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दुनिया मेरे आगेः रिवायत की लीक

बदलते हुए समाज और परिस्थितियों के अनुसार हम बहुत बदले हैं। इस प्रकार के रीति-रिवाज समाज में मौजूद किसी भी प्रकार की बराबरी के अधिकार को नुकसान पहुंचाते हैं।

Author नई दिल्ली | Updated: August 9, 2019 2:09 AM
एक ने बताया कि इसका मकसद मरने वाले के घर में जो घर का मुखिया बनता है उसे सार्वजानिक रूप से घोषित करना होता है।

रुबल मित्तल

पिछले दिनों अपने एक संबंधी की मृत्यु होने पर उनके घर जाना हुआ। वहां शोक सभा को लेकर बातें चल रही थीं, जिसमें एक ऐसी प्रथा की बात चली जो वहां के लोगों के मुताबिक जरूरी रस्म थी पर मेरे लिए एक भूली-भटकी बात। उस रस्म का नाम था ‘पगड़ी’ जो उत्तर भारतीयों में मृत्यु के बाद होने वाले कर्मकांडों में से एक है। घर से दूर रहने के कारण मेरे दिमाग से ये सब कुछ उतर-सा गया था, लेकिन वहां पहुंचते ही सब कुछ पहले जैसा नजर आने लगा। जिज्ञासावश मैंने अपने एक संबंधी से पूछ लिया कि ‘पगड़ी’ का मतलब क्या होता है और ये क्यों किया जाता है!

मेरे इस तरह से प्रश्न करने से माहौल में कुछ तनाव-सा महसूस हुआ, फिर भी मैं अपने आपको मासूम की तरह दिखाते हुए अपने प्रश्न पर टिकी रही। इसका उत्तर देने वाले कम थे और डांट कर चुप कराने और खुद को अमेरिकी और दंभी मानने का आरोप लगाने वाले ज्यादा। बहरहाल, एक बुजुर्ग बोले कि ये प्रथा सालों से चलती आ रही है, हमारे बड़े-बूढ़ों ने भी ये किया है, हम भी करते हैं और आगे तुम्हें भी करना है। इसका पूरा उद्देश्य अपने मृत जन को शांति से और आदर से इस दुनिया से विदा करना है। फिर भी मैं अपनी जिद पर टिकी थी। मैंने इस तरीके से बात दोबारा रखी कि मुझे कुछ समझ नहीं आया। फिर तो सामने वालों में जैसे ‘पगड़ी’ का अर्थ बताने की होड़-सी चल पड़ी।

एक ने बताया कि इसका मकसद मरने वाले के घर में जो घर का मुखिया बनता है उसे सार्वजानिक रूप से घोषित करना होता है। उसे पगड़ी पहना कर इस तरह से घर का कर्ता-धर्ता घोषित कराया जाता है। मैंने पूछा कि मुखिया मतलब? तो थोड़े खीझ के साथ उत्तर मिला कि घर को चलाने वाला पुरुष। फिर मैंने कहा कि अगर ऐसा है तो पति की मृत्यु के बाद पत्नी को मुखिया बनाना चाहिए, हर हाल में बेटे यानी पुरुष को क्यों!

घूरती आंखों को नजरअंदाज करते हुए मैंने फिर प्रश्न किया कि अगर किसी परिवार में पुत्र न हो तो? अब सामने वाले ने चिढ़ते हुए कहा कि उस परिस्थिति में उनके खानदान में से चाचा-ताऊ के बेटों को उस परिवार का मुखिया घोषित किया जाता है। मुझे पता था कि अब मेरे सवालों की वजह से माहौल मेरे विपरीत होता जा रहा है, फिर भी पूछा कि किसी भी चाचा-ताऊ का बेटा किसी दूसरे के घर का कैसे कर्ता-धर्ता बन सकता है! अपना गुजारा तो उस परिवार को अपने ही दम पर करना होगा! मेरी इस बात के बाद वहां बैठे सभी लोगों को झल्लाहट होने लगी होगी, इसीलिए वे सभी वहां से दूसरी ओर चले गए।

दरअसल, वहां लोगों को इस रिवाज के बारे में उतना ही अंदाजा हो सकता था, जितना एक आम पारंपरिक व्यक्ति को हो सकता था। इस रिवाज का लब्बोलुआब यह था कि इसके जरिए सालों से चलती आ रही संस्था परिवार का आधार पुरुष की सत्ता और ज्यादा सुरक्षित और मजबूत करना है। बेटे की चाहत शायद इसी वजह से हम भारतीयों को समय के अनुसार खुद को न बदलने की गुंजाइश देती है। कृषि प्रधान देश में बेटों की इच्छा खेतों पर अपने हक को सुरक्षित रखने का जरिया थी। परंपरागत तौर पर बिटिया तो शादी करके दूसरे के घर चली जाती है, पर बेटों से ही वंश की सुरक्षा मानी जाती है।

समय बदलने पर हम भारतीय अपने खेतों की जिंदगी छोड़ कर शहरों में आ बसे और शहरी संस्कृति के साथ अपनी ग्रामीण आंचलिकता को गड्डमड्ड कर अपना जीवन जीते आ रहे हैं। नतीजा यह निकला कि अपनी कुछ सांस्कृतिक-सामाजिक विरासत को हमने बिना सोचे-समझे आत्मसात कर लिया और कुछ में समय के हिसाब से फेर-बदल कर लिया। लेकिन जहां पर भी बात धर्म और लोक-परलोक से जुड़ी हुई थी, उसे बिना कुछ प्रश्नों के ज्यों का त्यों उतार लिया गया, क्योंकि आदमी अपने विवेक को उपयोग में लाने से कतराता है। उसे लगता है कि जैसे सब करते आ रहे हैं, वैसे करना ही सही रहेगा।

आज एक ओर लड़की पैदा कर उसे पढ़ाने-लिखाने की बातें होती हैं, वहीं इस प्रकार के रीति-रिवाजों से एक झटके में इस बात का औचित्य खत्म किया जाता है। परिवार में किसी की मृत्यु होने पर जितना कर्तव्य एक बेटे का उस परिवार को संभालने के लिए होता है, उतना ही बेटियों का। फिर इस प्रकार के विधि-विधान से हम किसी भी बराबरी के हक को और हल्का करने का काम करते हैं। इसीलिए कोई आश्चर्य नहीं कि जब हम बेटों की चाह में घूमते मां-बाप देखते हैं, तो उनका बेटों की शादी में खूब पैसे लेने के अलावा अपना लोक-परलोक सुधारने की भी इच्छा छिपी होती है।

बदलते हुए समाज और परिस्थितियों के अनुसार हम बहुत बदले हैं। इस प्रकार के रीति-रिवाज समाज में मौजूद किसी भी प्रकार की बराबरी के अधिकार को नुकसान पहुंचाते हैं। थोड़े से विवेक से यह संभव हो सकता है कि हम आने वाली पीढ़ियों को एक खुला और समान अधिकारों वाला समाज दे सकें।

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