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दुनिया मेरे आगे- वृद्धाश्रम में मां

बचपन में सुरेश की माता का बहुत स्नेह मिलता था। खेलकूद कर जब भी मित्र के साथ उसके घर आता, तो माताजी कुछ न कुछ स्वादिष्ट व्यंजन बना कर हमें खिलाती थीं।
Author June 19, 2017 05:13 am
प्रतीकात्मक चित्र।

गिरीश पंकज

बहुत दिनों के बाद एक मित्र के घर जाना हुआ। जब भी जाता तो उनकी बूढ़ी माता सामने दिख जाती थीं। उनके पैर छूकर आशीर्वाद ले लिया करता था। वे प्रसन्न होकर हालचाल पूछ लेती थीं। बचपन में सुरेश की माता का बहुत स्नेह मिलता था। खेलकूद कर जब भी मित्र के साथ उसके घर आता, तो माताजी कुछ न कुछ स्वादिष्ट व्यंजन बना कर हमें खिलाती थीं। कभी दूध गरम करके देतीं, कभी आटे का हलवा, कभी भजिया तो कभी कुछ। वे अपने बेटे के मुकाबले मुझे कुछ ज्यादा ही दे देतीं। एक बार मेरा मित्र खेलते-खेलते गिर पड़ा और उसके माथे से खून बहने लगा। उसके पिताजी कहीं और गए हुए थे। मां को जैसे ही पता चला, वे तुरंत वहां पहुंचीं और मुझे याद है कि वे कितना परेशान और दुखी हो गई थीं, कितना रोई थीं और कैसे उन्होंने अपने बेटे के लिए रात-दिन एक कर दिया। वे उसे खेलने के लिए प्रेरित करती थीं। बेटा अच्छे नंबरों से पास हो जाए, इसके लिए उसकी हर इच्छा पूरी करती थीं। पिता अक्सर व्यवसाय के सिलसिले में प्रवास पर रहते थे, इसलिए वे बेटे का पूरा ध्यान रखती थीं। हम बड़े हुए तो मित्र पढ़-लिख कर पिता के व्यवसाय को देखने लगा और मैं नौकरी करने दूसरे शहर चला गया। इस बीच जब कभी अपने शहर आता, तो अपने उस बालसखा से जरूर मिलता। मां बूढ़ी हो चली थीं, फिर भी रसोई में जाकर कुछ न कुछ बना कर मेरे सामने रख देतीं। मैं जब उन्हें परेशान होने से मना करता तो वे बस मुस्करा देती थीं। इस बीच मित्र की शादी हो गई। उसके कुछ समय बाद मैं उससे मिलने पहुंचा तो पता चला उसके पिता का निधन हो चुका है और मां ने बिस्तर पकड़ लिया है। अब वे कुछ और वृद्ध हो गई थीं और बार-बार खांस भी रही थीं। मैंने मित्र से कहा- ‘यार, मां खांस रही हैं। दवाई नहीं दी क्या?’ इतना सुनना था कि मित्र खीझ कर बोला- ‘लाकर रख दी थी। लेकिन ये दवाई लेती ही नहीं। कहती है, तू निकाल कर दे। हद है।’ मैंने कहा- ‘तो क्या तुम मां को दवा नहीं पिला सकते? बचपन में तुझे हजारों बार दवा पिलाई होगी इन्होंने। खाना खिलाया, नहलाया-धुलाया, तू दवा नहीं पिला सकता?’ मेरी बात सुन कर मित्र ने दवा पिला दी।

बाद में मित्र ने कहा कि आजकल मां बहुत परेशान करती है। बिस्तर पर पड़ी-पड़ी हुक्म देती रहती है। पत्नी नाराज हो जाती है। इस पर मैंने कहा- ‘बुजुर्ग जीवन भर बच्चों की सेवा करते हैं। बुढ़ापे में उनकी सहज अपेक्षा रहती है कि बेटे या बेटी उनकी सेवा करें। जीवन भर उन्होंने हमारा ध्यान रखा, अब हमारा कर्तव्य है कि उनका ध्यान रखें। मेरे घर में भी पिता हैं और इसी तरह वे भी हमेशा कुछ न कुछ निर्देश देते रहते हैं। लेकिन हमने यह ध्यान रखा है कि उन्हें कोई तकलीफ न हो।’ खैर, उस मुलाकात के दो वर्ष बाद मैं शहर लौटा तो हमेशा की तरह उस मित्र के घर पहुंचा। मित्र ने खुशी के साथ मेरा स्वागत किया। उसकी पत्नी भी खुश थी। हमने चाय पी, नाश्ता किया। लेकिन मां कहीं नजर नहीं आ रही थीं। जब मैंने पूछा तो मित्र की पत्नी ने कहा- ‘हमने उन्हें वृद्धाश्रम भेज दिया है। उन्हीं ने जिद की।’ मित्र ने भी अपनी मजबूरी जताई।उनकी बातें सुन कर मेरी आंखों में आंसू आ गए। मैंने लगभग डांटते हुए कहा- ‘ये क्या कर दिया तुम लोगों ने? शर्म नहीं आई? मां की सेवा भी भारी पड़ गई थी तुम लोगों को?’ मित्र अपराध-बोध से ग्रस्त था और सफाई के तौर पर उसने मुझे बताया कि मां की देखभाल के लिए हर महीने वृद्धाश्रम को पैसे पहुंचाता रहता हूं और कभी-कभार हम जाकर उनसे मिलते भी हैं।

मैंने खीझ कर कहा, ‘बड़ी कृपा करते हो भाई। धन्य हो तुम लोग। मां के स्नेह का अच्छा सिला दिया तुमने।’ इसके बाद मैं उठ कर चला गया। वह समझ गया कि मैं बहुत नाराज हूं इसलिए उसने भी मुझे नहीं रोका। उसके बाद आज तक मैं उसके घर नहीं गया। हां, अब वृद्धाश्रम जाकर उसकी मां से जरूर मिलता हूं। मगर हर बार मेरी आंखों में केवल आंसू होते हैं। आंसू तो मां की आंखों में भी होते हैं, जिन्हें वे छिपाने की कोशिश करती रहती हैं। मैं हर बार कहता हूं कि ‘मां तुम मेरे साथ चलो। मेरे घर रहना।’ लेकिन मां मना कर देती हैं और कहती हैं- ‘यहां सब ठीक है बेटा। सुरेश भी आता रहता है। वे दोनों सुखी रहें। बस यही चाहती हूं।’ इस निर्मम दुनिया के बदलावों के बारे में सोचते हुए खुद पर लज्जित होकर लौट आता हूं।

 

 

 

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