू थे, जो कवियों की चिट्ठी खोल कर उसके व्याकरण को सुधारने के बाद ही सही पते पर पहुंचा देने का काम करते रहे। मेरी इस समझ की पुष्टि इस साक्ष्य से होती है कि वे जिस डाकखाने में काम करते थे, उसमें उन्हीं की डाक सबसे ज्यादा आती थी और जिसे सुधार कर ही वे सरस्वती पत्रिका में प्रकाशित करते थे, तभी वे कविताएं पाठकों तक पहुंच पातीं।

वे अनुवादक और पुनर्रचनाकार भी थे। उन्होंने अपने इस कर्तव्य को निभा कर हिंदी मानस में अभिव्यक्ति के लोकतंत्र के बीज बोए। तभी वे हिंदी समाज की साहित्यिक संस्कृति के निर्माता और कवि-शिक्षक के रूप में जन-मन में प्रतिष्ठित हैं। हमारी परंपरा याद दिलाती है कि हर युग में वर्ण, अर्थ, रस और छंदों की वंदना किए बिना उस युग की अभिव्यक्ति नहीं होती। रायबरेली में यों तो आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी का कोई इमारती स्मारक नहीं है। चार बरस पहले सोनिया गांधी ने आचार्य की आवक्ष प्रतिमा का अनावरण किया था। पर रायबरेली के लोगों ने अपने हृदय में आचार्य का स्थायी स्मारक रच लिया है। उनकी स्मृति में एक समिति है और लगता है कि यह समिति कुछ मुट््ठी भर लोगों की नहीं है, इसमें पूरा शहर ही शामिल है। पिछले सत्रह वर्षों से यहां रह रहे पत्रकार गौरव अवस्थी और उनकी सक्रिय मित्रमंडली शहर के लोगों की आत्मीय भागीदारी से हर वर्ष यहां एक आचार्य स्मृति उत्सव रचती है। जहां बड़े जन समूह के बीच कवि, आलोचक, पत्रकार और समाज सेवक सम्मानित होते हैं।

उत्तर प्रदेश में भांति-भांति के नेताओं की कमी नहीं है, पर मंच पर शहर के नागरिक ही शोभते हैं और वे ही अपने अतिथियों को सम्मान प्रदान करते हैं। अब तक वे पत्रकार-चिंतक प्रभाष जोशी और पी. साईनाथ, समाजसेवी मेधा पाटकर और अरुणा राय, आलोचक नामवर सिंह, मैनेजर पांडेय, विजयबहादुर सिंह को सम्मानित कर चुके हैं। पहले आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी और कवि-पत्रकार-राजनेता राममनोहर त्रिपाठी की स्मृति में क्रमश: युगप्रेरक और लोकसेवा सम्मान ही स्थापित हुए। फिर प्रभाष जोशी की स्मृति में पत्रकारिता पुरस्कार भी जुड़ गया। संयोगवश इस वर्ष कथाकार चित्रा मुद्गल, पत्रकार राकेश सिंह और मुझे ये सम्मान रायबरेली के नागरिकों ने प्रदान किए। रायबरेली के सहृदयजनों की आत्मीयता कभी भुलाई न जा सकेगी।

 

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