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दुनिया मेरे आगेः आदृश्य तस्वीरें

मेरा यह मानना कि सभी समझदार और जिम्मेदार अभिभावकों और शिक्षकों ने बच्चों को अच्छे और बुरे के खेल में फंसा कर अपनी तमाम जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लिया है, ताकि उन्हें बच्चों की समस्या को सुलझाने में खुद दिमागी मशक्कत नहीं करनी पड़े।

Author April 16, 2019 2:50 AM
(प्रतीकात्मक तस्वीर)

राय बहादुर सिंह

दूर तक फैले खेतों में मेरे स्कूल आने के साथ ही मक्के की फसल बोई गई थी। स्कूल की खिड़की के बाहर खेतों में लहलहाते कुछेक मक्के के पौधों के आकार को देख कर ऐसा भ्रम हो रहा था कि मक्के की फसल बहुत अच्छी होगी। हवा में लहराती उनकी लंबी और चौड़ी पत्तियां बहुत प्यारी लग रही थीं। जाने क्यों मैं इस पसोपेश में आ घिरा कि कद और आकार में छोटी रह गईं बाकी फसलों की ओर मेरा ध्यान क्यों नहीं गया! यह एक सामान्य-सी प्रवृत्ति है या इसका कोई विशेष कारण है? मैं मनुष्य के उस गुण के बारे में जानना चाहता हूं, जिसके कारण हमें सीधे लंबे खड़े बांस के झुरमुटों को देख कर आनंद की अनुभूति होती है, लेकिन झुरमुट से जमीन को छूते बांस को देख कर हीन भाव मन में आते हैं। गांव भर में कच्चे घरों के बीच प्रधान का पक्का मकान हमें क्यों अच्छा लगने लगता है! क्यों हमारे समाज में हर काम को करने में महारत रखने वाले ही अच्छे लगते हैं? मुझे यह भी जानना है कि एक विद्यालय में पढ़ने वाले अलग-अलग मिजाज के बच्चों में हमें शांत और आज्ञा का पालन करने वाला बच्चा ही सबसे लायक और होनहार क्यों लगने लगता है! कुछ खास मिजाज के बच्चे शैतान और बदमाश क्यों हो जाते हैं? हम गौर कर सकते हैं कि कक्षा के दौरान पढ़ाई से इतर अपनी पसंद का काम करते हुए बच्चे को किन-किन उपाधियों से सम्मानित किया जाता है।

मेरा यह मानना कि सभी समझदार और जिम्मेदार अभिभावकों और शिक्षकों ने बच्चों को अच्छे और बुरे के खेल में फंसा कर अपनी तमाम जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लिया है, ताकि उन्हें बच्चों की समस्या को सुलझाने में खुद दिमागी मशक्कत नहीं करनी पड़े। सभी सजा देने की जल्दी में हैं। इस जल्दबाजी के कारण ही हमने बच्चों को दो वर्गों में बांटा है। अच्छे और बुरे में। सिगमंड फ्रॉयड के अनुसार, मनुष्य जो कुछ भी करता है, उसके मनोवैज्ञानिक कारण होते हैं। सवाल यह है कि बदमाश, उद्दंड, ढीठ, शैतान जैसे शब्दों का बच्चों की प्रवृत्तियों को चिह्नित करने के लिए बड़ों द्वारा गढ़े गए शब्दों का मनोवैज्ञानिक आधार क्या है? ये शब्द समाज में किन रूपों में रूढ़ हैं, यह हम सब जानते हैं। समाजीकरण करने में हमारे स्कूलों का विशेष महत्त्व होता है। हम वहीं से नालायक-होनहार, शरीफ-बदमाश, शैतान, ढीठ, उद्दंड जैसे शब्दों को लेकर समाज में आते हैं।

जब मैं शिक्षण अभ्यास के लिए पहली बार स्कूल गया तोे पाया कि स्कूल की हर कक्षा में बच्चों का उनके व्यक्तित्व के आधार पर वर्गीकरण किया जा चुका था। शुरुआत में मुझे उन्हें समझने और अपनी बात समझाने में खासी मेहनत करनी पड़ती थी, पर मजाल थी जो उनके कानों पर जूं रेंग जाए। कभी कोई किसी की किताब फाड़ देता तो कोई किसी के घाव दुखा देता। ब्लैक बोर्ड पर लिखते-लिखते शोर सुन कर पीछे देखता तो दोनों वर्ग आपस में गुंथे नजर आते। धीरे-धीरे उनका व्यक्तित्व मेरी नजर में रूढ़ हो रहा था। मैं उनके लिए जाने कब नालायक जैसे शब्द का प्रयोग कर बैठा, पता ही नहीं चला। इसका एहसास हुआ तो मैं सकते में आ गया। गहरे विचार के बाद मैंने पाया कि मैं भी उसी ढर्रे पर चलने वाला नवाचारी हूं, जो अपनी सुविधा अनुसार अच्छे और बुरे के दृष्टिकोण से ग्रसित चश्मा चढ़ा कर दुनिया को बदलने चल पड़े हैं। अपनी गलती का एहसास होने के बाद मैं स्कूल के सभी बच्चों को एक ही नजर से देखने लगा और सभी बच्चों को एक ही समान मानना शुरू कर दिया। अब मेरे लिए वे सभी बस बच्चे थे। इसके बाद मैं उनके बीच लड़ाई-झगड़े को छुड़ा तो देता था, पर स्कूल के साथी शिक्षकों को झगड़े के बारे में नहीं बताता। उन्हें पढ़ाने की कोशिश न करके उनसे पूछना शुरू कर दिया कि आज क्या पढ़ना चाहते हो!

वे अक्सर पाठ को पढ़ने से मना करते और चित्रकारी करने या खो-खो खेलने की इच्छा जाहिर करते। एक दिन उन्होंने फिल्म दिखाने की बात कह दी। मैंने उन्हें टालने के बजाय ‘101 डलमेशियन डॉग’ नामक एक कार्टून फिल्म मोबाइल फोन पर दिखाने लगा। थोड़ा-थोड़ा करके यह फिल्म लगभग डेढ़ सप्ताह चली। इस बीच मेरी और कक्षा के बच्चों की दोस्ती हो गई। फिल्म खत्म होने के साथ ही आने वाले दिनों में बच्चों का व्यवहार मेरे साथ बदलता चला गया। मैं उन्हें पढ़ाने के लिए डंडे का प्रयोग नहीं करता था। मैं बच्चों को साथी शिक्षकों और मेरे बीच तुलनात्मक अध्ययन करने का मौका देता रहता, जिसके कारण वे मेरे और भी करीब आते गए। मुझे पता ही नहीं चला कि कब वे मुझे ‘सर’ कहने की जगह ‘ये मेरे दोस्त हैं’ कहने लगे। मेरी कक्षा के अलावा दूसरी कक्षा के वे बच्चे भी पढ़ाने के लिए बुलाने आने लगे, जिन्हें समूचा स्कूल बदमाश बच्चे के रूप में जानता था। इसके बाद कुछ बच्चों ने मुझे स्थायी रूप से वहीं नौकरी करके रह जाने के लिए कहा। उनकी बातें सुन कर मैं कई दिनों तक सोचता रहा कि शिक्षक की आंखों पर चढ़ा अच्छे और बुरे का चश्मा विद्यार्थी और शिक्षा के बीच एक न दिखने वाली दीवार खड़ी कर देता है।

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