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दुनिया मेरे आगेः स्मृतियों में गांव

गांव मुझे बहुत पसंद हैं। हालांकि वहां रहने की अपनी बड़ी समस्याएं भी हैं, लेकिन इसके बावजूद गांव मुझे आकर्षित करता है। अब तो हालात इतने खराब हैं कि गांव के लोग खुद भी वहां रहना नहीं चाहते। गांवों के सब पुराने काम लगभग खत्म हो चुके हैं, खासकर हाथ से किए जाने वाले काम। हालांकि सामाजिक दृष्टि से देखें तो समाज के अलग-अलग समूहों के पारंपरिक पेशे की अपनी समस्याएं थीं।

Author Published on: October 12, 2019 12:56 AM
ग्रामीण इलाकों में अशिक्षा और गरीबी आज भी भयानक स्तर तक कायम हैं। जब तक वहां के बच्चों को अच्छी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिल जाती, तब तक वहां के जीवन में कोई बदलाव आएगा, ऐसा सोचना शायद महज खामखयाली है। अशिक्षा के कारण ही गांवों में आज भी अंधविश्वास और सामाजिक कुरीतियां जमी हुई हैं।

घनश्याम कुमार देवांश

मिट्टी की एक खुशबू होती है, इसका पता तब चला, जब सब कुछ छोड़ कर मैं गांव से शहर चला आया। या फिर कहा जाए कि माता-पिता द्वारा शहर में ले आया गया। शहर, जहां चारों ओर कंक्रीट ही कंक्रीट दिखता है, मिट्टी के लिए थोड़ी बहुत जगह या तो बाग-बगीचों और पार्कों में होती है या फिर घर के गमलों में। जाहिर है, शहर में आने के साथ ही मिट्टी की अपनी खुशबू से भी दूर हुआ। जब अपने गांव से दूर हो गया, तब उसकी मिट्टी की खुशबू और उसकी कीमत का अंदाजा हुआ। आज भी जब गांव जाता हूं तो लगता है, अपने घर आ गया हूं।

गांव मुझे बहुत पसंद हैं। हालांकि वहां रहने की अपनी बड़ी समस्याएं भी हैं, लेकिन इसके बावजूद गांव मुझे आकर्षित करता है। अब तो हालात इतने खराब हैं कि गांव के लोग खुद भी वहां रहना नहीं चाहते। गांवों के सब पुराने काम लगभग खत्म हो चुके हैं, खासकर हाथ से किए जाने वाले काम। हालांकि सामाजिक दृष्टि से देखें तो समाज के अलग-अलग समूहों के पारंपरिक पेशे की अपनी समस्याएं थीं। लेकिन इससे इतर देखें तो खेती से लेकर घर-बाहर के अनेक ऐसे काम हैं, जिन्हें अब मशीनों के जरिए किया जाता है। इससे वहां आजीविका और पेट पालने के साधन पहले से बहुत कम हो गए हैं। खेती के खर्चे इतने ज्यादा बढ़ गए हैं कि फसल तैयार होने पर आमतौर पर उसकी लागत का खर्चा भी नहीं निकल पाता। जो बैंक किसानों की मदद के नाम पर किसान क्रेडिट कार्ड और कर्ज की योजनाएं लेकर सामने आए थे, उन्होंने किसानों के जीवन को बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। सरकार की ओर से कर्ज और दूसरी सुविधाओं की घोषणा का जमीनी सच यह है कि किसान कर्ज के चंगुल में ऐसे फंस जाते हैं कि फिर उनका निकलना ही मुश्किल हो जाता है।

ग्रामीण इलाकों में अशिक्षा और गरीबी आज भी भयानक स्तर तक कायम हैं। जब तक वहां के बच्चों को अच्छी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिल जाती, तब तक वहां के जीवन में कोई बदलाव आएगा, ऐसा सोचना शायद महज खामखयाली है। अशिक्षा के कारण ही गांवों में आज भी अंधविश्वास और सामाजिक कुरीतियां जमी हुई हैं। महिलाओं की स्थिति कई स्तरों पर खराब है और ज्यादातर महिलाएं अब भी अपने-अपने घरों में बंद जीवन गुजारती हैं। उनके पास न सपने हैं, न उन सपनों को पूरा करने के लिए उड़ान। सुविधाओं का जैसा भयानक अकाल गांवों में दिखाई देता है, वह आतंकित करने वाला है।

हालत यह है कि जिले के सबसे बड़े अस्पताल भी दयनीय हालत में दिखाई देते हैं। शायद ही कहीं डॉक्टर ईमानदारी से अपनी ड्यूटी करते दिखाई देते हैं। ऐसे में इलाज की क्या स्थिति होगी, यह अंदाजा ही लगाया जा सकता है। आमतौर पर देखा गया है कि डॉक्टरों के निजी क्लीनिकों और बाकी अस्पतालों में मरीजों के साथ बेहद संवेदनहीन तरीके से बर्ताव किया जाता है। अस्पतालों के दृश्य देख कर कई बार तो विश्वास नहीं होता कि यह आधुनिक युग का कोई अस्पताल है।

आम बातचीत में ‘गंवार’ शब्द का प्रयोग धड़ल्ले से किया जाता है। खासतौर पर पढ़े-लिखे और खुद को समझदार मानने वाले लोग आमतौर पर पर इसका प्रयोग करते हैं। मुझे लगता है कि यह शब्द संभवत: गांव से बना और प्रचलन में आया होगा। शहर के लोग इस शब्द का इस्तेमाल मूर्ख, असभ्य और अनपढ़ आदमी के अर्थ में करते हैं। इससे हम बड़ी सरलता से यह अनुमान लगा सकते हैं कि गांव के लोगों को लेकर शहर के लोग क्या सोचते हैं! यों शहरों में भी हालात कुछ ज्यादा अच्छे नहीं हैं, लेकिन गांवों से बेहतर है। शहर में लोग अपने रोजगार का प्रबंध कर लेते हैं। भोजन-पानी का जोड़-जुगाड़ हो जाता है। मनुष्य वहां मनुष्यों की भीड़ में रह कर खुद को सुरक्षित महसूस करता है।

लेकिन शहर भी इन दिनों बुरी तरह से अव्यवस्था के शिकार हैं। इधर-उधर बने बेतरतीब घर-मकान, बस्तियां शहर में जीवन का एक कठोर चेहरा दिखाती हैं। एक तरह से देखा जाए तो शहर कृत्रिम हैं, जबकि गांव सहजता से बसते हैं। शहर को अगर ठीक से योजना बना कर न बसाया जाए तो सदियों तक उसके नफा-नुकसान चलते रहते हैं। इसलिए अच्छा हो कि उन्हें बेहतर योजना बना कर बसाया जाए। लोगों तक पीने का पानी कैसे पहुंचेगा, एक इलाके में कितनी जनसंख्या होनी चाहिए, रोजगार के क्या साधन होंगे, कितनी दुकानें होंगी, यातायात की क्या व्यवस्था होगी, कानून, शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़ी सुविधाएं कैसी होंगी- ऐसी बहुत सारी बातों का खयाल सरकार को रखना चाहिए। एक तरह से देखा जाए तो शहर और गांव, आज दोनों के लिए ही बहुत अच्छी योजनाओं की जरूरत है, जिसमें सभी सुविधाओं और आवश्यकताओं का ध्यान रखा जाना चाहिए। सिर्फ विकास के नाम पर गांव को बदल कर शहर नहीं बना देना चाहिए!

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