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दुनिया मेरे आगेः वे कोरा कागज नहीं

मगर बच्चे अक्सर इस प्रचलित समझ से परे अपनी समृद्ध उपस्थिति दर्ज कराते हैं। वे अपनी गतिविधियों, बातचीत और सहज मेधा से यह सिद्ध करते रहते हैं कि उन्हें महज कोरा कागज समझना गलत है।

Author July 11, 2019 2:06 AM
बच्चों को बच्चा तो समझा जाना चाहिए, पर बच्चे का मतलब अनाड़ी नहीं। कहने का तात्पर्य है कि हमें उनको अपने परिवेश में एक जीवंत सामाजिक-सांस्कृतिक इकाई मान कर आगे बढ़ना होगा।

आलोक कुमार मिश्रा

यों बहुत से शिक्षाविदों ने ऐसी मान्यताओं को तार्किक आधार पर सिरे से खारिज किया है जो बच्चों को महज कोरा कागज समझती हैं या फिर गीली मिट्टी, जिस पर शिक्षकों, अभिभावकों और बड़ों के द्वारा जो भी लिखा जाएगा वही अंकित होगा। यानी वे जैसे ढाले जाएंगे, उसी तरह ढल जाएंगे। इसमें खुद उनके प्रयासों, अवलोकनों, अंतर्निहित क्षमताओं या सहज रूप से उपलब्ध परिवेश की भूमिका गौण ही रहेगी। आज भी कमोबेश हमारी शिक्षा व्यवस्था में यही समझ प्रभावी बनी हुई है। स्कूल की किताबों को अंतिम ज्ञान मान उन्हीं को रटने-रटाने के प्रयास में जुटे हैं। प्रचलित परीक्षा प्रणालियां इसे खाद-पानी देने का कार्य करती हैं। हमारी संस्कृति और परंपरा में गुरु और शिष्य की प्रचलित ऐसी ही छवियां भी इसे पुख्ता बनाती हैं।

मगर बच्चे अक्सर इस प्रचलित समझ से परे अपनी समृद्ध उपस्थिति दर्ज कराते हैं। वे अपनी गतिविधियों, बातचीत और सहज मेधा से यह सिद्ध करते रहते हैं कि उन्हें महज कोरा कागज समझना गलत है। वे अपने सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भों के अनुरूप अनुभवों और समझ से लैस होते हैं। औपचारिक रूप से सीखना वे बिल्कुल शून्य से शुरू नहीं करते। पैदा होने के बाद और स्कूलों में प्रवेश पाने तक के बीच वे भाषा, शारीरिक कौशलों और संस्कृति के सरल सूत्रों को कुछ हद तक आत्मसात कर चुके होते हैं। वे अपनी कुछ विशिष्ट क्षमताओं को भी कच्चे रूप में सही, अवसर मिलने पर प्रदर्शित करने लगते हैं। सच यह है कि आगे के औपचारिक और सुनियोजित अधिगम को ग्राह्य करने और उसके साथ अंत:क्रिया करने में ये विशिष्टताएं बहुत काम की होती हैं।

इन्हें आधार बना कर सीखने की प्रक्रिया को रुचिकर और आसान बनाया जा सकता है। पर स्कूलों में स्कूल के बाहर सीखे गए अनुभव या ज्ञान को तरजीह देने की संस्कृति अभी भी बहुत कमजोर है। उनके अपने अनुभवों को पूर्वनिर्धारित पाठ्यचर्या में जगह मिलना या उन्हें साथ लेकर चलना मुश्किल से ही दिखाई देता है। लेकिन यह कोई कठिन कार्य नहीं है। अवसर दिए जाने पर बच्चों की रचनात्मकता आश्चर्य में डाल देती है। हाल ही में मुझे अपने शिक्षण कार्य के दौरान ऐसा अनुभव प्राप्त हुआ। मेरे लिए अपनी छठी की कक्षा में ‘असमानता और भेदभाव’ की संकल्पना को बच्चों के स्तर के अनुरूप बनाने के लिए उपयुक्त उदाहरण ढूंढ़ना मुश्किल पड़ रहा था।

स्कूली किताब के पाठ में जातीय, धार्मिक, लैंगिक या आर्थिक आधार पर होने वाले भेदभावों का उदाहरण दिया गया है, मगर मैं शुरुआत खुद बच्चों द्वारा अनुभव की जाने वाली परिस्थितियों के वर्णन से करना चाहता था। बात करने पर इसमें मेरी मदद कक्षा के विद्यार्थियों न ही की। उनमें से किसी ने बताया कि ‘हम बच्चे जब दुकान पर कोई सामान लेने जाते हैं और अगर कोई ज्यादा उम्र का व्यक्ति हमारे बाद वहां कुछ खरीदने आ जाए तो अक्सर दुकानदार हमें सामान न देकर पहले उन्हें देते हैं। उनकी नजर में हम बच्चों के समय की कोई कीमत नहीं होती। यह उम्र के आधार पर होने वाला भेदभाव ही तो है।’ इस अनुभव आधारित उदाहरण ने कक्षा में भेदभाव की संकल्पना को खोलने में शुरुआती आधार का काम बखूबी किया। बच्चों का अपना अनुभव जब किताबी ज्ञान से जुड़ता है, तभी वह जीवंत बनता है।

बच्चे हम बड़ों या शिक्षकों को भी कई बार नई या अनोखी सीख देते हैं। इसलिए उन्हें अपने-आप को अभिव्यक्त करने का अवसर देना बहुत जरूरी है। कक्षा की एक छात्रा ने तो मुझे एक वाक्य बोल कर ही बहुत बड़ी सीख दे दी। वह मुझसे कुछ पूछना चाहती थी, पर मैंने मासिक रजिस्टर का काम पूरा करने के चक्कर में उसे बाद में आने को कहा। वह रजिस्टर की तरफ देखते हुए बोली, ‘आखिर मुझसे जरूरी कौन-सा काम हो सकता है?’ उसके इस कथन ने मेरी चेतना को झिंझोड़ कर रख दिया। ऐसा लगा कि समस्त शैक्षिक दर्शन और ज्ञान मीमांसा की बारिश उसने मुझ पर एक साथ कर दी हो। जाहिर है, मैं निरुत्तर होकर उसकी तरफ ध्यान देने को विवश हो गया।

बच्चों को बच्चा तो समझा जाना चाहिए, पर बच्चे का मतलब अनाड़ी नहीं। कहने का तात्पर्य है कि हमें उनको अपने परिवेश में एक जीवंत सामाजिक-सांस्कृतिक इकाई मान कर आगे बढ़ना होगा। एक ऐसी इकाई जो अपने अवलोकन, अवसरों के दोहन, गलतियों और प्रयासों से निरंतर सीखती है। विद्यालय में सीखने की यह प्रक्रिया समता, स्वतंत्रता से पूर्ण वातावरण में संपन्न की जानी चाहिए। बच्चों की भाषा, संस्कृति, उनमें व्याप्त विविधता, उनकी गरिमा आदि, सभी का सम्मान करते हुए आलोचनात्मक चेतना से लैस शिक्षा देने का प्रयास होना चाहिए। आत्मविश्वास और लोकतांत्रिक मूल्यों से लैस इकाइयां ही न्याय और बंधुत्व पर आधारित सामाजिक समष्टि का निर्माण करेंगी, जो अभी तक विषमता, वर्चस्व और अन्याय पर टिकी हुई दिखाई देती है।

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