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दुनिया मेरे आगेः पंक्षी ऐसे आते हैं

मेरे बचपन का हिस्सा कुछ कोलकता में बीता, कुछ उत्तर प्रदेश में पुरखों के गांव में। वहां की उन दिनों की चिड़ियों की गुंजार मैं भूला नहीं हूं। आज भी वह एक संगीत की तरह कानों में बजने लगती है। कभी-कभी सोचता हूं कितनी दूर चला आया हूं उस प्राकृतिक सुरम्य वातावरण से जो गांवों-शहरों में सहज ही उपलब्ध हुआ करता था।

Author Updated: January 13, 2020 12:40 AM
शाम को ‘घर’ जाने से पहले या वहीं रहने के इरादे से सुनी है बहुतेरे पेड़ों पर चिड़ियों की गुंजार। देखा है, उन्हें दिन-दोपहरी आम की किसी डाल पर चलते-टहलते। देखे हैं चिड़ियों के घोंसले पेड़ों पर।

प्रयाग शुक्ल

पिछले साल अर्थव्यवस्था में जिस तरह मंदी की शुरुआत हुई, बैंक घोटाले हुए, गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के डूबने का संकट गहराया, इन सब घटनाओं ने लोगों के मन में अर्थव्यवस्था को लेकर संदेह पैदा किया है। पंजाब एवं महाराष्ट्र कोऑपरेटिव बैंक (पीएमसी) के घोटाले से सहकारी बैंकों से भी आम जनता का भरोसा डिगा है। सुबह-सुबह पंछियों के बोल हमेशा ही अधिक सुहाते रहे हैं। बोलों की वह मधुर गुंजार वातावरण को एक माधुरी, एक चहक सौंपती ही रही है, अगर मौसम खुशनुमा हो और उसके अनुकूल मंद बयार हो, तो वह कुल वातावरण को महका भी देती रही है; जिसका एक सहज स्मरण प्रसाद जी की ये पंक्तियां आज भी करा देती है- ‘खग कुल कुल कुल सा बोल रहा/ किसलय का अंचल डोल रहा/ लो वह लतिका भी भर लायी/ मधु-मुकुल नवल रस गागरी/ बीती विभावरी जाग री!’

ये पंक्तियां यह याद भी दिला देती हैं कि ‘किसलय का अंचल’ हो या ‘लतिका’ और ‘मधु मुकुल’- ये सब अब एक स्थान पर कम ही मिलते हैं। यही कारण है कि अब पंछियों की वैसी चहचहाहट कम ही सुनाई पड़ती है। और ‘खग कुल कुल’- वह तो तभी कलरव करेगा न, जब होंगे किसलय, लताएं, वृक्ष, पौधे, होंगे उनमें खिले हुए फूल। महानगरीय और शहरी स्थानों में, इनमें कमी आई है, तो पंछियों में भी कमी आई है! हां, पंछी आते ही वहीं है, जहां हो भरी-पूरी हरीतिमा, चुगने को, चोंच मारने को, फल-फूल, और हो जल! ‘वह जल’ जल-पंछियों के लिए तो जरूरी है ही, अन्य पंछियों को भी चाहिए! शहरों-महानगरों के बीच अब वैसे जल-कुंड, सरोवर और कुएं भी नहीं हैं, जैसे एक जमाने में हुआ करते थे और कोलकता जैसे महानगर में अभी भी कुछ बचे हुए हैं। सो, पंछियों के लिए एक आकर्षण और कम हुआ है!

नोएडा, जहां मैं रहता हूं और दिल्ली, जहां मैं आता-जाता हूं, पंछियों की दृष्टि में रहने और बसने के लिहाज से पहले जितने आकर्षक नहीं रह गए हैं। यमुना भी एक कालिमा से घिर गई है। बहुमंजिली इमारतों की बाढ़ ने न जल के लिए जगह छोड़ी है, न फूल-पत्तियों के लिए। फिर पंछी कहां रहें? सभी महानगरों और शहरों में यह भी हुआ है कि अगर कहीं कोई छोटा-मोटा सरोवर हो तो उसे भी भर दो और खड़े कर लो वहां भी महले-दुमहले!

मेरे बचपन का हिस्सा कुछ कोलकता में बीता, कुछ उत्तर प्रदेश में पुरखों के गांव में। वहां की उन दिनों की चिड़ियों की गुंजार मैं भूला नहीं हूं। आज भी वह एक संगीत की तरह कानों में बजने लगती है। कभी-कभी सोचता हूं कितनी दूर चला आया हूं उस प्राकृतिक सुरम्य वातावरण से जो गांवों-शहरों में सहज ही उपलब्ध हुआ करता था। हमने अपने को ‘बसाने’ की हड़बड़ी में अन्य जीवों और बनस्पतियों को बहुत उजाड़ा है। गौरैया के बारे में सोच कर तो पीड़ा होती है, जिसके झुंड के झुंड उड़ा करते थे और जो इस तरह घर-आंगन बरामदे खिड़की, दरवाजे मुंडेर और हर कहीं टहलती रहती थी।

शाम को ‘घर’ जाने से पहले या वहीं रहने के इरादे से सुनी है बहुतेरे पेड़ों पर चिड़ियों की गुंजार। देखा है, उन्हें दिन-दोपहरी आम की किसी डाल पर चलते-टहलते। देखे हैं चिड़ियों के घोंसले पेड़ों पर। देखा है कटफोड़वे को, नीलकंठ को। चिड़ियों के बारे में, उन्हें पेड़ों से उड़ते देख कर सोचा है कि सिर्फ वे ही नहीं उड़ते, उनके साथ कितने रंग भी उड़ने लगते हैं, कभी पंक्ति-दर-पंक्ति, कभी अकेले-दुकेले। उनका एक गहरा नाता होता है पेड़ों से। आज भी उस नाते को तभी पहचानता हूं जब अपनी नातिन को किसी सुबह, किसी जगह, किसी पेड़ से आती गुंजार को रिकार्ड कर वाट्सऐप पर भेजता हूं या किन्हीं पेड़ों के आसपास उन्हें उड़ते, टहलते, चलते, मोबाइल के कैमरे में ‘कैद’ कर लेता हूं।

सोचता हूं, सालिम अली जैसे पक्षी प्रेमी के बारे में, जो यह पहचानते थे कि किस पक्षी का बसेरा कहां होता है, उसका रूप-रंग-स्वभाव कैसा है, बोली-बानी कैसी! सोचता हूं ‘रेणु’ के बारे में, जिन्होंने ‘परती: परिकथा’ में चिड़ियों की बोलियों को कलमबद्ध किया है। सोचता हूं श्रीधर पाठक के बारे में, जिनकी तीतरों वाली एक कविता बच्चों और बड़ों के बीच कभी बहुत लोकप्रिय रही है और जिन्होंने सांध्य-अटन कविता के अंत में उस प्रसंग का वर्णन किया है कि किस तरह सुरम्य दृश्य के बीच एक वृक्ष-सीस पर, एक शब्द सुन पड़ता है, और हड़हड़ा कर, भड़भड़ा कर, तमाम पक्षी एक आर्त प्रकार-सी करते हुए उड़ जाते हैं। जाहिर है यह ‘शब्द’ एक शिकारी की गोली से या किसी तीर के चलने-से उत्पन्न हुआ है। आज के समय ने पक्षियों का शिकार बिना गोली-तीर चलाए हुए कर डाला है, पेड़ों को उजाड़ कर!

इसलिए भी जरूरत है अब सोच-विचार कर ऐसे वृक्ष लगाने की जहां पक्षी बसें, घोंसला बनाएं, आसपास रहें। ऐसे वृक्ष भी हों जो उन्हें फल-फूल दें, चुगने को, कुतरने को। हां, कठिन होगा पंछियों के बिना जीवन! भारतेंदु हरिश्चंद्र ने कब लिखी थीं ये सुंदर मधु सुघड़ पंक्तियां: ‘गूंजहि भंवर विहंगम डोलहिं बोलहिं प्रकृति बधाई/ पुतली सी जित तित तितली गत फिरहिं सुगंध लुभाई।’ हां, डोलें विहंगम, गूंजें भंवरे, पुतली-सी जहां तहां फिरें तितलियां, सुगंध के लोभ में। इसी दृश्य की फिर कामना है।

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