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दुनिया मेरे आगे: गरिमा की बोली

किसी भी समाज के भीतर एक पारिवारिक व्यवस्था रहती है, जहां बातचीत का स्तर काफी शालीन रहता है। माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नी जैसे संबधों से युक्त कुटुंब के बीच भाषा बिल्कुल निर्धारित होती है। प्रेमी-प्रेमिका के बीच भी आम जीवन में संवाद ऐसा नहीं होता, जैसी बातचीत फैशन में आए भोजपुरी गानों में सुनने को मिलती है। इसमें प्रेम कम कामुकता ज्यादा झलकती है।

Author Published on: March 31, 2020 3:01 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

संजय दुबे
भोजपुरी गीत क्या वाकई अश्लील ही होते हैं? आखिर इसकी ऐसी छवि क्यों बन गई? क्यों दूसरे भाषा-भाषी के साथ खुद भोजपुरी समाज भी अपने बच्चों के सामने इस भाषा में बात नहीं करता? तमाम ऐसे सवाल हैं जो किसी भी गैर-भोजपुरी व्यक्ति के मन में चलते रहते हैं। भोजपुरी भाषा का एक समृद्व इतिहास है। यहां भिखारी ठाकुर ऐसी शख्सियत रही हैं, जो इस भाषा के शेक्सपियर भी माने जाते हैं और जिन्होंने महिलाओं की समस्याओं पर विशेष लेखन किया है। आज गीतों में द्विअर्थी बोलों के चलते भोजपुरी मशहूर होने के साथ बदनाम भी हुई है। जबकि वास्तविक स्थिति ऐसी नहीं है।

किसी भी समाज के भीतर एक पारिवारिक व्यवस्था रहती है, जहां बातचीत का स्तर काफी शालीन रहता है। माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नी जैसे संबधों से युक्त कुटुंब के बीच भाषा बिल्कुल निर्धारित होती है। प्रेमी-प्रेमिका के बीच भी आम जीवन में संवाद ऐसा नहीं होता, जैसी बातचीत फैशन में आए भोजपुरी गानों में सुनने को मिलती है। इसमें प्रेम कम कामुकता ज्यादा झलकती है।

भोजपुरी गानों का अपना अलग अंदाज-ए-बयां रहा है। अभी भी अगर कहीं ‘लाले-लाले होंठवा से बरसे ले ललइया कि रस चुएला, जइसें अमवां के मोजरा से रस चुएला’ बज रहा हो, तब हम बिना सुने नहीं रह सकते। यह फिल्म ‘लागी नाहीं छूटे रामा’ 1963 में आई थी। सबको यह गीत समान भाव से आकर्षित, हर्षित करता है। इसकी सबसे खास बात यह है कि इसमें लयबद्वता, सरलता, सहजता नैसर्गिक रूप से निहित है। इसका इस्तेमाल कैसे और कहां होता है, यह इसका प्रयोग करने वाले निर्भर करता है। इसका फायदा वे लोग उठाते हैं, जिनके लिए यह आज ‘सोने की अंडा’ देने वाली मुर्गी है। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं है कि उनके लिखे गाने से समाज में क्या संदेश जा रहा है या इसे गुनगुनाने पर वहां मौजूद लोगों के मानस पर कैसा प्रभाव पड़ेगा!

दरअसल, भोजपुरी गीत आज अपनी सरलता या सहजता के बजाय द्विअर्थी बोलों की वजह से ज्यादा चलन में है। इस तरह के गीतों को यूट्यूब पर आते ही लोग हाथों-हाथ लेते हैं। जबकि भोजपुरी गीतों की एक समृद्ध विरासत रही है। इसके कुछ गानों पर नजर डालें तो खुद ही इसकी मकबूलियत का पता चल जाता है। मसलन, ‘हे गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो, सइयां से कर दे मिलनवा हो हाय राम’, ‘गोरकी पतरकी रे, मारे लू जियरा उड़ि उड़ि जाय’, ‘लाठी भाला चले ला ना’, ‘कैसे बनी कैसे बनी, फुलौड़ी बिना चटनी कइसे बनी’ ये कुछ ऐसे गाने हैं, जिनकी लोकप्रियता आज भी बरकरार है।

बोली और भाषा समाज के व्यवहार को दिखाती-बताती है। भाषाविदों का मानना है कि भौगोलिक, आर्थिक कारक भी समाज के निर्माण में महती भूमिका निभाते हैं। इन कारकों के चलते भाषाओं के भीतर अक्खड़पन, सरलता, सहृदयता परिलक्षित होती है। आज के परिवेश में भोजपुरी समाज का अधिकतर हिस्सा अपने मूल स्थान से आजीविका के चलते दूर है। लिहाजा वह सामाजिक संस्कारों के दवाब से मुक्त हो गया है। जब भोजपुरी भाषी रोजगार के सिलसिले में मुंबई के भीतर टैक्सी चला रहा है, तब वह अकेले में जिस फंतासी में जीता है, वही उसे गीतों के माध्यम से बाजार परोस रहा है। अब ऐसे श्रोताओं के दम पर ही बाजार चल रहा है।

इस चलन की वजह से बाजार में गंभीर किस्म के श्रोताओं ने हिंदी गीतों की तरफ का रुख कर लिया। उनके सामने भी एक बड़ा सवाल यह रहा है कि वह जब भी बाजार में भोजपुरी गीतों के नए एलबम को लेने जाता है, तब उसे ऊलजुलूल ही सुनने को मिलता है। ऐसे में गंभीर श्रोताओं के सामने मजबूरी यह है कि उसे वही पुराने गीत सुनने पड़ते हैं, जिन्हें वे बीसों साल से सुनता आ रहा है।

ऐसा नहीं है कि भोजपुरी भाषा में प्रतिभा की कमी है। नजीर हुसैन साहब ने लगभग चार सौ फिल्में कीं। गाजीपुर की पैदाइश थी, लिहाजा मादरे-जबान भोजपुरी थी। इनकी दिली ख्वाहिश थी कि भोजपुरी फिल्म बनाई जाए। इसकी चर्चा उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र बाबू से की। उन्होंने कहा कि आपकी सोच बहुत बढ़िया है, पर इसके लिए बहुत हिम्मत चाहिए। नजीर साहब उनकी इस बात से काफी प्रभावित हुए। एक स्क्रिप्ट लिखी। उन्हें निर्माता के रूप में विश्वनाथ शाहाबादी और निर्देशक बतौर कुंदन कुमार मिले। कई अन्य बाधाओं के बीच उनकी फिल्म ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ बनी।

गीतकार थे शैलेंद्र और धुन बनाई थी चित्रगुप्त ने। लेकिन फिल्म को लेकर वितरकों ने पहले काफी हीला-हवाली की। जब इसका बाक्स आॅफिस प्रदर्शन परिणाम आया तो कई वितरकों को ताउम्र यह अफसोस रहा कि उन्होंने इसे क्यों नहीं लिया! महज पांच लाख रुपए की लागत में बनी इस फिल्म ने पचहत्तर लाख रुपए का कारोबार किया। साथ ही भोजपुरी फिल्मों के निर्माण का मार्ग भी प्रशस्त किया और भोजपुरी समाज को एक स्वस्थ संदेश भी दिया।

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