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दुनिया मेरे आगे: सांध्य वेला में

बुढ़ापे का अवसान रुपए-पैसे से परे होता है। सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो कोई बात नहीं। अगर उन्नीस-बीस हुआ तो बुढ़ापा अपमान, असुरक्षा, रोग, क्षीणता, कष्ट, दुख का साया बन जाता है।

Author Published on: July 13, 2020 4:45 AM
duniya mere aage, old age, lifeजीवन की सांध्य वेला में एक स्पर्श सुखद अनुभूति काे प्रदान करने वाला होता है।

सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’
बचपन अत्यंत सुखद अनुभूति है। न कोई चिंता न कोई जिम्मेदारी। सुभद्रा कुमारी चौहान के शब्दों में कहा जाए तो- ‘बार-बार आती है मुझको/ मधुर याद बचपन तेरी/ गया ले गया जीवन की/ सबसे मस्त खुशी मेरी।’ इसके बाद आता है किशोरावस्था। संवेगों के तूफानों का काल। गरम लहू का अहसास दिलाने वाला क्रांतिकारी समय।

बिहारी की मानें तो इस अवस्था के बहाव में जो बह गया उसे कोई नहीं बचा सकता और जो ठहर गया, वह जीवन में बड़ा आदमी बनता है। बनने न बनने के बीच बड़ी तेजी से जिस अवस्था का प्रवेश होता है, उसे युवावस्था कहते हैं। अर्थशास्त्र की भाषा में इसे ‘मैक्सिमम यूटिलिटी’ यानी अधिकतम उपयोगिता वाली अवस्था कह सकते हैं। आप जो कुछ भी करना चाहते हैं, इसी अवस्था में कर सकते हैं।

एक तरह से यह अवस्था बचपन और बुढ़ापे का संधि-स्थल है। बचपन और बुढ़ापे में समानताएं और विषमताएं दोनों हैं। ये दोनों ही अवस्थाएं आपके मस्तिष्क रूपी ‘मेमोरी कार्ड’ का शून्य रूप हैं। अंतर केवल इतना है कि बचपन में स्मृति जहां शून्य से अधिकतम की ओर बढ़ती हैं, वहीं बुढ़ापे में अधिकतम से शून्य की ओर घटती है। वैसे भी दुनिया में वही सुखी है, जिसकी स्मृति शून्य है। तुलसीदास के शब्दों में बालक, वृद्ध और वानर एक समान है। तीनों में चंचलता की समानता होती है।

अंतर केवल इतना है कि बालक की चंचलता मन मोह लेती है और बूढ़े की चंचलता, जिसे लाचारी कह सकते हैं, ‘सठियाना’, ‘दिमाग खराब हो जाना’ जैसे शब्दों से लक्षित होकर उन्हें भीतर तक भेदने का काम करती है। जीवन का यह पड़ाव कुछ के लिए मधु-स्मृतियों का पिटारा है तो कुछ के लिए कटु स्मृतियों की गंदगी का अभिशाप।

जीवन रूपी लॉकर का पासवर्ड 43234 है। यह पासवर्ड जीवन रूपी लॉकर का निगूढ़ रहस्य है। नवजात शिशु दो हाथों, दो पैरों यानी चार अंगों से रेंगता है। चलने की आरंभिक दशा में दो पैर और एक टेका यानी कुल तीन अंगों की आवश्यकता पड़ती है। युवा अवस्था से प्रौढ़ावस्था तक दो पैरों पर, बुढ़ापे में लकड़ी टेक कर चलने पर तीन और देहावसान के समय चार कंधों पर जीवन यात्रा समाप्त करनी पड़ती है। जन्म और मृत्यु निश्चित तथ्य है। उसी तरह शरीर का बूढ़ा होना परिवर्तन की नश्वरता का प्रमाण है। प्रकृति किसी चीज को ठहरने नहीं देती। प्रकृति का अर्थ ही बहाव है। इसलिए इसके विपरीत किसी भी प्रकार की चाह आगे जाकर दुख देता है।

सबसे बड़ा दुख तब होता है जब एक बूढ़ा अपनी लाठी समझने वाले बच्चों पर जीवन भर की कमाई लगा कर धोखे का शिकार होता है। न जाने कितने बच्चे अपने बूढ़े माता-पिताओं को घर से धक्के मार कर निकाल देते हैं। वे अपने बच्चों के आगे हाथ-पैर जोड़ते हैं, उन्हें घर में थोड़ी सी जगह देने की याचना करते हैं, रोते-गिड़गिड़ाते हैं।

हाल ही में मुंबई में लीलावती नाम की वृद्धा को घर से धक्के मार कर निकाल दिया गया। कानपुर में कमलेश नाम के वृद्ध को बेटे-बहू ने तमाम यातनाएं दीं। हाल यह हुआ कि मामला सुर्खियों में आ गया। दोनों ही वृद्ध धनी थे, लेकिन उनका पैसा उन्हें नहीं बचा पाया। देश में ऐसे कितने ही लीलावती और कमलेश हैं जो चुपचाप यातनाएं, कष्ट, पीड़ा झेलने को मजबूर हैं। जीवन के अंतिम पड़ाव में दुखों के खंडित द्वीपों की तरह बिखर-बिखर कर मरने को मजबूर है। वे दया-मृत्यु मांगते हैं, लेकिन बदले में उन्हें दुत्कार, अपशब्द, शारीरिक-मानसिक कष्ट मिलते हैं।

बुढ़ापे का अवसान रुपए-पैसे से परे होता है। सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो कोई बात नहीं। अगर उन्नीस-बीस हुआ तो बुढ़ापा अपमान, असुरक्षा, रोग, क्षीणता, कष्ट, दुख का साया बन जाता है। हर घड़ी किट-किट, झिक-झिक, ताना-झिड़की सहने की आदत डालनी पड़ती है। बात-बात में बोझ का अहसास कराने वाला कटु शब्द-भंडार हजारों सुइयों की चुभन एक साथ देता है। सुख के एक क्षण की प्रतीक्षा मृत्यु की चौखट तक ला देती है।

जिन्हें अंगुली पकड़ कर चलना सिखाते हैं, वे ही अंगुली दिखा कर घर से निकल जाने को कहते हैं। जिन बच्चों को देख कर कभी मां-बाप प्रसन्न होते थे, आज उन्हीं के बूढ़े होने पर बच्चे घृणा करते हैं। बिन कहे बच्चों की हर इच्छा पूरी करने वाले मां-बाप जब बूढ़े हो जाते हैं तब छोटी-छोटी चीजों के लिए तरस जाते हैं। ऐसी स्थिति में जीते जी मरने का अभ्यास ही बुढ़ापा है।

बुढ़ापे को सुखमय बनाना है तो बच्चों के भीतर सबसे पहले मानवीय संवेदनाएं भरिए। अच्छे विचार पुस्तकों में नहीं अच्छे बर्ताव से मिलते हैं। इसलिए बच्चों के सामने हमें आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए। बच्चों को वसीयत में गाड़ी, बंगला, बैंक की बचत दे न दें, मगर बेहतर मनुष्य बनने की शिक्षा देना न भूलें। बचपन से बच्चों को बड़ों का आदर करना सिखाइए। भूल होने पर क्षमा मांगना सिखाइए। अनाज की कमी से आदमी भूखा मर सकता है, लेकिन मानवीय संवेदनाओं की कमी से पूरी मानवता मर सकती है।

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