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दुनिया मेरे आगेः विमर्श के ठिकाने

थड़ी की कड़क अदरक वाली चाय का स्वाद ही अलहदा है। वह स्वाद नजाकत और तमाम तामझाम के साथ दूध, शक्कर, चायपत्ती डाल कर चाय बनाने वाले ब्रिटिश अंदाज में नहीं आ सकता। चाय बनाने की यह ठेठ खांटी शैली ही चाय को सर्वहारा तक जोड़ पाई है और उसका सफर ऊंचे होटलों, महलों से निकल कर आम जन तक पहुंचा है।

Author Updated: December 26, 2019 3:00 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

चाय की थड़ियों को विमर्श का नया केंद्र या आधुनिक चौपाल कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। छोटी-बड़ी चाय की ये थड़ियां दरअसल मिलने-मिलाने, दो पल बतियाने का सस्ता ठिकाना है। इसे हम अपनी प्रेमिका से गुफ्तगू करने या अभिसार के नितांत निजी क्षणों के रूप में तो उपयोग नहीं कर सकते, लेकिन संक्षिप्त मुलाकात करने, कुछ बातों के आदान-प्रदान के बहाने मिलने के प्राचीन पनघटों की तरह तो उपयोग कर ही सकते हैं। अधिकतर ऐसे शहरों में जहां कामगार आबादी ज्यादा है या जहां प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का वातावरण है, वहां ये चाय की गुमटियां बहुतायत में पाई जाती हैं। इनके माध्यम से लाखों लोगों को रोजगार भी मिल रहा है।

थड़ी की कड़क अदरक वाली चाय का स्वाद ही अलहदा है। वह स्वाद नजाकत और तमाम तामझाम के साथ दूध, शक्कर, चायपत्ती डाल कर चाय बनाने वाले ब्रिटिश अंदाज में नहीं आ सकता। चाय बनाने की यह ठेठ खांटी शैली ही चाय को सर्वहारा तक जोड़ पाई है और उसका सफर ऊंचे होटलों, महलों से निकल कर आम जन तक पहुंचा है। चाय के ये ठिकाने दिन-रात फल-फूल रहे हैं। यहां पर तीखी राजनीतिक बहसें होती हैं, गंभीर साहित्यिक चर्चाएं होती हैं, दफ्तरों का ‘एक दूसरे की शिकायत करें’ कार्यक्रम आयोजित होता है और संबंध सुधार कार्यक्रम के तहत नई बिसात भी बिछाई जाती है। चाय की इन थड़ियों पर विद्यार्थी और सरकारी या गैर-सरकारी कर्मचारी से लेकर मजदूर और पार्टी कार्यकर्ता तक थकान मिटाने, ऊर्जा हासिल करने और भड़ास निकालने भी आते हैं।

किसी जमाने में बड़े और नामचीन शहरों में कॉफी हाउस होते थे। इलाहाबाद, लखनऊ, मुंबई और दिल्ली की शामें इससे ही आबाद होती थीं। कलाकारों, पत्रकारों, साहित्यकारों के ये प्रिय ठिकाने थे, जहां खुल कर संवाद होता था, नई योजनाएं जन्म लेती थीं और तीक्ष्ण बहसें भी आकार लेती थीं। आज वे कॉफी हाउस लुप्तप्राय हैं। उनकी जगह बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने कॉफी रेस्तरां की शृंखलाएं डाल ली हैं, जहां निजता है, रम्य वातावरण है, लेकिन वैसा जनतंत्र और खुलापन नहीं है। असल में निजीकरण ने मनुष्य को एकाकी छोड़ दिया है, जहां उसे अवकाश तो है, लेकिन संवाद के रास्ते बंद हो गए हैं। वह अलग-थलग पड़ गया है। इन ठिकानों के बंद होने का अभिशाप हम भुगत रहे हैं। हमारी चेतना कुंद हो गई है, संवेदनाओं को काठ मार गया है। बस फेसबुक पर किसी के निधन के मौके पर ‘आरआइपी’ लिख कर कर्तव्यों की इतिश्री की जा रही है। जब बातचीत ही नहीं होगी, तर्क-वितर्क नहीं होंगे तो दूसरे के विचारों को सुनने-समझने और मनन करने की गुंजाइश ही कहां बचेगी? ऐसे में हम एक अंधानुकरणवादी पिछलग्गू समाज में बदलते जा रहे हैं जो अपने मत के आग्रह की पूंछ पकड़ कर पूरा जीवन पार कर लेता है। न वह अपने कुएं से बाहर झांकना चाहता है, न सोचना-समझना।

हम एक बंद समाज में बदलते जा रहे हैं, कई थोथी आधुनिकताओं के छद्म दावे के बावजूद। चाय की इन छोटी दुकानों ने गांव की चौपाल के ध्वंस रूप की जगह स्थान बना लिया है। शहर की हलचल, घटनाक्रमों की ताजा खबर यहां उपलब्ध है। प्रश्नोत्तरी या जरूरी टिप्पणियों को लोग साझा भी कर रहे हैं और अच्छे या खराब शिक्षक की समीक्षा भी हो रही है। हल्का-फुल्का मजाक और चुटकुले भी तैर रहे हैं और प्रेम प्रसंगों की कानाबाती भी। मेरा शहर कोचिंग के लिए विख्यात है और लाखों विद्यार्थी यहां पढ़ने आते हैं। ये चाय की थड़ियां एक तरह से उनके आश्रय स्थल हैं, थकान के बाद थोड़ा आराम करने के ठिकाने हैं। बल्कि नीरसता के सघन कार्यक्रम की ऊब से कुछ पल चुरा कर वे नई ऊर्जा प्राप्त करते हैं। बाबू चाय वाला, मंगल चाय वाला… जैसे कई नाम हैं जो विद्यार्थियों के बीच खासे लोकप्रिय हैं। ये कोई मशहूर ब्रांड के नाम नहीं हैं, लेकिन इनकी चाय की तासीर और जायका जुबान पर चढ़ चुका है। इसमें से एक चाय वाले ने तो अपने व्यापार को विस्तार देते हुए शहर के दो-तीन क्षेत्रों में अलग अलग शाखाएं भी शुरू कर दी हैं।

चाय की इन दुकानों पर बैठने के लिए समय की कोई पाबंदी नहीं है। कोई शिगूफेबाजी नहीं है, सर्विस टैक्स या जीएसटी का व्यर्थ संकट नहीं है। उधार, नकद, खाते- सब चलते हैं। अपने बेटे से मैंने एक दिन पूछा कि तुम थड़ियों पर चाय पीने क्यों जाते हो, जबकि घर में इतनी अच्छी चाय मिलती है। उसने जवाब दिया कि वहां चाय के साथ जो चर्चा का आनंद है, अखबारों का वाचन है, अलग-अलग लोगों की बातचीत सुन कर समृद्ध होने का सुख है, वह घर में कहां है! घर में तो औपचारिक वातावरण रहता है। मैं निरुत्तर था। चाय की गुमटियों में धड़कते, नव आकार लेते भारत को पता नहीं हम शहरी चकाचौंध के चलते महसूस कर भी पा रहे हैं या नहीं, लेकिन विमर्श के ये नए मुकाम कम महत्त्वपूर्ण नहीं। किसी समाजशास्त्रीय अध्ययन के लिए तो बेशक शोधपूर्ण हैं।

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