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दुनिया मेरे आगेः स्मृतियों के कोने में

मुझे उस पुराने भोंपू वाले ग्रामोफोन का ध्यान आया, जिसे पत्नी ने चमका कर बैठक में सजावटी धरोहर के तौर पर रख दिया था। लेकिन ऐसी सजावट के लिए तुम उसे अनुपयुक्त लगे। काश, घर इतना बड़ा होता कि हर उस चीज को, जिसे मैंने कभी शिद्दत से चाहा था, सदा के लिए अपना बना कर रख सकता। क्या करूं दोस्त!

समय बलवान होता है। कब अतृप्त प्यास को मिटाने के लिए एक नया नवेला लैपटॉप तुम्हारी जगह पर आसीन हो गया, पता नहीं चला। तुम मेरी गलतियां छिपा नहीं पाते थे। कुछ भूल हो जाती तो उसे सफेद फ्लुइड से मिटाना पड़ता था और कागज पर एक बदनुमा धब्बा छूट जाता। (प्रतीकात्मक तस्वीर)

तुम्हें अलविदा बहुत पहले कह देना था। पता नहीं, सिर्फ मेरी कमजोरी थी या तुमसे दोस्ती कि सालों पहले ठंडी पड़ चुकी राख में छिपी वे कुछ चिनगारियां, जिन्होंने मुझे तुमसे पूरी तरह बिछुड़ने नहीं दिया। कितनी बार सोचा कि बाकी लोगों की तरह मैं भी विस्मृति के दरिया में बहा कर तुम्हारे सान्निध्य से मुक्ति पा लूं। लेकिन जब भी तुम्हें लिखने की मेज से उठा कर घर के किसी सूने कोने में नाकाम प्यार के पुराने खतों की तरह छिपा देने के बारे में सोचता, मन-मस्तिष्क में शायर निदा फाजली के शब्द गूंज उठते- ‘कहीं कुछ भी नहीं बदला/ तुम्हारे हाथ मेरी अंगुलियों में सांस लेते हैं/ मैं लिखने के लिए जब भी कागज-कलम उठाता हूं/ तुम्हें बैठा हुआ मैं अपनी कुर्सी में पाता हूं/ तुम्हारी कब्र पर जिसने तुम्हारा नाम लिखा है/ वो झूठा है, वो झूठा है, वो झूठा है! तुम्हारी कब्र में मैं दफन/ तुम मुझमें जिंदा हो/ कभी फुर्सत मिले तो फातिहा पढ़ने चले आना।’

अच्छा संयोग था कि मुझे कभी किसी दफ्तर में बाबूगिरी नहीं करनी पड़ी। तुम्हारी जरूरत महसूस कैसे करता, जब वायुसेना की उड़ानें भरने के प्रारंभिक दिनों में ज्यादा लिखना-पढ़ना होता ही नहीं था। लेकिन एक बार लंबे वार्षिक अवकाश में अपने शहर गया तो एक टाइपराइटिंग स्कूल में एक पुराने सहपाठी को तुम्हारे किसी भाईबंद के साथ व्यस्त देखा। तुम्हारे कुनबे में दिलचस्पी जगी तो मित्र ने कहा क्यों न इससे भी दोस्ती कर लो। सुझाव अच्छा लगा। पहली बार उस अंग्रेजी मशीन पर अंगुलियां फेरीं तो कौतूहल जगा कि की-बोर्ड के अक्षर वर्णमाला के क्रम में क्यों नहीं थे। यह भी कोई बात हुई कि क्यू के बाद डब्ल्यू, ई, आर, टी आ जाएं!

प्रशिक्षक ने समझाया कि की-बोर्ड पर अक्षरों का क्रम तय करने के पीछे सघन वैज्ञानिक अध्ययन था। अंग्रेजी वर्णमाला के सबसे अधिक इस्तेमाल में आने वाले अक्षरों को सबसे अधिक सक्षम और चपल दसों अंगुलियों से दूर रखा गया था, ताकि उनका अतिशय जोर टाइप के अक्षरों को नुकसान न पहुंचाए। रेमिंगटन कंपनी की यह पसंद बाद में सबके लिए मानक बन गई। फिर एक नया राज भी खुला कि ‘अ क्विक ब्राउन फॉक्स जंप्स ओवर द लेजी डॉग’, यानी वाक्य में वर्णमाला का हर अक्षर समाहित था। जल्दी ही अंगुलियों को उन बटनों पर फेरने में मजा आने लगा।

हां, तुम्हारे यानी टाइपराइटर की धड़कन में गूंजती क्लिक-क्लिक किसी नृत्य के दौरान किसी के थिरकते पैरों के साथ बजते घुंघरुओं की याद दिलाने लगी। इधर टंकन को गति मिली, उधर हाथों में कलम पकड़ना खलने लगा। फिर भी वायुसेना में उन प्रारंभिक दिनों में इतनी लिखत-पढ़त नहीं करनी होती थी कि इस नए कौशल का सदुपयोग होता। तभी एक बार विदेश जाना हुआ जहां उन दिनों की पसंदीदा इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएं सस्ती मिलती थीं। मेरे साथियों ने ‘टू-इन-वन’ और टेपरिकार्डर खरीदे, लेकिन मेरी आंखें तुम्हारी तन्वंगी आकृति में उलझ कर रह गर्इं। तुम पोर्टेबल यंत्र थे- लाल, पीले कई मनभावन रंगों में उपलब्ध। पहली नजर में हो गए इस प्रेम में डूब कर तुम्हारे साथ खेलने में अनोखा आनंद आने लगा। तुमने अभिन्न मित्र बन कर मुझे लेखक बना दिया, लेकिन हिंदी लेखन की मेरी इच्छा तुम पूरी नहीं कर पाते थे।

समय बलवान होता है। कब अतृप्त प्यास को मिटाने के लिए एक नया नवेला लैपटॉप तुम्हारी जगह पर आसीन हो गया, पता नहीं चला। तुम मेरी गलतियां छिपा नहीं पाते थे। कुछ भूल हो जाती तो उसे सफेद फ्लुइड से मिटाना पड़ता था और कागज पर एक बदनुमा धब्बा छूट जाता। वर्तनी और व्याकरण की अशुद्धियां देख कर भी तुम अनजान बने रहते थे, लेकिन नया लैपटॉप उनके प्रति सचेत था। हद तो तब हुई जब बिना हिंदी की-बोर्ड पर अभ्यास किए ‘गूगल इनपुट टूल’ के सहारे मैं हिंदी, अंग्रेजी दोनों लिपियों के आकाश में उड़ानें भरने लगा।

देखते-देखते तुम किसी नए मेहमान के सामने तिरस्कृत पुराने सदस्य की तरह मेरी मेज पर मुंह छिपा कर पड़े रहने लगे। तुम्हें देख कर मेरा पुराना प्यार उमड़ आता। मैं अपराधी-सा महसूस करने लगता। आखिर में इस अपराधबोध से मुक्त होने के लिए मैंने सोचा कि तुम्हें किसी को उपहार में दे डालूं। लेकिन इतनी देर हो चुकी थी कि तुम्हें पाने का कोई इच्छुक मिलना असंभव हो गया।

मुझे उस पुराने भोंपू वाले ग्रामोफोन का ध्यान आया, जिसे पत्नी ने चमका कर बैठक में सजावटी धरोहर के तौर पर रख दिया था। लेकिन ऐसी सजावट के लिए तुम उसे अनुपयुक्त लगे। काश, घर इतना बड़ा होता कि हर उस चीज को, जिसे मैंने कभी शिद्दत से चाहा था, सदा के लिए अपना बना कर रख सकता। क्या करूं दोस्त! तुम्हे अलविदा कह कर कहां भेज दूं? जब तुम मेरी मेज से हट जाओगे, तो क्या निदा फाजली के शब्दों को दुहरा कर मैं खुद को ठग पाऊंगा कि ‘वो तुम कब थे? कोई सूखा हुआ पत्ता, हवा में गिर के टूटा था।’

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