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दुनिया मेरे आगे: कुछ न होने का सुख

पिछले कुछ समय से मैं यह समझने की कोशिश कर रहा था कि कोई नया या अनजान व्यक्ति हमसे बातचीत के दौरान हमारे बारे में क्या जानना चाहता है! मुझे लगा कि हर नया व्यक्ति हमारे बारे में सबसे पहले यह जानना चाहता है कि हम क्या हैं! अगर हम ‘कुछ’ हैं तो वह हममें रुचि लेता है और चर्चा को उसी दिशा में मोड़ देता है।

Author April 30, 2018 05:22 am
तस्वीर का इस्तेमाल सांकेतिक तौर पर किया गया है।

ऋषभ कुमार मिश्र

पिछले कुछ समय से मैं यह समझने की कोशिश कर रहा था कि कोई नया या अनजान व्यक्ति हमसे बातचीत के दौरान हमारे बारे में क्या जानना चाहता है! मुझे लगा कि हर नया व्यक्ति हमारे बारे में सबसे पहले यह जानना चाहता है कि हम क्या हैं! अगर हम ‘कुछ’ हैं तो वह हममें रुचि लेता है और चर्चा को उसी दिशा में मोड़ देता है। अगर उस नए व्यक्ति की ‘कुछ’ की परिभाषा में हम महत्त्वपूर्ण नहीं हैं तो हम चर्चा से बाहर हो जाते हैं। असल में ‘कुछ’ होना या न होना सापेक्षिक है। प्रथम दृष्टया लगता है कि यह हमको परिभाषित कर रहा है, लेकिन सामने वाला इसके जरिए हमारे भीतर छिपी उस ताकत को लक्ष्य कर रहा होता है, जिसे वह अपनी आवश्यकता के मुताबिक प्रयोग कर सके। हमारी ताकतवर की स्थिति श्रेष्ठतम नहीं होती है। यह हम जानते हैं और हमारे अलावा अन्य भी। इसीलिए हम श्रेष्ठ होने के भ्रम को बनाए रखने के लिए ‘ताकतवर’ स्थिति की खोज करते रहते हैं। अपने आसपास के लोगों को अपनी श्रेष्ठता का प्रमाण देते रहते हैं। इसके लिए अलग-अलग तरह के प्रलोभनों से ताकत का डंका पीटते रहते हैं।

यों ताकत की श्रेष्ठता का प्रमाण विनम्रता और परहित में है, लेकिन ऐसा कम ही होता है। आमतौर पर अपनी ताकत की सिद्धि के लिए व्यक्ति दूसरों से खुद को अलग करने की कोशिश करता है। यहां दूसरों से अलग होने का आशय हमारी वैयक्तिक क्षमताओं का प्रस्फुटन और विविधता के रूप में उसकी सार्वजनिक स्वीकृति नहीं है। इसका आशय ऐसी श्रेष्ठता से है, जहां हम दूसरों से ऊंचे पायदान पर खड़े हों। विडंबना यह है कि ताकतवर की इस हैसियत के नकारात्मक प्रयोग को ज्यादा स्वीकृति मिल चुकी है। इसका अंदाजा हम इसी बात से लगा सकते हैं कि किसी के ताकतवर होने का अर्थ है कि वह हमारा कितना नुकसान कर सकता है, उससे कितने लोग भयाक्रांत हैं। इस स्थिति से बचने के लिए अन्य चाटुकारिता की चाशनी का प्रयोग करते हैं। यह पक्ष जितना सच है, उतना यह भी मौजूं है कि ताकत के बिना उस व्यक्ति की ‘हैसियत’ को भी अन्य अच्छे से जानते हैं। कुछ होने की चाह हमें ऐसे फंसाए रहती है कि हम तय नहीं कर पाते कि वास्तव में हम क्या बनना चाह रहे हैं या बस खुद के अस्तित्व को दूसरों की खातिर सिद्ध करने के लिए उनके द्वारा स्वीकार किए गए मॉडल में ढलना चाहते हैं। बचपन में हर कोई पूछता है कि बड़े होकर क्या बनोगे! बड़े होने पर सवाल आता है कि आप क्या करते हैं या आप कौन हैं! इसका निर्धारण इस बात से होता है कि आप क्या करते हैं। कई बार मन में आता है कि ऐसे सवालों का उत्तर दे दूं कि मैं कुछ नहीं करता हूं। क्या यह कह देने से कि मैं कुछ नहीं करता हूं, मेरा अस्तित्व शून्य हो जाएगा?

चूंकि मेरी भौतिक उपस्थिति और क्रियाओं को नजरअंदाज नहीं कर सकते, इसलिए मेरा अस्तित्व बना रहेगा, लेकिन सामने वाले की दृष्टि से उसमें लघुता आ जाएगी। अगर दूसरों की दृष्टि में लघुता हमें कमजोर करने लगे तो सतर्क होने की जरूरत है। इस स्थिति में अगर हम प्रतिक्रियात्मक होते हैं तो एक छद्म युद्ध का हिस्सा बन जाएंगे। मान लीजिए कि हमने लघुता का प्रतिकार कर लिया तो कोई नया व्यक्ति नए तरीके से हमारी लघुता को परिभाषित करेगा। तो लघुता का आनंद लेने में कोई हर्ज है क्या? लघु मानव के इसी आनंदभाव ने लोक में बुद्ध और गांधी जैसे नायकों की प्रतिष्ठा की। अपार शक्ति के स्रोत होने के बावजूद ये कभी प्रतिक्रियात्मक नहीं हुए। ये परहित के लिए समर्पित थे। दरअसल, ताकत की खोज और सिद्धि हमें वैयक्तिक दृष्टि से कायर बना देती है। इस कायरता को छिपाने के लिए ताकत के आवरण की खोज उद्विग्न करती है। आखिरकार यह उद्विग्नता दूसरों को नीचा दिखा कर थोड़ी देर के लिए शांत हो सकती है, लेकिन खत्म नहीं।

इसके उलट अगर हमने ‘कुछ’ न होने में सुख खोज लिया तो हम सुखी होंगे। हम मानव होने की अपनी विशेषता का दूसरा पक्ष पहचानें। अपनी ऊर्जा को मूर्खों या दुष्ट प्रकृति वालों से संघर्ष में नष्ट नहीं करें। किसी ऐसी धारा को खोजें जो हमारी रचनात्मकता को पोषित करे और स्वांत: सुखाय हो। इसके लिए हमें ‘कुछ’ होने की लालसा त्यागनी होगी। हम क्या हैं, इसका फैसला सुनने के लिए दूसरों का मुंह ताकने का लोभ छोड़ना होगा। हम क्या करना चाहते हैं, इसे तय करके करें। ध्यान रखने की जरूरत है कि अनुकरण और प्रतिक्रियावाद उद्विग्न करता है, संतुष्ट नहीं। यह हमारे होने को सत्ता के सापेक्ष सिद्ध करता है, लेकिन हमारे होने का हमारे लिए क्या अर्थ है, इससे दूर कर देता है।

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