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दुनिया मेरे आगे- मेले का झमेला

पड़ोसन के रोने की आवाज कानों में आई तो उनकी फिक्र हुई। सांत्वना देते हुए वजह पूछा तो उन्होंने बताया कि वे हनुमान मंदिर पर लगने वाले मेले में गई थीं।

Author May 22, 2017 6:12 AM
प्रतीकात्मक चित्र।

चंद्रकांता शर्मा

पड़ोसन के रोने की आवाज कानों में आई तो उनकी फिक्र हुई। सांत्वना देते हुए वजह पूछा तो उन्होंने बताया कि वे हनुमान मंदिर पर लगने वाले मेले में गई थीं। वहां काफी भीड़-भाड़ थी। एक चूड़ी वाले के पास वे चूड़ियां देखने लगीं कि पीछे से किसी ने आकर गले में पड़ी सोने की चेन खींची और तोड़ कर भाग गया। उन्होंने शोर मचाया, मगर वह चोर पकड़ा न जा सका। पड़ोसन ने सोने की वह चेन हाल ही में अपने पसीने की कमाई से पैसा जोड़ कर बनवाई थी। वे हनुमान दर्शन को क्या गर्इं कि लुट कर चली आर्इं। इसी तरह एक और व्यक्ति जान-पहचान के हैं जो एक मेले के मौके पर ही मंदिर में प्रसाद चढ़ाने के लिए कतार में खडेÞ थे। उनके साथ उनका पांचवर्षीय पुत्र भी था। पीछे से जेबकतरे ने पिछली जेब का चिरका लगाया और दो सौ रुपए लेकर रफूचक्कर हो गया। उन्हें पता तब चला जब बाद में उनके बेटे ने गुब्बारा लेने की जिद की। उन्होंने पैसे निकालने के लिए जेब में हाथ डाला तो फटी जेब में हाथ नीचे तक चला गया। वे ऊपर-नीचे सब तरफ की जेबों की तलाशी लेने लगे। लेकिन नोट होते तब तो मिलते! बेचारे मायूस घर आकर आइंदा मेले में कभी न जाने की कसमें खाने लगे।

इसके अलावा, गांव के ही मेले के दौरान एक घटना में इसका ज्यादा चिंताजनक रूप देखा गया, जहां एक किसान दंपति की लुटेरों ने हत्या तक कर दी और पत्नी के गहने उतार कर गायब हो गए। दरअसल, किसान दंपति अपने गांव से मेला देखने आए थे। जब वे अपने गांव लौटने लगे तो शाम गहराने लगी थी। सुनसान खेतों से गुजर रहे थे कि चार-पांच लोगों ने उन पर किसी पैने हथियार से ताबड़तोड़ वार शुरू कर दिए और जब वे दोनों मौत के मुंह में चले गए तो गहने और नकदी निकाल कर और लाशों को गेहूं के खेत में छिपा कर भाग खड़े हुए। दूसरे दिन खेत के मालिक ने लाश देखी और उसने शोर मचाया। उस किसान दंपति की मेले के कारण जान जा चुकी थी। ज्यादातर लोगों के भीतर यह धारणा गहरे पैठी है कि मेले में चीजें सस्ती और अच्छी मिलती हैं। इसकी वजह से बहुत सारे लोग खरीद के लिए मेले में जाते हैं। कुछ लोग मेलों को तफरीह करने के लिए अच्छी जगह मानते हैं तो कुछ लोग धार्मिक दृष्टि से उस दिन का विशेष माहात्म्य मानते हैं। कम पढ़े-लिखे या बिना पढ़े-लिखे लोग ही मेलों में जाते हों, ऐसा नहीं है। बल्कि बहुत पढ़े-लिखे बुद्धिजीवियों को भी मेलों में जाते देखा गया है। साथ ही उनमें से बहुत-से लोगों को ठगे जाकर या लुट कर आते देखा-सुना गया है। कैसी विडंबना है कि ऐसी दास्तानें सुनने के बाद भी लोग मेलों से अपना मोह तोड़ नहीं पाते। देवता को प्रसाद चढ़ाने में भले उनकी जान चली जाए या चाहे आर्थिक नुकसान उठाना पड़े, फिर भी लोग उन घटनाओं को होनी मान कर जाते रहते हैं। कई बार लगता है कि अगर देवता में दम था तो वह उनके उस समय हो रहे नुकसान को बचा लेता! लेकिन दुनिया की अंधी भक्ति और भेड़चाल ने हमारे सारे सामाजिक परिवेश को दिशाहीन कर दिया है।
जिन लोगों ने मानवीयता को ठीक से समझ लिया है, वे कमजोर तबकों या गरीबों को बराबर समझने, ऊंच-नीच की खाई को पाटने के अलावा दूसरी बातें नहीं मानते या जानते। गरीबों की उपेक्षा न करके उन्हें अपना मान लेना ही सच्चा पुण्य है, न कि मंदिरों में जाकर घंटों खड़े रहना।

मेलों में जहां लोगों को लुटते या ठगे जाते और कई बार जान से हाथ धोते देखा गया है, वहीं यौनहिंसा या उत्पीड़न जैसे मामले सामने आते रहते हैं। पेशेवर बदमाश और गुंडे महिलाओं और लड़कियों से छेड़छाड़ करते हैं। यह समझना मुश्किल हो जाता है कि आस्था के केंद्रों पर यह सब कैसे संभव हो पाता है। कहने का मतलब यह नहीं कि मेला बेमानी हो गया है। लेकिन जैसे हालात बन रहे हैं, उनमें घूमने के लिए हम मेले के दिन और उन्हीं जगहों को अंतिम ठिकाना क्यों समझें! घूमने तो कभी भी या कहीं भी जाया जा सकता है। और अगर ऐसी जगहों पर जाते ही हैं तो गहने या अधिक नकदी लेकर क्यों जाना! पसंद की चीजें आम दिनों की तरह बाजार से भी सुविधा के मुताबिक ली जा सकती हैं। अच्छा यही है कि मेलों के मोह में न पड़ कर हम घूमने, अपने शौक पूरे करने के साथ-साथ खुद को सुरक्षित रखने की कोशिश करें। मेलों के अलावा भी वैकल्पिक जगहों की तलाश करें, जहां किसी के दिमाग में कुछ खोने का डर न रहे, मेला झमेला न बने।

 

 

 

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