ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगेः संवेदना की कीमत

तकनीकी विकास ने सिर्फ मनुष्य के सामाजिक प्रतिरूप को ही प्रभावित नहीं किया है, बल्कि मानव जीवन की एकदम बुनियादी संरचना को भी आमूल-चूल ढंग से परिवर्तित किया है।

Author Published on: August 20, 2019 2:53 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

हम अक्सर देखते हैं कि कहीं कोई दुर्घटना होती है तो तत्काल हस्तक्षेप करने वालों से अधिक संख्या उन लोगों की होती है जो उसकी तस्वीर ले रहे होते हैं या फिर वीडियो बनाते हैं। कई बार ऐसा करने वालों में हम खुद भी होते हैं। ऐसे काम हमें फौरी तौर पर तो अचरज में डालते हैं, पर धीरे-धीरे इसके प्रति सहजता बढ़ती जा रही है, गोया यह कोई ‘सामान्य’ बात हो। दरअसल, इस प्रवृत्ति के निर्माण में तकनीकी विकास का भी योगदान है, जिसने एक अलग दुनिया रच दी है। अब हम सब वास्तविक और कृत्रिम, दोनों दुनिया में एक साथ जी रहे होते हैं और इसलिए दोनों ही जगह अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के उद्देश्य से घटनाओं पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। यह प्रतिक्रिया अलग-अलग दुनिया के लिए अलग होती है।

तकनीक इतने दबे पांव हमारे जीवन में हस्तक्षेप करती है कि हम आसानी से एक आदत के रूप में उसे स्वीकार कर लेते हैं। इसी तकनीकी विकास से मोबाइल क्रांति आई और हर मोबाइल में कैमरा और इंटरनेट की सुविधा के होने ने एक तरफ फेसबुक और ट्विटर जैसी आभासी दुनिया रची तो दूसरी ओर कैमरे से तस्वीर लेकर या वीडियो बना कर उस दुनिया में हस्तक्षेप करने का अवसर दिया। हर व्यक्ति का यह सहज स्वभाव होता है कि वह सामाजिक घटनाओं के प्रति सक्रिय होना चाहता है और अपने तरीके से प्रतिक्रिया व्यक्त करता है।

मानव समुदाय के लिए यह बहुत बुनियादी परिघटना है, क्योंकि इसी विधि से मनुष्य अपने सामाजिक होने की वैधता को पुष्ट कर पाता है। इसलिए जब वह ऐसा नहीं कर पाता है तो एक अपराधबोध का अनुभव करता है कि इस सामाजिक घटना में वह खुद को शामिल नहीं कर पाया। तकनीकी विकास ने उसे इस भाव से निकलने का रास्ता उपलब्ध करा दिया। दरअसल, तस्वीर लेने या वीडियो बनाने जैसी बात उसे इस अपराधबोध से काफी हद तक तटस्थ बना देती है, क्योंकि उस घटना को कैमरे में कैद करना और उसे आभासी दुनिया में पहुंचा देना उसे इस बात का दिलासा देता है कि वह सामाजिक घटनाओं से अनछुआ नहीं है। उसे यह संतोष हो जाता है कि इस घटना में वह एक सजग नागरिक के रूप में जो कुछ कर सकता था, उसने कर दिया।

अपनी सामाजिक भूमिका का निर्वाह कर देने की यही मानसिक संतुष्टि उसे प्रत्यक्ष जीवन में हस्तक्षेप की बजाय आभासी दुनिया में हस्तक्षेप के लिए प्रेरित करती है। इस पूरी प्रक्रिया में सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह हस्तक्षेप न्यूनतम जोखिम के साथ संपन्न हो जाता है, इसलिए भीरू किस्म के नागरिक समाज में यह प्रवृत्ति और सघन हो जाती है। या फिर जिस समाज में हस्तक्षेप अधिक जोखिम का काम है, वहां ऐसी प्रवृत्ति अधिक देखी जाती है। इस प्रकार, एक ही व्यक्ति एक साथ दो जीवन जी रहा होता है और वह दोनों को इस प्रकार अंतर्संबद्ध किए रहता है कि खास किस्म का संतुलन बना रहे।

तकनीकी विकास ने सिर्फ मनुष्य के सामाजिक प्रतिरूप को ही प्रभावित नहीं किया है, बल्कि मानव जीवन की एकदम बुनियादी संरचना को भी आमूल-चूल ढंग से परिवर्तित किया है। दरअसल, आभासी दुनिया के निर्माण के बाद मानव जीवन में एक और जो बड़ा परिवर्तन आया, वह है स्मृतियों का डिजिटल रूपांतरण। हम मूर्त रूप में जिस इंसानी जीवन को देख रहे होते हैं, वह स्मृतियों से संचालित होता है। अपनी इंद्रियों के माध्यम से मानव समुदाय भौतिक जीवन का जो भी अनुभव महसूस करता है, उसका अमूर्त संकेंद्रण स्मृतियों के रूप में होता रहता है और यही व्यक्तित्व के एक बड़े हिस्से का निर्माण करती हैं।
इस तरह हम जिस संवेदना से किसी चीज का अनुभव करते हैं, वैसी ही स्मृति हमारे अंतस में स्थायी हो जाती है। स्मृति निर्माण में संवेदना सबसे महत्त्वपूर्ण तत्त्व है और यही सबसे मानवीय चीज भी है। तकनीकी विकास ने इसी मूल विशेषता को सबसे अधिक चोट पहुंचाई। यह ठीक विपरीत आभासी दुनिया है, जहां स्मृतियां अनुभूतियों के सहारे नहीं सहेजी जा रहीं, बल्कि संवेदनशून्य घटनाओं को कैद भर किया जा रहा है। घटना को कैमरे से कैद कर लेना स्मृति को मानवीय अंतस से सिलिकन चिप में प्रतिस्थापित कर देना है। प्रतिस्थापन का यह क्षण संवेदना-शून्य होता है।

यही वजह है कि हम ऐसी विद्रूप तस्वीरें भी सोशल मीडिया पर देख पा रहे होते हैं, जब किसी शव या जलती चिता के साथ सेल्फी ली गई हो और ऐसी विचित्रताओं से भी अवगत हो रहे होते हैं जब नितांत निजी पलों को भी स्थायी मानवीय स्मृतियों में संजोने के बजाय उसे ‘डिजिटल स्मृति’ में बदलने की अधीरता की जा रही होती है। इन सबके मूल में एक ही बात है कि हम वास्तविक दुनिया के साथ-साथ डिजिटल दुनिया में भी बने रहना चाहते हैं। यह एक खतरनाक स्थिति है, क्योंकि इसने मानवता के मूल मर्म पर चोट पहुंचाई है। तकनीकी विकास जरूरी है, पर अगर यह मानवीय संवेदना की कीमत पर हो तो इस पर पुनर्विचार करना चाहिए।

सन्नी कुमार

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 दुनिया मेरे आगे: उम्र से पहले
2 दुनिया मेरे आगे : शोर की मार
3 दुनिया मेरे आगे: परदे के नायक