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दुनिया मेरे आगे: समाज का शिक्षण

आजकल अपने आपको प्रगतिशील मानने वाले हम लोग सोचते हैं कि बच्चों को अपने हिसाब से जीने दिया जाए। उसके जीवन में कोई हस्तक्षेप न करें। कहा भी गया है कि जब पिता का जूता बच्चों के पैर में आने लगे, तब बच्चे के साथ मित्रवत व्यवहार करना चाहिए।

प्रतीकात्मक तस्वीर

हेमंत कुमार पारीक

आजकल किशोर वय के बच्चों को पता नहीं क्या हो रहा है और क्यों अपने ऊपर नियंत्रण खो रहे हैं! कुछ समय पहले दिल्ली के किशनगढ़ में एक किशोर ने अपने माता-पिता और बहन की हत्या कर दी। यह खबर सबके लिए चौंकाने वाली बात थी और लोग समझ नहीं पा रहे थे कि ऐसा क्यों हुआ होगा! जांच के बाद कारण यह बताया गया कि माता-पिता और बहन की बातों को वह अपने निजी जीवन में दखल मानता था। वह किशोर बारहवीं कक्षा की परीक्षा में फेल हो गया था। इसके बावजूद उसके पिता ने उसे एक इंजीनियरिंग संस्थान में प्रवेश दिलवा दिया था। इंजीनियरिंग की पढ़ाई अभी भी प्रतिष्ठा का सूचक मानी जाती है। इसलिए अब इंजीनियरिंग कॉलेज और कोचिंग हर शहर में काफी संख्या में दिख जाते हैं। उनमें पैसे के दम पर आसानी से प्रवेश मिल जाता है। कुछ समय पहले एक पुराना छात्र मिला था। बारहवीं के बाद एक विषय में बमुश्किल डिप्लोमा पास करने के बाद उसके पिता को लगा कि जिस तरह की तिकड़म से उसने डिप्लोमा लिया है, उसी तरह इंजीनियरिंग में स्नातक की डिग्री भी हासिल कर लेगा। शायद यही सोच कर उसके पिता ने अपने बेटे को इंजीनियरिंग में दाखिला दिलवा दिया होगा। लेकिन सभी की अपनी-अपनी रुचि होती है। बच्चे ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई बेमन से की होगी और फेल हो गया।

आजकल अपने आपको प्रगतिशील मानने वाले हम लोग सोचते हैं कि बच्चों को अपने हिसाब से जीने दिया जाए। उसके जीवन में कोई हस्तक्षेप न करें। कहा भी गया है कि जब पिता का जूता बच्चों के पैर में आने लगे, तब बच्चे के साथ मित्रवत व्यवहार करना चाहिए। यह खुली सोच है। मगर हकीकत में समाज इसके अनुरूप तैयार नहीं है। हमारे समाज में कई तरह के बंधन हैं। आज के परिदृष्य में रोजी-रोटी और प्रतिष्ठा अर्जित करने का एकमात्र रास्ता पढ़ाई-लिखाई से होकर गुजरता है। पढ़ाई मतलब एक अदद डिग्री प्राप्त करना। इसलिए इतने सारे निजी कॉलेज खुल गए हैं जो डिप्लोमा, डिग्री और पीएचडी के बाजार ही हैं। सब मिल कर ‘पैसा फेंक तमाशा देख’ वाला जुमला चरितार्थ कर रहे हैं। इस तरह के काम को सरलता से अंजाम देने के लिए बिचौलियों का एक वर्ग काम करता है। मुश्किल यह है कि डिग्री प्राप्त कर लेने के बाद भी कोई गारंटी नहीं कि नौकरी मिल जाएगी। अगर छोटी-मोटी नौकरी मिल भी गई तो संस्थान के मालिक का दबाब रहता है। कई तरह की पाबंदियां होती हैं। आजकल तो दस-पंद्रह हजार रुपए महीने की तनख्वाह में कंपनियों को आसानी से एक इंजीनियरिंग स्नातक उपलब्ध हो जाता है। बाकी क्षेत्रों में भी मारामारी है। ऐसे उदाहरण बहुत कम या नगण्य होंगे कि बिना कारोबारी पृष्ठभूमि का व्यक्ति व्यापार के क्षेत्र में सफल हुआ हो। बाकी खेल, कला, संगीत आदि क्षेत्रों में विरले ही लोगों को सफलता मिलती है। जिन्हें मिलती है, वे किसी परीकथा के नायक बन जाते हैं। ऐसी स्थिति में अगर कोई भी पिता अपने बच्चों को आगे बढ़ाने की कोशिश करता है तो इसमें क्या बुराई है! दिल्ली की उस घटना के संदर्भ में भी यही हुआ होगा। पिता ने उसे शुरू में यथासंभव आजादी दी होगी। लेकिन बच्चा गलत संगत में पड़ गया और इतना बड़ा अपराध कर गया।

दुनिया के कई देशों में सेकेंडरी या इंटरमीडिएट की पढ़ाई के बाद रोजगार के कई अवसर मिलते हैं। पढ़ाई करते-करते विद्यार्थी अपना खर्चा उठाने के लिए पार्ट-टाइम नौकरी भी कर सकता है। मेरे एक मित्र का बेटा एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में उच्च पद पर कार्यरत है। कुछ समय पहले जब वह स्वदेश लौटा था तो मुझसे मिलने आया था। मैंने पूछा था कि तुम्हारा खर्चा कौन चलाता था, तो उसने तपाक से जबाव दिया कि पिताजी ने तो केवल जाने का टिकट करवा दिया था, उसके बाद अपने सारे खर्चे मैंने खुद उठाए थे। रात के समय ट्रांसपोर्टर के यहां ढुलाई भी की, पेट्रोल पम्प पर काम भी किया। आवाज अच्छी है, इसलिए क्लबों में गाना भी गया। हमारे यहां खेल, संगीत, चित्रकारी और लेखन आदि को कोई महत्त्व नहीं दिया जाता। जबकि विदेशों में इन क्षेत्रों में कॅरिअर बनाना असान होता है। सम्मान भी मिलता है। लेकिन हमारे देश में ये क्षेत्र अभी करियर के रूप में विकसित नहीं हो पाए हैं। इसके अतिरिक्त विकसित देशों में बच्चे आत्मनिर्भर होने के लिए छोटे-मोटे काम भी करते हैं। पर हमारे देश में बच्चों को आजादी भी चाहिए, पिता की हैसियत और संपत्ति भी। अपना नाम करने की अपेक्षा पिताजी के नाम और काम को सिर पर लादे चलना चाहते हैं। लेकिन इसमें पूरी तरह उनका कसूर भी नहीं है। एक तो हमारे देश में व्यवस्थागत रूप से रोजगार का ढांचा बेहद कमजोर है और इससे चिंताजनक हालात पैदा हो रहे हैं, दूसरे, हम अपने बच्चों को शुरू से ही सामाजिक रूप से जिस तरह प्रशिक्षित होने देते हैं, उसके नतीजे कई बार दुखद रूप में सामने आते हैं।

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