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दुनिया मेरे आगे: निज भाषा

हमें नहीं भूलना चाहिए कि भाषा की समृद्धि उत्तम साहित्य से होती है और उसकी समृद्धि से उसके बोलने वालों का जीवन स्तर ऊंचा उठता है।

Author नई दिल्ली | Published on: August 10, 2019 4:28 AM
सांकेतिक तस्वीर।

शोभा जैन 

गांधीजी ने कुछ स्वप्न देखे थे, जिनमें से एक था- ऐसे स्वराज की स्थापना हो, जो भाषा, जाति और धर्म की संकीर्ण भावना से परे आदर्श समाज के निर्माण का हो। लेकिन आज की जो हालत हम अपने चारों ओर देखते हैं, उससे यही लगता है कि हम इस स्वप्न को बहुत पीछे छोड़ आए हैं। इन दिनों आक्रामक भाषा चलन में है। इसे चलन कहा जाए या सभ्यता का ह्रास- सोचती हूं कि आखिर क्या कहा जाए इसे? समय और युगीन संदर्भों में बदलाव के साथ लोकतंत्र में भी भाषा के जायके बदल रहे हैं।

माना जाता है कि मनुष्य भाषा में जीता है। हम जिस समय में जी रहे हैं, वह विश्व बाजारवाद का दौर है। हम आधुनिकता के अंत और उत्तर आधुनिकता की ओर अग्रसर एक ऐसे काल में हैं, जिसमें समय मनुष्य का न होकर मशीन का है… उपकरण का है और नई-नई अवधारणाओं का है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हमने अपने देश में लोकतांत्रिक शासन-व्यवस्था को स्वीकार किया, जहां जनता के चुने हुए प्रतिनिधि देश की कानून और व्यवस्था का संचालन करें।

जो सरकार जनता के द्वारा चुनी जाती है, उसमें जनता की भाषा की प्रधानता होना भी स्वाभाविक है। मगर हम इसके ठीक उलट स्थिति में जी रहे हैं। अंग्रेजी ने जिस प्रकार हमारी अपनी भाषाओं का विकास अवरुद्ध किया है, इससे स्वभाषा से लोगों की दूरियां बढ़ती ही जा रही हैं। बाजार की सुविधा के लिए गढ़े जाने वाले शब्द जन्म ले रहे हैं। हम टेलीविजन पर उपभोक्ता सामग्री के विज्ञापनों में इस विरूपीकरण को देख सकते हैं, जिसमें अंग्रेजी और हिंदी की खिचड़ी से निर्मित अशुद्ध भाषा से संपन्न परिवारों की जीवन-शैली और मूल्यों को प्रदर्शित किया जाता है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि अंग्रेजी बहुत ही समृद्ध भाषा है और आजकल संसार के कई समृद्ध देशों में राजभाषा के रूप में भी स्वीकृत है। मगर है यह विदेशी भाषा ही और हमें इस सत्य को स्वीकारने में कोई शर्म नहीं कि वर्चस्व की इसकी तमाम कोशिशों के बावजूद आज भी इसमें समूची जनता का एक नगण्य अंश ही कुशलता प्राप्त कर सका है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही देश में भाषाओं की प्रगति में काफी तेजी आई है, लेकिन स्वभाषा का प्रयोग अपनी सुविधानुसार तोड़-मरोड़ कर किया जा रहा है। माल बेचने और गांव-कस्बों में नए बाजार बनाने के लिए हिंदी का जिस सुविधा के साथ प्रयोग हो रहा है, वह एक तदर्थ और व्यावहारिक उद्देश्य के लिए है।

किसी व्यापार आदर्श, राष्ट्र निर्माण या मूलगामी परिवर्तन के लिए नहीं। कारोबार में भी किसी उच्च प्रशासनिक बैठक की बातचीत हिंदी में नहीं होती। विज्ञापन एजेंसियों में सारे विज्ञापन पहले अंग्रेजी में बनते हैं और बाद में जैसे-तैसे उनका कामचलाऊ हिंदी में अनुवाद कर दिया जाता है। अनुवाद के बाद किसी वाक्यांश का भाव बेहद सतही या कई बार हास्यास्पद हो जाता है। भाषा की यह दुर्दशा केवल बाजार में नहीं, राजनीति में भी है। जबकि लोकतंत्र में शपथ की भाषा अनुशासन है।

हमें नहीं भूलना चाहिए कि भाषा की समृद्धि उत्तम साहित्य से होती है और उसकी समृद्धि से उसके बोलने वालों का जीवन स्तर ऊंचा उठता है। अपनी समृद्ध संस्कृति को उजागर करने के लिए देशी भाषाओं को सगर्व प्रोत्साहन देना बहुत जरूरी है। सत्ता पक्ष की राजनीति करने वालों को सोचना होगा कि लोकतंत्र की मर्यादा और भाषा की रक्षा कैसे की जाए। समाज और संस्कृति से भाषा की हालत का गहरा संबंध है।

हम किसी भाषा को किस दृष्टि से देखते हैं और उसका कैसा उपयोग करना चाहते हैं, यह बहुत कुछ इस पर निर्भर करता है कि हमारी सांस्कृतिक सोच क्या है, समाज के बारे में हमारी दृष्टि और भूमिका क्या है। विदेशी भाषा में शिक्षा पाने से हमारा स्वतंत्र चिंतन कुंठित हो गया है। यह बात प्रत्यक्ष रूप से भले न स्वीकार की जाए, मगर सत्य यही है। आशा यही की जाती है कि हमारी लोकभाषाएं आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में विकसित हो सके। हमारा उत्तम साहित्य इस इसी दिशा में विकसित हो, क्योंकि स्वराज की सार्थकता स्वभाषा की उन्नति से ही संभव है। इसके लिए लोकतंत्र में भाषा की मर्यादा बनी रहे, यह भी उतना ही महत्त्वपूर्ण विषय है, जितना चुनाव में वोट डालना।

साहित्य में जो भाषा मनुष्य को संस्कारित करती है, वह राजनीति में भी अपना असर बनाए रखे। यह भी समाज के साथ कुशल राजनीतिकों के दायित्व का हिस्सा होना चाहिए। गांधीजी का जो आत्मनिर्भर बनाने का स्वप्न है, वह केवल स्वभाषा से ही संभव है, क्योंकि जिस प्रकार जड़ कटा वृक्ष पुष्प और फल नहीं दे सकता और शीघ्र ही अपनी हरियाली खोकर सूख जाता है, उसी प्रकर अपनी भाषा से कटा देश भी कमजोर हो जाता है। हमारी जड़ें हमारी भाषा हैं। इसके बिना देश की समृद्धि संभव नहीं। हमारे लिए भाषा से प्रेम की भी जरूरी अहमियत होनी चाहिए।

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