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दुनिया मेरे आगेः मां कह एक कहानी

श्रीप्रकाश शर्मा कोई शिशु जब पहली बार अपनी तोतली आवाज में ‘मां’ बोलता है तो उसकी अनुभूति अनायास ही दिल की गहराई को छू जाती है और इसके एहसास में स्त्री की सार्थकता और मातृत्व का सुख साकार हो उठता है। कालांतर में जब वह शिशु बड़ा हो जाता है और वह चाहे कितनी ही […]

आधुनिकता के वर्तमान दौर में जबकि सूचना क्रांति ने जीवन के संस्कारों में अहम तब्दीलियां ला दी हैं, संवाद और संदेश के तरीके अहम परिवर्तन के दौर से गुजर रहे हैं तो मातृभाषा की तेज रफ्तार से कमजोर पड़ते बंधन और तिलिस्म पर संजीदगी से आत्म-मीमांसा के कई अदद प्रश्न हमारे सामने उत्तर की तलाश में मुंह बाए खड़े हो जाते हैं। (प्रतीकात्मक तस्वीर)

श्रीप्रकाश शर्मा

कोई शिशु जब पहली बार अपनी तोतली आवाज में ‘मां’ बोलता है तो उसकी अनुभूति अनायास ही दिल की गहराई को छू जाती है और इसके एहसास में स्त्री की सार्थकता और मातृत्व का सुख साकार हो उठता है। कालांतर में जब वह शिशु बड़ा हो जाता है और वह चाहे कितनी ही सुंदर बातें क्यों न करे, कितनी ही खूबसूरती से अपने भावों को अभिव्यक्त क्यों न करे और कितनी ही परिमार्जित और अलंकारिक भाषा का प्रयोग क्यों न करे, संवेदना की कशिश और भाव की तीव्रता का असर जाता रहता है।

आशय यह कि भाषा महज संवाद का सबसे सशक्त माध्यम नहीं है, बल्कि यह बेशुमार मानवीय गुणों और व्यक्तित्व के पहलुओं को अपने आप में करिश्माई ढंग से छिपाए रखता है। तिस पर मातृभाषा की तो बात ही और है। हजारों मील के फासले से अपनों से अपनी मातृभाषा में बातें करते हुए बचपन की भूली-बिसरी यादें ताजा हो जाती हैं। मां की ममता और पिता का प्यार जीवंत हो उठता है। किसी खंडहर या आलीशान शीशमहल में गुजारे गए वक्त को याद करते हुए उसका पत्थर-पत्थर किसी सिनेमा की रील की भांति मानस पटल पर बड़ी तेजी से गुजरता-सा चला जाता है।

मातृभाषा में गाए गए मधुर लोकगीतों में परिवार, समाज और काल की परंपराएं, तहजीब और जीवन-शैली की बेशुमार विधाएं रफ्ता-रफ्ता करवटें लेने लगती हैं। सब कुछ दिल के करीब और आत्मीय लगने लगता है। दिल के भाव किसी आईने में प्रतिबिंबित अक्स की तरह साफ-साफ दिखने लगते हैं। यों लगता है गोया कानों में मिसरी घोली जा रही हो। एहसास होता है कि दिल का भाव पारे की तरह अपना रास्ता बनाते हुए सीधे दिल में उतर रहा है।

लेकिन आधुनिकता के वर्तमान दौर में जबकि सूचना क्रांति ने जीवन के संस्कारों में अहम तब्दीलियां ला दी हैं, संवाद और संदेश के तरीके अहम परिवर्तन के दौर से गुजर रहे हैं तो मातृभाषा की तेज रफ्तार से कमजोर पड़ते बंधन और तिलिस्म पर संजीदगी से आत्म-मीमांसा के कई अदद प्रश्न हमारे सामने उत्तर की तलाश में मुंह बाए खड़े हो जाते हैं। भूमंडलीकरण के तूफानी दौर में जहां विदेशी भाषाएं उच्च वार्षिक पैकेज और पर्क्स का गोल्डन पासपोर्ट मानी जाती हैं, व्यक्तित्व विकास का अचूक पैरामीटर समझी जाती हैं और सबसे अधिक आधुनिकता के नाम पर सामाजिक हैसियत का प्रतीक मानी जाती हैं तो वैसी स्थिति में समूची दुनिया में मातृभाषाओं को अपनी ही पहचान और प्रतिष्ठा कायम रखने के लिए जद्दोजहद करते देख कर मन कसैला हो उठता है।

वर्तमान में दुनिया में करीब पांच बिलियन भाषाएं बोली जाती हैं और दुनिया की आबादी भी लगभग आठ बिलियन है। मोटे तौर पर देखें तो हर दो लोगों की अपनी अलग भाषा है, जिसके माध्यम से वे अपने विचारों और भावों को अभिव्यक्त करते हैं। लेकिन अफसोस की बात है कि इनमें कई भाषाएं मृत हो चुकी हैं और कई भाषाएं अवसान के कगार पर हैं। ब्रिटेन के प्रसिद्ध अंग्रेजी साहित्यकार सैमुएल जॉनसन ने एक बार कहा था- ‘जब भी मैं किसी भाषा को मृत होते देखता हूं तो अंदर से बहुत ही आहत हो जाता हूं, भाषाएं किसी राष्ट्र की वंशावली होती हैं।’

सच पूछिए तो भाषा की उपादेयता महज संवाद के वाहक के उद्देश्य से ही नहीं होती है। यह किसी कौम की अपनी अस्मिता से भी जुड़ी होती है। यह किसी भ्रूण के लिए नाभि के नाल सरीखी होती है जो अपने अस्तित्व के लिए अपनी मां के गर्भ से जुड़ा होता है। वर्तमान पीढ़ी में जन्म लेने वाला हर बच्चा इस सौभाग्य से महरूम है, जिसे केवल मातृभाषा को उसका सम्मान दिला कर ही पुनर्जीवित और महफूज रखा जा सकता है। विश्व इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब-जब किसी राष्ट्र पर कोई संकट आया है या उसका अंत हुआ है तो वहां के लोगों की मातृभाषा और मातृभूमि के प्रति बेकदरी और अपमान का कारण सर्वोपरि रहा है।

दरअसल, किसी राष्ट्र के पतन के लिए आर्थिक और राजनीतिक गुलामी अहम कारण होते हैं। लेकिन भाषाई दासता का क्या? इस बात से इनकार करना आसान नहीं होगा कि अपनी मां की भाषा की अहमियत को न समझ पाने की हमारी नादानी ने हमारा काफी नुकसान किया है। इसने हमारा बचपन छीना है, हमारे स्वाभाविक विकास को मंद किया है और प्रगाढ़ पारिवारिक रिश्तों के बंधन को कमजोर किया है। यहां तक कि इसने दादा-दादी, नाना-नानी के द्वारा बच्चों को कहानी सुना कर मन बहलाने और लोरी गाकर सुलाने के लुप्त होते मानवीय भाव की हत्या की है। हरेक पीढ़ी अपनी भाषा और संस्कृति को महफूज रखने के लिए संघर्ष करती है। अपनी भाषा और संस्कृति की हिफाजत करना हर पीढ़ी का नैतिक कर्तव्य होता है। इस कर्तव्य भाव के बारे में हमारी विस्मृति और लापरवाही हमारे लिए एक ऐसा संकट है, जिस पर आज हमने शिद्दत से नहीं सोचा तो कल शायद इस पर सोचने के लिए नहीं बचेंगे।

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