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दुनिया मेरे आगे- उजाले अपनी यादों के

कोमल हरे पत्तों के बीच सहेज कर रखा हुआ नन्हा दीया गंगा आरती में घंटे-घड़ियाल और शंख ध्वनि की धूमधाम के साथ प्रवाहित किया जाता है, लेकिन जलप्रवाह में बहता हुआ वह कब और कहां चिरनिद्रा में लीन हो जाता है, इसका हिसाब कोई नहीं रखता।
प्रतीकात्मक चित्र।

‘बर्बाद जीनियस’ और ‘मिसफिट साहित्यकार’ जैसे नामों से संबोधित होने वाले, फिल्मी पत्रिका ‘फिल्मी कलियां’ के पूर्व संपादक ब्रजेश्वर मदान अकेली विभूति नहीं थे जो लोक-विस्मृति के साए में धीरे-धीरे शायद गुम हो गए। कोमल हरे पत्तों के बीच सहेज कर रखा हुआ नन्हा दीया गंगा आरती में घंटे-घड़ियाल और शंख ध्वनि की धूमधाम के साथ प्रवाहित किया जाता है, लेकिन जलप्रवाह में बहता हुआ वह कब और कहां चिरनिद्रा में लीन हो जाता है, इसका हिसाब कोई नहीं रखता। विविध क्षेत्रों की तमाम विभूतियां धूमकेतु की तरह तहलका मचाते हुए हमारी चेतना के आकाश पर छा जाती हैं, लेकिन बाद में भोर में मद्धिम होते हुए किसी तारे की तरह नि:शब्द लुप्त हो जाती हैं। फिर उनके लिए लोकमानस पर छा जाना या विलुप्त हो जाना कुछ भी मायने नहीं रखता।

लेकिन वह अंतरिम समय जब कोई इस धरती पर रहते हुए भी किसी समय के परिचितों, प्रशंसकों की यादों के केंद्रबिंदु से हट कर विस्मृति के कुहासे में छिपने लगता है तो बहुत सालता है। प्रशंसा और महिमामंडन के नशे से कहीं अधिक जहरीला होता है विस्मृति का दंश। सक्रिय जीवन बीत जाने के बाद इस गरलपान से बचाने के लिए ही जीवन के तीसरे भाग में वानप्रस्थ आश्रम की परिकल्पना जन्मी होगी। वन के एकाकीपन में मन की सारी कड़वाहट, सारा दंश धुल जाता होगा। अंत में उसी मनन-चिंतन से जीवन के रहस्यों का पर्दा उठा कर संन्यास आश्रम चिर प्रतीक्षित शांति देता होगा।

वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम में खो जाना अब किसको नसीब होता है। परिवार, समाज और अन्य संस्थाओं में अपना किरदार निभा कर नए कलाकारों के लिए जगह बनाते हुए रंगमंच से हटना तो सबको पड़ता है, लेकिन पूरा पलायन कहां संभव हो पाता है। चाहे नायक या नायिका का किरदार निभाने वाले हों या केवल भीड़ के एक सदस्य का किरदार अदा करने वाले, सभी को प्रकाशवृत्त से हटने का दुख सालता है। रास्ते की थकान से क्लांत कुछ भाग्यशालियों को बैठ कर चैन की सांस लेने के लिए किसी घने पेड़ की छाया नसीब हो जाती है। लेकिन आज की दुनिया में बहुतेरे ऐसे हैं, जिन्हें सक्रिय जीवन की गहमागहमी के बाद अकेलेपन की पगडंडी पर चलना पड़ता है। थक कर बैठ जाना और शून्य में निहारना उनकी नियति बन जाती है। तब अपने कार्यकलापों में मगन भीड़भाड़ के बीच नितांत अकेले होकर वे नासिर काजमी के शब्द दोहराते हैं- ‘दिल धड़कने का सबब याद आया, वो तेरी याद थी अब याद आया।’

सक्रिय जीवन बिताते हुए अपनी गतिविधियों में जो इतने मशगूल रहे कि उन्हें अपनों से भी राहो-रस्म निभाने का वक्त नहीं मिलता था। वे जीवन की संध्या में प्रतिदान में दूसरों की विस्मृति और अवहेलना पाकर फिराक गोरखपुरी के शब्द दोहराते हैं- ‘मुद्दतें गुजरीं तेरी याद भी आई न हमें / और हम भूल गए हों तुझे, ऐसा भी नहीं।’कभी सुर्खियों में छाए रहे लोगों से तो फिर भी मीडिया प्रतिनिधि भूली-बिसरी यादों का फीचर तैयार करने के लिए मिल लेते हैं। लेकिन दीर्घायु के श्मशान में यादों की चिताओं से उठते धुंए में झुलसते वृद्धजनों को एकाकीपन खाने को दौड़ता है। विशेषकर उन्हें, जिनकी मुख्य समस्या रोटी, कपड़ा और मकान न हों। पाश्चात्य देशों में अति वरिष्ठजन वृद्धाश्रम में जाकर रहने का विकल्प स्वेच्छा से अपनाते हैं। उनके अपने बच्चे इसमें उनकी मदद करते हैं, वहां जाकर उनसे मिलते-जुलते रहते हैं।

वृद्धाश्रमों के निवासियों को अपनी आयु के अन्य लोगों का संग-साथ मिल जाने से अकेलेपन की यंत्रणा नहीं भुगतनी पड़ती है। लेकिन भारत में अच्छे वृद्धाश्रम गिने-चुने हैं, वह भी केवल महानगरों में। ऊपर से हमारी सांस्कृतिक और सामाजिक परंपराओं की घिसी-पिटी सोच वृद्धाश्रम निवासियों को रहम की नजर से और उनके परिवार वालों और संतानों को हेयदृष्टि से देखती है, बिना यह समझे कि अपनों के बीच रहते हुए मिलने वाली अवहेलना से बेहतर है समवयस्क पराए लोगों के संग-साथ का सुख। इस परंपरावादी सोच के चलते वयोवृद्ध अभिभावकों के लिए केवल भौतिक सुविधाएं जुटा कर अधिकतर लोग संतुष्ट हो जाते हैं।

वृद्ध लोगों से बोलने-बतियाने का समय निकालने की सुध कम लोगों को आती है। अकेलेपन का संत्रास भोगते बुजुर्गों के साथ सप्ताह या पखवाड़े में दो-चार क्षण बैठ लेने का समय भी अगर लोग निकाल सकें और यह संभव न हो तो केवल फोन पर ही दो-चार बातें कर लें, उनका हाल पूछ लें तो उनके मन की गहराइयों में बशीर बद्र के ये शब्द लिखे पाएंगे- ‘उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए!’ काश अपनी दुनिया में मगन आज के लोग अगले वक्त के लोगों की सोचते और अशोक वाजपेयी के शब्दों को समझ कर कह पाते- ‘किसी बेहद बूढ़े के जीवनव्यापी विषाद या / किसी बच्चे की अकारण हंसी की तरह / मैं फिर अऊंगा / भले ही जन्मांतर के बाद / तुम्हारे ही पास!’

 

 

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