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दुनिया मेरे आगे – खुशी की खोज

किसी की उन्नति, तरक्की, विशेष उपलब्धि या गुण अन्य अनेक कारण हो सकते हैं जो हमारे मन में किसी दूसरे के लिए डाह का सबब बनते हैं। ऐसे में हमें कभी अपना सांवला रंग, सीमित संसाधन या औसत बुद्धि ही हीनता का बोध कराने लगते हैं।

Author February 1, 2018 04:39 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

कविता भाटिया

अक्सर हम अपने ‘मैं’ और ‘पर’ के अंतर्द्वंद्व में ‘मैं’ या ‘स्व’ से इतने आक्रांत रहते हैं कि आसपास की दुनिया, घटनाओं और उनके कारक मनुष्य को भी अपने उसी चश्मे से देखने लगते हैं। यों अपने आप से प्यार या विशेष लगाव गलत या अस्वाभाविक नहीं, लेकिन सिर्फ स्वकेंद्रित होकर उसी वृत्त के दायरे तक दृष्टि सीमित रखना संकुचित दृष्टिकोण है, जो व्यावहारिक और तर्कसंगत नहीं। ऐसे में हम न तो सामाजिक बन पाते हैं और न ही वृहत्तर समुदाय से जुड़ पाते हैं। यह प्रवृत्ति हर आयु, वर्ग और लिंग के लोगों में देखी जा सकती है। ऐसा इसलिए कि हम अपने लिए केवल अच्छा-अच्छा ही पाना चाहते हैं। जो सही हो- वह श्रेष्ठ हो और वह हमारा ही हो। अक्सर समाज में हम देखते हैं कि हमारे समूह में किसी को किसी कारण वाहवाही मिल गई। मसलन, किसी पत्र-पत्रिका में रचना प्रकाशित होने पर, कोई पुरस्कार मिलने पर या फिर किसी पार्टी में किसी के विशेष आभूषणों, कपड़ों या महंगे फोन की अन्य द्वारा प्रशंसा करने पर हम ईर्ष्या से भर जाएंगे। हो सकता है कि हम भी बधाई दें, पर उसमें कितनी शुभाकांक्षा छिपी है, इस पर सवाल हो सकता है!

किसी की उन्नति, तरक्की, विशेष उपलब्धि या गुण अन्य अनेक कारण हो सकते हैं जो हमारे मन में किसी दूसरे के लिए डाह का सबब बनते हैं। ऐसे में हमें कभी अपना सांवला रंग, सीमित संसाधन या औसत बुद्धि ही हीनता का बोध कराने लगते हैं। ये हमारे मन में नकारात्मक विचारों को जन्म देते हैं। हाल ही में खबर आई कि एक छब्बीस वर्षीय युवती ने अपने चेहरे के मुंहासों से तंग आकर आत्महत्या कर ली, जबकि उच्च स्तर की दो प्रतियोगी परीक्षाओं में उसका चयन हो चुका था। हमें यह कोई सामान्य घटना लग सकती है, लेकिन भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो जिस समाज में वैवाहिक विज्ञापनों में गौर वर्ण, छरहरी सुंदर कन्या और प्रतिष्ठित कंपनी में कार्यरत, पांच अंकों में तनख्वाह पाने वाले युवक को प्राथमिकता दी जाती हो, वहां यह असामान्य नहीं। टेलीविजन और सोशल मीडिया के विज्ञापनों में भी अपनी त्वचा को सुंदर, दाग रहित और गोरा बनाने के उत्पाद और नुस्खे छाए रहते हैं। उस युवती के घर से भी ऐसे ही आयुर्वेदिक और देशी-विदेशी अनेक क्रीम और उत्पाद मिले। अपने आत्महत्या-नोट में निराश मन:स्थिति में आत्महत्या का कारण उसने मुंहासों का ठीक न होना ही बताया। यह किसी एक युवती की निराशा नहीं, बल्कि उस सामाजिक वर्ग की निराशा है जहां ये विज्ञापन दावा करते हैं कि अगर आप गोरे रंग के हैं, आपकी त्वचा चिकनी और दागरहित है, तभी कोई अच्छी नौकरी या उच्च पद आप पा सकते हैं, अन्यथा आपके वजूद की कोई अहमियत नहीं। आपकी शिक्षा, योग्यता और अनुभव की कोई महत्ता नहीं। विज्ञापन तो यह भी दावा करते हैं कि किसी विशेष वाशिंग पाउडर से धुली कमीज पहनने पर ही आपकी पदोन्नति होगी। ऐसे में मन में हीनताबोध का आना स्वाभाविक है।

मेरे एक परिचित सत्तर वर्षीय वृद्ध आजकल घर पर खाली बैठे अपने स्वास्थ्य को लेकर हर समय चिंताग्रस्त रहते हैं। हल्का खांसी-जुकाम या कहीं दर्द होने पर घर के सभी सदस्यों को अपनी तीमारदारी करने पर विवश कर देते हैं और बेवजह अवसाद से ग्रसित हो बार-बार अपने ‘ऊपर जाने’ की हास्यास्पद घोषणा भी करते रहते हैं। ऐसा इसलिए कि बंधी नौकरी के अलावा उन्होंने कभी अपनी कोई अन्य रुचि या शौक नहीं पाला। ऐसे में उन्हें अपना जीवन बोझ लगने लगा है। अपनी दृष्टि और सोच को सीमित कर वे आत्मकेंद्रित हो चुके हैं। इसीलिए किसी अन्य पारिवारिक सदस्य की बीमारी, दुख या पीड़ा उन्हें उतना नहीं सालती, जितनी अपनी मामूली तकलीफ। लेकिन हमें चाहिए कि सिक्के को पलट कर उसके दूसरे पहलू को देखें, यानी अपने मन में सकारात्मक विचारों को स्थान दें। नई सोच विकसित करें। अपनी कमियों और विफलताओं पर निराश होने के बजाय जो हमारी पहुंच में है, उस पर संतोष करें और उन्हीं का विस्तार करें। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं है कि हम संघर्ष या प्रयत्न करना ही छोड़ दें। सच तो यही है कि संघर्ष से ही नई राह खुलती है। दूसरों की उपलब्धियों की अवश्य सराहना करें और उनसे ईर्ष्या करने के बजाय उनके गुणों और अनुभवों को ग्रहण करने की कोशिश करें।

आज सिनेमा, राजनीति और अन्य अनेक क्षेत्रों में अपनी सामान्य शक्ल-सूरत और औसत कद काठी वाले व्यक्ति बेहद सफल देखे जा सकते हैं, जिन्होंने अपनी सकारात्मक सोच को संबल बना प्रतिभा के बल पर समाज में अपनी पहचान बनाई। उन्होंने अपनी कमियों को कुंठा या ग्रंथि नहीं बनने दिया। इसलिए जरूरत है कि हम अपने को खुश रख कर आसपास प्रेमपूर्ण दुनिया की रचना करें। खुशी से जीने की क्षमता हमारे अपने भीतर ही छिपी है, आवश्यकता है उसे खोजने और उस पर अमल करने की।

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