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दुनिया मेरे आगे: जमीन के तारे

पांच वर्ष के एक बच्चे को तितली में रंग भरने का काम दिया गया था। वह कुछ बना नहीं पा रहा था। मासूमियत से उसने मेरी ओर देखा और बोला कि तितली कैसी होती है! मैं अवाक् था।

Author Updated: September 2, 2020 1:04 AM
wildlifeहवा में मुक्त होकर उड़तीं या फूलों से रस चूसतीं तितलियां बच्चों को बहुत भाती हैं।

हेमंत कुमार पारीक

बारिश के दिनों में रात के समय झींगुर और मेढ़क के समवेत स्वर सुनाई देना आम बात है। लेकिन जहां तक मेरी बात है, मैं रात में जुगनू की एक झलक पाने के लिए बेताब रहता हूं। हाल के दिनों में कई लोगों ने जो तस्वीरें या वीडियो सामने रखे, उसमें बहुत सारे वन्यप्राणी दुनिया के विभिन्न देशों में सड़कों पर विचरण करते नजर आए। वजह शायद हर ओर सब कुछ बंद होना रहा हो।

मेरे एक मित्र ने सड़क पर नाचते मोरों का वीडियो भेजा था। टीवी पर तो कही नीलगाय, कहीं हिरन तो कहीं बाघ व्यस्ततम सड़कों पर आजाद घूमते दिखे। शहर की एक सड़क बांध तक जाती है। एक वीडियो में वहीं का दृश्य था। मन में आया कि एक बार बाहर निकल कर देखूं। लेकिन बाहर जाने का खयाल आते ही मन में एक अदृश्य डर पैदा हुआ। जानता हूं कि पिछले कुछ महीनों के दौरान सार्वजनिक पटल पर जो चीजें रही हैं, उन्हें जैसे पेश किया गया है, उसमें यह डर घर कर जाना स्वाभाविक है। यह डर पता नहीं कितना सही है, लेकिन जब कुछ बंद रहना मन में कई बार निराशा का भाव भर देता है, उसमें एक सुखद पहलू मैं देख रहा था।

घर और पड़ोस के आंगन में गौरैया, कबूतर, बुलबुल और गिलहरी आदि बड़ी संख्या में घूमती-फिरती दिख रही थी। छोटी-सी बगिया में पता नहीं कितने दिनों बाद, एक तितली दिखी। अब सब कुछ बंदी के दौर में कुछ राहत हो, तो बारिश में जुगनू देखने का मन कर रहा है।

प्रकृति में न जाने कितने किस्म के जीव-जंतु हैं। मैं अपनी नजर की सीमा की बात करूं तो मुझे दो जीव अक्सर आश्चर्य में डाल देते हैं। उनमें एक ‘जुगनू’ है और दूसरा ‘लाल गाय।’ जब गांव में था तो बारिश में उगती ‘पंवार’ के पौधों पर हरी-पीली तितलियां पकड़ने उनके पीछे-पीछे भागता था। छोटी उम्र थी। तितली पकड़ने को दिल करता था। उनका रंग आकृष्ट करता था। लेकिन बाद में अनुभव हुआ कि ये जीव बेहद नाजुक होते हैं। पकड़ते ही इनका जीवन खत्म हो जाता है। इनके पंखों पर लगा चमकीला चिकना पदार्थ हाथों में लग जाता है और फिर आमतौर पर ये उड़ने के लायक नहीं रहते।

उस दौर में गांव में बड़े-बड़े बाग थे। मेरे घर के सामने ही एक आसामी का बगीचा था। वहां फूलों की खेती होती थी। विभिन्न प्रकार के गुलाब थे। उनमें एक गुलताबड़िया का फूल भी होता था। अभी तक नाम याद है। स्पर्श करते ही उसकी कली फट जाती थी। और नन्हा-सा फूल झांकने लगता था। उन्हीं फूलों पर विभिन्न आकार-प्रकार की तितलियां मंडराती दिखती थीं। मगर नष्ट होते पर्यावरण में अब तितलियां नजर नहीं आतीं। काले-काले भंवरे भी नहीं दिखते। जैसे-जैसे धीरे-धीरे करके सार्वजनिक गतिविधियां शुरू हो रही हैं, विभिन्न जीव-जंतु दिखते तो हैं, पर यत्र-तत्र मंडराते तितली और भंवरे नजर नहीं आए।

बारिश के इसी मौसम में हरी-हरी घास पर हौले-हौले रेंगती मखमली गुलाबी आवरण धारण किए यहां-वहां ‘लाल गाएं’ दिख जाती थीं। उनमें इतना आकर्षण होता था कि हम अपने आप पर नियंत्रण नहीं रख पाते थे। छोटे-से दिखते उस कीट को बच्चे शीशी या माचिस की डिब्बी में बंद कर लेते थे। मगर अब ऐसा लगता है कि भविष्य में इस कीट के दर्शन दुर्लभ होंगे।

ऐसे बहुत से जीव हैं जो प्रतिकूल पर्यावरण में अपना अस्तित्व खो चुके हैं या खो रहे हैं। उन्हीं में से एक जुगनू है। पिछले साल वर्षा ऋतु के इसी मौसम में एक बार गहराती शाम को खेल के मैदान में दिखे थे। मगर गिनती के दो-तीन। उस वक्त जब गांव में था, तो यहां-वहां सैकड़ों की संख्या में नजर आते थे। उन्हें देख ‘पाकीजा’ फिल्म का वह गाना स्मरण हो आता था- ‘जुगनू हैं या जमीं पर उतरे हुए हैं तारे..!’

फिलवक्त इस मौसम में जुगनू के इंतजार में हूं। मोबाइल साथ में है, ताकि जुगनू का जीता-जागता वीडियो बना सकूं। पता नहीं कुछ समय बाद वही ढाक के तीन पात हों। पूर्ववत धूल और धुआं वातारण को प्रदूषित कर दे। वीडियो बनाने की खास वजह है। कभी किसी बच्चे ने पूछ लिया कि जुगनू कैसा होता है, तो क्या जवाब दूंगा! कुछ महीने पहले परिसर में पेंटिंग प्रतियोगिता का आयोजन हुआ था।

पांच वर्ष के एक बच्चे को तितली में रंग भरने का काम दिया गया था। वह कुछ बना नहीं पा रहा था। मासूमियत से उसने मेरी ओर देखा और बोला कि तितली कैसी होती है! मैं अवाक् था। मैंने ‘गूगल सर्च’ में जाकर मोबाइल पर तितली का चित्र उसके सामने रख दिया। ऐसे ही किसी अवसर पर किसी बच्चे ने कभी पूछ लिया कि जुगनूं क्या होता है, तो..!

जुगनू की दुम पर जलती रोशनी तो वे चित्र में उतार नहीं पाएंगे। उसका प्रतिरूप भले बना लें। इसलिए प्रयास कर रहा हूं कि संयोग से कोई जुगनू दिख जाए। कभी ऐसी स्थिति बन जाए तो कम से कम मोबाइल पर अपने दायरे के लोगों को आभासी जुगनू दिखा सकूंगा।

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