Duniya mere aage writtan about helpless man - दुनिया मेरे आगे- लाचार तीमारदार - Jansatta
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दुनिया मेरे आगे- लाचार तीमारदार

अस्पतालों को सोचना चाहिए कि मरीज की देखभाल करने वालों का स्वस्थ रहना भी उतना ही जरूरी है, वरना वे कैसे अपने किसी बीमार परिजन की देखभाल करेंगे। उनकी जरूरतों के सामान लाने के लिए कैसे इधर-उधर दौड़ेंगे! पहले ही वे अपने परिजन की बीमारी के कारण बेहद चिंता में होते हैं।

Author February 3, 2018 3:13 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

पिछले दिनों एक परिजन गंभीर रूप से बीमार पड़े। उन्हें मानसिक आघात हुआ था। फौरन अस्पताल पहुंचाया गया। डॉक्टरों के अनुसार उनका इलाज लंबा चलना था और ठीक होने की भी कोई गारंटी नहीं थी। लेकिन इस तरह की स्थिति में होने के बावजूद कोई अपने करीबी को नहीं छोड़ पाता है। जाहिर है, मानवीय संवेदनाएं जब तक जीवित हैं, यह लगाव स्वाभाविक है। खैर, अस्पताल में वे बिस्तर पर डॉक्टरों और नर्सों की देखभाल में थे। मगर अस्पताल की हालत का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि उनकी देखभाल करने वाले किसी परिजन के लिए ठीक से बैठने तक की व्यवस्था नहीं थी। दूसरी ओर, भीषण ठंड थी, जिसका सामना सबको करना पड़ रहा था। बेचारे परिजन दिन तो जैसे-तैसे काट ले रहे थे, लेकिन रात में कहां रुका जाए, इसकी उन्हें भारी चिंता सताती थी। रात भर कुर्सी पर बैठ-बैठे पीठ अकड़ जाती थी, ठंड लगती थी वह अलग।

मुश्किल यह थी कि बीमारी का इलाज चूंकि लंबा चलना था, इसलिए इस तरह से रुकना एक-दो दिन का नहीं था, बल्कि यह सिलसिला शायद लंबा चलने की बात थी। अस्पताल परिसर में कहीं ऐसा इंतजाम तक नहीं था कि रात ठंड से बच कर गुजारी जा सके या फिर एक झपकी ली जा सके। जरूरत पड़ने पर ठीक से चाय भी मिलनी मुश्किल थी, खाने-पीने के दूसरे सामान की बात ही दूर। इसके अलावा, अस्पताल में मरीजों के तीमारदारों को डॉक्टरों या नर्सों की ओर से कभी भी आवाज लगाई जा सकती थी, क्योंकि कभी खून का बंदोबस्त करने को कहा जाता था तो कभी किसी बिल पर दस्तखत करने के लिए। लेकिन आमतौर पर रात में ही आवाज लगाई जाती। अव्वल तो अस्पताल में इतनी व्यवस्था और सुविधाएं होनी चाहिए कि मरीज को डॉक्टरों और नर्सों के अलावा किसी व्यक्ति की कोई खास जरूरत नहीं महसूस हो। लेकिन सवाल है कि जब मरीज की देखभाल के लिए किसी परिजन का अस्पताल में रुकना जरूरी होता ही है तो वहां लोगों की सुविधाओं के बारे में क्यों नहीं सोचा जाता।

हाल ही में चंडीगढ़ से एक खबर आई थी कि पीजीआई अस्पताल के पास सारी सुख-सुविधाओं से लैस एक धर्मशाला बनाई गई है। यह धर्मशाला वातानुकूलित है। खाने-पीने के अलावा वहां ठहरने की पूरी व्यवस्था उपलब्ध है। इसमें मरीजों की देखभाल करने वाले रुक सकेंगे और अपने परिजनों की देखभाल के लिए आराम से रह सकेंगे। यानी वहां यह सुविधा होने की वजह से बार-बार उन्हें घर की ओर दौड़ने की जरूरत नहीं रहेगी। एक अहम बात यह है कि बाहर के शहरों से बड़ी संख्या में जो लोग इलाज कराने आते हैं, उनकी देखभाल के लिए आए लोगों को भी भारी सुविधा होगी। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के पास भी ऐसी ही एक धर्मशाला है। कई और अस्पतालों के आसपास ऐसी कुछ धर्मशालाएं होंगी, लेकिन दिल्ली भर में फैले बहुत से अस्पतालों के आसपास ऐसी कोई सुविधा देखने में नहीं आती। अस्पताल वाले इलाके में कुछ घर एक-दो कमरे किराए पर उठाते हैं, मगर वे बेहद महंगे होते हैं।

अस्पतालों को सोचना चाहिए कि मरीज की देखभाल करने वालों का स्वस्थ रहना भी उतना ही जरूरी है, वरना वे कैसे अपने किसी बीमार परिजन की देखभाल करेंगे। उनकी जरूरतों के सामान लाने के लिए कैसे इधर-उधर दौड़ेंगे! पहले ही वे अपने परिजन की बीमारी के कारण बेहद चिंता में होते हैं। फिर उन्हें ठीक से आराम भी न मिले तो उनकी चुनौती दोहरी हो जाती है। पैसे की मार पड़ती है, सो अलग से। भारत में इन दिनों इलाज कराना यों भी बेहद महंगा सौदा हो चला है। यही नहीं, इलाज पर आने वाला खर्च दिनोंदिन बेतहाशा बढ़ता ही जा रहा है। खासतौर पर सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने आए ज्यादातर लोग कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि से होते हैं। उनके लिए थोड़े पैसे खर्च करना क्या होता है, यह वही जानते हैं। अस्पताल चाहें तो एक बड़ी और सुविधाओं से लैस धर्मशाला न सही, लेकिन अपने परिसर में कुछ कमरे मरीजों के परिजनों के लिए बना सकते हैं। वहां उनके लिए चाय, भोजन, नहाने और सोने की सुविधाएं प्रदान की जा सकती हैं। चाहें तो इसके लिए रियायती और वाजिब कीमत ली जा सकती हैं। तब इस तरह की सुविधाएं देने से अस्पतालों को घाटा भी नहीं होगा। कम से कम तब मरीजों के परिजनों को यह चिंता नहीं करनी पड़ेगी कि वे रात में कहां रुकेंगे, कैसे सोएंगे, कहां खाएंगे-नहाएंगे! मेडिकल क्षेत्र का अपने देश में जिस तरह से विकास हुआ है, उसमें चमकते हुए निजी अस्पतालों की बाढ़-सी आ गई है। तरह-तरह की विशेषताओं और सभी सुविधाओं का दावा करने वाले अस्पताल खुल गए हैं। अगर इलाज के लिए लोग वहां जाते हैं तो कुछ सुविधाओं की मांग भी जायज है।

 

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