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दुनिया मेरे आगे : एक और झरोखा खोलें

सच कहें तो यह ज्ञान के विस्फोट का युग है। दुनिया भर का ज्ञान हमारे पास है, लेकिन हमें अपने आसपास की कोई जानकारी नहीं है। हमारी पुरानी गलियां, चौक-चौबारे खत्म होते जा रहे हैं, इसका रोना तो हर कोई रो रहा है, लेकिन क्या कोई इसकी सुध भी लेगा कि उसके साथ हमारी पूरी संस्कृति, सभ्यता, विरासत नष्ट होती जा रही है? ‘चौक पुराओ, मंगल गाओ’ के शब्द खोते चले जा रहे हैं, क्योंकि हम नई पीढ़ी तक चौक क्या होता है, उसे पूरते कैसे हैं, मंगल ध्वनि कैसे होती है, जैसी तमाम बातें नहीं पहुंचा पा रहे हैं।

Author Published on: March 20, 2020 1:23 AM
लोग मोबाइल की वजह से मिलना जुलना भूल गए हैं

स्वरांगी साने

ज्ञान हर तरफ बिखरा पड़ा है। सच कहें तो यह ज्ञान के विस्फोट का युग है। वाट्सऐप से लेकर सोशल मीडिया के अन्य मंचों तक और अखबारों से लेकर ‘गूगल’ जैसे किसी भी विषय पर सामग्री खोज वाले वेबसाइट एक क्लिक पर उपलब्ध जानकारी मुहैया कराते हैं। फिर हमें और अधिक नया पढ़ने-देखने-सुनने की आवश्यकता है, लेकिन क्यों है? दरअसल, हमें कुछ नया पढ़ने-देखने-सुनने से अधिक जो हमारे पास है, उसे गुनने की आवश्यकता है। दुनिया भर का ज्ञान हमारे पास है, लेकिन हमें अपने आसपास की कोई जानकारी नहीं है। बाजार हम पर हावी हो रहा है और वह ठीक उस तरह से हावी हो रहा है, जैसा वह होना चाहता है।

इसलिए उसी बाजार में खड़ी हमारे पड़ोस की किराना दुकान में क्या मिलता है, हमें नहीं पता। हमारी पुरानी गलियां, चौक-चौबारे खत्म होते जा रहे हैं, इसका रोना तो हर कोई रो रहा है, लेकिन क्या कोई इसकी सुध भी लेगा कि उसके साथ हमारी पूरी संस्कृति, सभ्यता, विरासत नष्ट होती जा रही है? ‘चौक पुराओ, मंगल गाओ’ के शब्द खोते चले जा रहे हैं, क्योंकि हम नई पीढ़ी तक चौक क्या होता है, उसे पूरते कैसे हैं, मंगल ध्वनि कैसे होती है, जैसी तमाम बातें नहीं पहुंचा पा रहे हैं। क्या ऐसा नहीं लगता कि आज के दौर में कंप्यूटर के विंडो के साथ एक झरोखा भी खुला होना चाहिए जो हमें हमसे ही मिलवाए। ऐसा झरोखा जो ताजा बयार लेकर आए और हम अपनी ही भाषा, संस्कृति, अपने रीति-रिवाजों, अपनी परंपरा-रिवायतों से रूबरू हो पाएं।

जिस सिंधु घाटी की सभ्यता को हम जीवित सभ्यता कहते नहीं अघाते, उसे जीवित रखने का जिम्मा भी तो हमें उठाना पड़ेगा। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक उस विरासत को पहुंचाते हुए यह भी तो देखना होगा कि कहीं उसकी सघनता तो कम नहीं हो रही! ऐसा अपने-आप नहीं होगा। हमारे ध्यान न देने पर वह हस्तांतरित होते हुए अपने आप विरल तो होती जाएगी, लेकिन उसकी सघनता को बचाए रखने के लिए हमें कोशिश करनी होगी। छोटे-छोटे कदम, जैसे अपने घर-परिवार में मातृभाषा में ही बात हो, तो इतने से ही देखिएगा कि कितने शब्द, उनके मायने और उनसे जुड़ी बातें खुद ही संरक्षित होती चली जाएंगी। जैसे संस्कृत भाषा हमारे पास बची ही इसलिए है कि सारे मंत्रोच्चार संस्कृत में होते हैं, तो अपने आप ही उससे जुड़ी बातें भी स्थापित हो जाती हैं।

जैसे यज्ञ वेदी को उसी तरह से तैयार किया जाता है और उसके लिए लगने वाली सामग्री भी हर संभव कोशिश से जुटाई जाती है। वही बात हमारे हर छोटे-बड़े रोजमर्रा के कार्य-व्यवहार को जतन करते हुए लागू की जानी चाहिए। पूजा करते हुए जैसे हम उस शालीनता को निभाते हैं और भारतीय वस्त्रों को पहनने पर जोर देते हैं। उससे हमें भरोसा होता है कि ‘वेस्टर्न आउटफिट’ यानी पाश्चात्य पहनावे के दौर में भारतीयता बनी रहेगी। वही शालीनता हर शास्त्रीय आयाम के साथ कड़ाई से निभानी चाहिए। लेकिन संस्कृत और संस्कृति के लिए पूजा-अर्चना आदि हैं, पर शेष का क्या? उन्हें भी पूजा या इबादत मान कर उसी सलीके और शास्त्रीयता से करना होगा, पर उसके लिए वह झरोखा कहां है, जो बता सके कि ये हमारे शास्त्रीय नृत्य हैं, ये उत्तर भारतीय और ये दक्षिण भारतीय?

ये हमारा संगीत है, शास्त्रीय संगीत, लोक संगीत, कर्नाटक संगीत या ये हमारे नाट्य आविष्कार हैं, ये मालवा का माच है, ये नौटंकी है, ये रामलीला है और ये यक्षगान! लेकिन इन सबकी जानकारी कहां-से ली जाए? हमारे सामने तुरंत उत्तर देंगे कि ‘गूगल बाबा’ से। लेकिन ‘गूगल’ से क्या पूछना है, वह प्रश्न तो आपको पता होना चाहिए। पहले हमें यह पता होना चाहिए कि सुबह-सबेरे घर बुहार कर (‘बुहारना’ क्या होता है, इस शब्द को भी तो बचाना है, उसके अर्थ के साथ!) उसके बाहर चित्रनुमा कुछ बनाया जाता था और वह मधुबनी पेंटिंग नहीं थी। मधुबनी कला अलग है और रंगोली अलग और अल्पना उससे अलग। हर रंग की कितनी अलग-अलग छटाएं हैं और उन छटाओं में कितनी विविध मनोरमता है।

इन सभी से हम कितने वाकिफ हैं? ये सारे सवाल प्रशासनिक सेवा की परीक्षाओं की तैयारी के लिए हल नहीं करने हैं, बल्कि हम जिसे भारतीयता कहते हैं, उसकी माटी क्या है और हम किस माटी से बने हैं, उसे जानने के लिए खोजने हैं। वरना हो यही रहा है कि हमें दुनिया भर की ढेरों जरूरी-गैर जरूरी बातें पता है, सूचनाओं का अंबार लगा है, कहने को हमें सब पता है, लेकिन कोई हमसे कुछ पूछ ले तो हमें किसी चीज के बारे में ठीक-ठीक कुछ भी नहीं पता है। थोड़ा ये पता है, थोड़ा वो पता है। पर अपने ही बारे में हमें पूरा कुछ नहीं पता है। आइए अपने बारे में, अपने होने के बारे में पता करने की कवायद करते हैं, वरना हमारी हालत दुष्यंत कुमार के शब्दों में कहें तो ठीक ऐसी हो जाएगी कि ‘हम खड़े थे, कि ये जमीं होगी, चल पड़ी, तो इधर-उधर देखा’

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