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दुनिया मेरे आगेः भरोसे का प्रेम

प्रेम में गजब शक्ति है। चुंबकीय नियम के अनुसार दक्षिणी और उत्तरी ध्रुव एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं, जबकि समान ध्रुव इसके विपरीत विकर्षित करते हैं। इस नियम के अनुसार प्रेम में विजातीय लिंग का आकर्षण सहज है, लेकिन समलिंगीय प्रेम भी लिंग की प्रधानता से उठ कर दो हृदयों के मेल को महत्त्व देता है।

Author Updated: February 15, 2020 3:57 AM
प्रेम में समर्पण, विश्वास और वचनबद्धता की दरकार होती है। लेकिन आज समय बदल रहा है। भूमंडलीकरण ने दुनिया को मुट्ठी में भर दिया है। इस बदलते युग में प्रेम भी बदल रहा है, युवक-युवतियों का साथ में घूमना, प्रेम का प्रदर्शन सरेआम करना अब ‘फैशन’ कहलाने लगा है।

सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

हालांकि प्रेम किसी खास दिन में सिमटा हुआ नहीं है, लेकिन समाज अपनी सुविधा के मुताबिक पैमाने गढ़ लेता है। इस लिहाज से देखें तो अपने आधुनिक स्वरूप में प्रेम-दिवस का प्रतीक बन चुका वेलेंटाइन दिवस गुजर गया, लेकिन प्रेम हर वक्त अपने मूल स्वरूप में बना रहेगा। इश्क, प्रेम, प्यार, मोहब्बत, आप चाहे इसे जिस नाम से पुकारें कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि शब्दों के पर्याय हो सकते हैं, लेकिन पीड़ा के नहीं। यह तो दो हृदय के बीच का वह अहसास है जो शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। गणित में एक और एक दो होते हैं, लेकिन प्रेम में एक और एक ग्यारह हो सकते हैं या दो हो सकते हैं या फिर शून्य हो सकता है। इसका गणित आज तक किसी के पल्ले नहीं पड़ा। जिसके पल्ले पड़ा या तो वे शाहजहां-मुमताज बन गए या फिर लैला-मजनूं। प्रेम में मिठास है तो कड़वाहट भी है। नजदीकी है तो दूरी भी है। चैन है तो बेचैनी भी है। हंसी है तो रोना भी है।

प्रेम में गजब शक्ति है। चुंबकीय नियम के अनुसार दक्षिणी और उत्तरी ध्रुव एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं, जबकि समान ध्रुव इसके विपरीत विकर्षित करते हैं। इस नियम के अनुसार प्रेम में विजातीय लिंग का आकर्षण सहज है, लेकिन समलिंगीय प्रेम भी लिंग की प्रधानता से उठ कर दो हृदयों के मेल को महत्त्व देता है। प्रेम का रसायन शास्त्र आयु, लिंग, जाति, धर्म, भाषा, संस्कृति, सभ्यता, रीति-रिवाज, परंपरा किसी भी बाधा की परवाह नहीं करता।

किसी दूसरे के प्रेम को देख कर कभी-कभार हम उसे बचकाना हरकत कह देते हैं। लेकिन वही प्रेम जब हमें होता है तो एक वटवृक्ष की तरह हृदय में उगने लगता है। उसकी जड़ें हमारे शरीर में धंसते-धंसते हमें पूरी तरह से अपने बस में कर लेता है। तब हमें दिन-रात का अंतर पता नहीं चलता। भूख-प्यास, नींद-चैन सब गंवा देते हैं। जिसके लिए प्रेम मधुर बना, उसके लिए यह जीवन क्षणिक लगता है और जिसके लिए यह कठोर है उसे एक पल भी युग-सा प्रतीत होता है।

सवाल है कि क्या प्रेम को परिभाषित किया जा सकता है? क्या इसका कोई रूप, स्वभाव या आभास होता है? प्रेम हमेशा पाने का नाम नहीं होता। कभी-कभी जो सुख खोकर मिलता है, वह पाकर नहीं। रूमी ने प्रेम को एक खामोश फसाना, एक निशब्द अहसास बताया है। प्रेम बस एक अगाध स्नेह का नाम है, जिसके भी जीवन में प्रवेश करता है, उसे सुवासित कर देता है। प्रेम चाहे क्षणिक हो या शाश्वत, सच्चा ही रहता है। प्रेम सच्चा नहीं तो केवल दिखावा बन कर रह जाता है। मात्र लेन-देन का व्यापार बन जाता है, जिसमें सुविधाओं और साधनों का आदान-प्रदान होता है। वास्तव में प्रेम एक शाश्वत भाव है। जो कल भी था, आज भी है और कल भी रहेगा। प्रकृति के कण-कण में प्रेम समाया है। प्रेम की ऊर्जा से ही प्रकृति निरंतर पल्लवित, पुष्पित और फलती-फूलती है। युगों से चली आ रही प्रेम कहानियां आज भी बदस्तूर जारी हैं। प्रेम की अनुभूति अपने आप में अनोखी, अद्भुत और चमत्कारी हैं। किसी से प्रेम करना संसार की सबसे सुखद अनुभूति है।

वास्तव में यह क्यों होता है? कैसे होता है? कब होता है? किससे होता है? इन प्रश्नों के सटीक उत्तर आज तक कोई नहीं दे पाया है। कभी दुनिया प्रेम करने वालों को सिर-आंखों पर बैठा लेती है तो कभी प्रेम में तलवारें खिंच जाती हैं, गोलियां चल जाती हैं और खून की नदियां बह जाती हैं। यों तो प्रेम के सबके अपने-अपने मायने हैं। प्रेम को लेकर सबकी अपनी सोच है। माना जाता है कि प्रेम का संबंध आत्मा से होता है।

प्रेम में समर्पण, विश्वास और वचनबद्धता की दरकार होती है। लेकिन आज समय बदल रहा है। भूमंडलीकरण ने दुनिया को मुट्ठी में भर दिया है। इस बदलते युग में प्रेम भी बदल रहा है, युवक-युवतियों का साथ में घूमना, प्रेम का प्रदर्शन सरेआम करना अब ‘फैशन’ कहलाने लगा है। प्रेम में पहले बरसों इंतजार में गुजार दिए जाते थे, लेकिन अब कोई इंतजार में वक्त ‘जाया’ नहीं करता। अब प्रेम के स्वरूप, स्थायित्व और उसे अभिव्यक्त करने के माध्यमों में बदलाव आ रहा है। मोबाइल और इंटरनेट के जरिए गली-मोहल्ले और परिचितों में सिमटे प्रेम के अवसर आज के युवाओं के लिए विश्वव्यापी हो गए हैं।

आज युवाओं की सोच बदल गई है, सामाजिक मूल्यों में बदलाव आ रहा है। अब प्रेम में भी युवा बहुत ‘व्यावहारिक’ हो चला है। मौसमों के बदलने की तरह उसका टूटना और फिर मिलना होता है। वह मानता है कि बिना ‘गर्ल फ्रेंड’ के कॉलेज जीवन में मजा नहीं है, लेकिन शादी के लिए वह घर वालों से बैर लेने के ‘मूड’ में नहीं होता और उनकी मर्जी को प्राथमिकता देता है। भोगवादी संस्कृति में पल रहा युवा भावों की गहराई को समझ ही नहीं पाता। प्रेम के लिए इस तरह की सोच कितनी सही और कितनी गलत है, इसका फैसला भी खुद युवाओं को ही करना होगा।

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