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दुनिया मेरे आगेः मशविरा उस्ताद

कुछ लोग हैं जो समझते हैं कि वे हर चीज के बारे में दूसरों से अधिक और बेहतर जानते हैं। ऐसे लोगों को क्या कहेंगे? चतुर सुजान, पारखी, ज्ञानी, जानकार, होशियार या मालवी में कहा जाए तो ‘चतरा’।

यह अलग बात है कि जब आप वास्तव में उनकी राय या मदद लेना चाहें तो वे तरकीब से किनारा कर लेंगे और कहेंगे कि अब बात और परिस्थिति बदल गई है।

कुछ लोग हैं जो समझते हैं कि वे हर चीज के बारे में दूसरों से अधिक और बेहतर जानते हैं। ऐसे लोगों को क्या कहेंगे? चतुर सुजान, पारखी, ज्ञानी, जानकार, होशियार या मालवी में कहा जाए तो ‘चतरा’। हम किसी भी विषय की बात करें, वे तत्काल अपनी प्रामाणिक और विशेषज्ञ राय दे देंगे और कहेंगे कि जो वे कह रहे हैं, वही अंतिम है। वे कम पैसे में मुनाफे का सौदा कर सकते हैं। उन्हें यह हुनर याद है और इसी कारण न सिर्फ घर में, बल्कि आसपास भी उनकी ख्याति होती है और खरीद-फरोख्त के वक्त उनकी राय ली जाती है। ऐसे ही एक होशियार व्यक्ति ने अपने पड़ोसी को गेहूं खरीदवाए। बाद में पता चला कि गेहूं किसी छोटी-सी दुकान से खरीदे गए थे, जिनमें मिट्टी और घुन ज्यादा और गेहूं कम थे। लेकिन जिसने खरीदवाए थे, उस पर कोई असर नहीं पड़ा।

एक महाशय होशियारी से आम खरीद रहे थे। उन्होंने न जाने कितने किस्म के आम चखे और फिर दाम पूछा। मैं भी खरीद रहा था, पर आम विशेषज्ञ बनने में कोई दिलचस्पी नहीं थी। पर उन्होंने किसी का रस पतला तो किसी का रंग कम पीला और गुठली बड़ी या किसी का रस अधिक मीठा तो किसी का खट्टा बताया। दाम भी उन्हें ज्यादा लगे। मैंने जब उसी दाम पर दो किलो ले लिए तो वे मुझसे बोले कि मैंने भाव बिगाड़ दिए। आम वाले ने उनसे कहा कि जिस दाम में वे चाह रहे हैं, उस दाम में उन्हें अगले दिन ही वे आम मिलेंगे और उसके अगले दिन शायद और भी सस्ते मिल जाएंगे। लेकिन उन पर इसका कोई असर नहीं हुआ और वे अगली दुकान की ओर बढ़ गए। वे यही मानते रहे कि उनकी समझदारी और होशियारी से खीझ कर आम वाले ने ऐसी बात कही।

ऐसे लोग दूसरे लोगों को नासमझ मानते हैं। जब वे किसी को कोई भी चीज खरीद कर लाते देखते हैं तो दाम पूछ कर महंगा या गुणवत्ता में हल्का बताते हैं और ऐसी टिप्पणी करते हैं मानो वे उसका मजाक उड़ा रहे हों। मानो सुविधा की सारी अक्ल उन्हीं के पास है। उन्हें अपनी हर चीज में सुर्खाब के पर नजर आते हैं और वे उसकी तारीफ करते नहीं थकते। जबकि औरों की चीजों में वे नुक्स ढूंढ़ते रहते हैं और उनमें उन्हें ऐब दिखाई देती है। उनका सीधा-सा गणित है- जो दूसरों का है, वह घटिया और जो उनका है वह श्रेष्ठ है।
हम जब भी उन्हें बताएं या वे हमसे पूछें कि फलां-फलां चीज आपने कितने में ली, तो वे यही कहेंगे कि आप ठगे गए हैं। बेहतर होता आपने उनकी राय ले ली होती।

यह अलग बात है कि जब आप वास्तव में उनकी राय या मदद लेना चाहें तो वे तरकीब से किनारा कर लेंगे और कहेंगे कि अब बात और परिस्थिति बदल गई है। यानी वे आपके काम ही नहीं आएंगे पर सुझाव, राय और गुणवत्ता के बारे में अपनी आदत नहीं बदलेंगे। ये लोग इसी खुशफहमी में रहते हैं कि ये सब कुछ जानते हैं और हर बारे में अंतिम राय देने के हकदार हैं। ये बिन मांगे भी सलाह देते रहते हैं। उन्हें आप ‘रायचंद’ कहें या ‘मशविरा उस्ताद’, ऐसे लोग हर गली, मोहल्ले और शहर में हैं। वे सोचते हैं कि वे हैं तो जहान है। यह उनका परम कर्तव्य है कि वे अपनी सलाह और राय से लोगों की जिंदगी खुशहाल करें। यह अलग बात है कि अन्य लोग उन्हें अनदेखा करते हैं और उनकी राय को कोई महत्त्व नहीं देते। लेकिन यहां सवाल हमारे खुद के बारे में सोचने का है।

दरअसल, हम ही श्रेष्ठ हैं, सब कुछ हैं और दुनियाभर का ज्ञान सिर्फ हमारे ही पास है, यह सोचना एक तरह की कुंठा है। वे ही लोग अपने को सब कुछ समझते हैं, जो हीन भावना से ग्रस्त होते हैं। पर ऐसे लोग होते हर समाज में हैं और हर समय में होते रहे हैं। साहित्य में भी एक कहानी लिख कर खुद को प्रेमचंद समझने वालों की कमी नहीं है। अपने मुंह मियां मिट्ठू और खुद को तीसमार खां समझने वाले क्या कम हैं? ऐसे लोगों को ध्यान में रख कर ही ताज भोपाली ने क्या खूब कहा था- ‘तुम्हारी बज्म के बाहर भी एक दुनिया है, मेरे हुजूर बड़ा जुर्म है ये बेखबरी’!

विक्टोरियाई युग में ओलिवर गोल्ड स्मिथ ने इन्हीं सब गुणों को देख कर ग्रामीण स्कूल मास्टर का चरित्र रचा था, जिसके हरफनमौला गुणों को देख कर गांव के भोले-भाले लोग हैरान थे कि गांव का ही मास्टर जलवायु, मौसम, जमा-खर्च से लेकर इतिहास, भूगोल, फसल, साहित्य और समसामयिक घटनाओं की जानकारी भला कैसे रख पाता था! पर वह था कि जो भोले-भाले ग्रामीणों को सब बातें बता कर विस्मित और आश्चर्यचकित करता रहता था। जब ऐसे लोग होते ही आए हैं, और हैं भी तो इस तरह के ‘होशियार जी’ की बातों का आनंद लेने में ही भलाई है।

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