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दुनिया मेरे आगे: बिन बाई सब सून

यह सही है कि शहरी लोगों की इस आवश्यकता ने बहुतों की जीविका चलाने का काम किया है। लेकिन इस आड़ में जिस तरह बालश्रम का इस्तेमाल किया जा रहा है, वह चिंतनीय है। सरकारी प्रतिबंध के बावजूद घरों में छोटी लड़कियों घरेलू सेविकाएं बनती जा रही हैं।

Author Published on: April 1, 2020 3:07 AM
घरों में काम करने वाली बाई के लिए शहरों में कोई स्थायी रोजगार नहीं है।

प्रमोद द्विवेदी
दस-बारह साल पहले मैंने और अचर्ना ने श्रम की महत्ता स्थापित करते हुए फैसला किया कि घर में हम सब मिल कर काम करेंगे। सर्वव्यापी बाई जगत को बाय-बाय करते हुए हमने घरेलू काम बांट लिया। तय हो गया कि कौन सफाई करेगा, कौन रसोई में जाएगा। बच्चों को भी इस व्यवस्था में भागीदार बनाया और चंद दिनों में ही हमने देखा कि बाई के बिना तो सारा काम ज्यादा आनंद और आजादी से होता है। अपने हिसाब से सफाई करो, अपने हिसाब से मतलब भर का खाना बनाओ। जब चाहे घर से निकल कर तफरीह करो या समाज में अपनी भूमिका दिखाओ। बाई वाली बंदिश थी ही नहीं। वरना पहले हाल यह था कि कहीं बैठे हो तो यह कह कर निकलना पड़ता था कि सॉरी, बाई आने वाली होगी। नहीं मिले तो चली जाएगी। अब ऐसा कुछ नहीं था। समय, श्रम और सेवा सबके मालिक हम ही थे।

लेकिन आसपास वालों के लिए यह भरोसे लायक बात ही नहीं थी। हमने जब बताया कि बारह साल से हमारा घर बाईविहीन है तो आरामपरस्त और बाईपरस्त पड़ोसी हमारा मजाक उड़ाते कि यार ये गोली देना बंद कर दो। आजकल के सुविधाभोगी काल में मुमकिन है कि कोई बाई के बिना रह पाए। हमने कसम खाकर बताया कि भइया हम पूरी तरह बाईमुक्त हैं, तो आसपास के भाईजान कहते कि आप तो कमाल करते हो। हम जब विदेशों की मिसाल देते तो वे कहते कि यह फॉरेन नहीं, इंडिया है। यहां बाई के बिना घर चलाने की कल्पना ही नहीं की जा सकती। ऐसा काम वही करेगा, जो या तो पक्का चिपाड़ होगा, या दिमाग से सरका हुआ।

बहरहाल, हम साबित ही नहीं कर पाए कि अभिजात जगत में बाई बुनियादी जरूरत नहीं है। जो मजबूर हैं, अशक्त हैं या वक्त के टोटे और मसरूफियत के मारे हैं, पति-पत्नी दोनों काम-धंधे वाले हैं, वहां तो बाई-सेवा की जरूरत समझी जा सकती है। पर दिन भर घर में पसरी रहने वाली भद्र देवियां बाई पर आश्रित हो जाएं, यह हमारी समझ में नहीं आया। कुछ बाइयों से यह तक पता लगा कि हमारी चमकदार सोसाइटी में ऐसी-ऐसी बेगम साहिबा हैं, जो आंटा गुंथवाने से लेकर सब्जी कटवाने तक के लिए बाइयों की सेवा लेती हैं। बाइयों की महिमा का यह हाल था कि हमारे यहां होने वाले सामाजिक जलसे भी बाइयों की समय सारणी से तय होते हैं। मसलन राष्ट्रीय पर्वों पर झंडारोहण का समय बाई-प्रस्थान के बाद ही तय माना जाता था। देरी से आने वाले नागिरक एक ही बहाना लेकर आते कि क्यां करे बाई ने लेट करवा दिया।

लेकिन इस बाईमय आर्यावर्त में 25 मार्च 2020 के बाद नया इतिहास लिख दिया गया। गाजियाबाद के खाए-अघाए इलाके रामप्रस्थ ग्रींस (जहां हमारा निवास है) में अचानक कर्मवीरों और मेहनतकश मालकिनों का अभ्युदय हो गया। जो कहती थीं- फर्श मखमल पर मेरे पांव छिले जाते हैं, वे पारंपरिक झाड़ू के साथ सनद्ध थीं। हांफते हुए पोछा लगा रही थीं और बदमर्ज कोरोना को कोस रही थीं कि मुए तूने ये दुर्दिन दिखा दिए। हालांकि अब इनमें कुछ ऐसी आशावादी देवियां और वर्क टू होम वाले देवता भी हैं, जो कहने लगे हैं कि आजकल लेडीज के मुटाने और शुगर-बीपी की वजह एक यह भी है कि वे हाथ ही नहीं हिलातीं। चलो अच्छा ही हुआ, कि कोरोना जी ने घरकैद की नौबत ला दी। अब पराई आस पर रहने की आदत तो खत्म होगी

तो क्या माना जाए कि पहली बार अनजाने में ही सही, हमने श्रम और आत्मनिर्भरता की सत्ता स्थापित होते देखी है। और शायद यह सबक इतना प्रभावी होने वाला है कि हमें मानना होगा कि अपने काम खुद करना फख्र और आत्मविश्वास की बात है। काम के लिए दूसरे पर आश्रित होना और हुक्म चला कर काम करवाना सामंती फितरत की निशानी है।

यह सही है कि शहरी लोगों की इस आवश्यकता ने बहुतों की जीविका चलाने का काम किया है। लेकिन इस आड़ में जिस तरह बालश्रम का इस्तेमाल किया जा रहा है, वह चिंतनीय है। सरकारी प्रतिबंध के बावजूद घरों में छोटी लड़कियों घरेलू सेविकाएं बनती जा रही हैं। हर साल पुलिस की ओर से आने वाली हिदायतें भी आरामतलबी जरूरत के आगे पस्त हो जाती हैं। शायद कोरोनो की आपदा अब कोई रास्ता निकाल पाए। कोई ऐसा रास्ता निकले कि गरीब की रोजी भी ना मारी जाए और निठल्ले समाज को हाथ-पांव हिलाने की आदत पड़े।

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