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दुनिया मेरे आगे- बच्चे कहां हैं महफूज

जब स्कूलों में बच्चों के साथ गलत हरकतें की जाती हैं तो समाज को यह सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि आखिर हमारे बच्चे कहां पर सुरक्षित हैं?
Author September 27, 2017 05:29 am
रेयान इंटरनेशनल स्कूल।

बृजमोहन आचार्य

वैसे तो घर में मां ही पहली गुरु बन कर बच्चे को अच्छे-बुरे का भाव बता देती है। लेकिन बच्चे को जीवन के मूल उद्देश्य से परिचय तो शिक्षा का मंदिर ही कराता है। इस मंदिर में बच्चे को समाज में क्या अच्छा है और क्या बुरा है, सिखाया जाता है। साथ ही उसके भविष्य के निर्माण की नींव कैसे भरनी है, इसकी निर्माण सामग्री भी यहीं तैयार होती है। माता-पिता भी अपने जिगर के टुकड़ों को स्कूल भेज कर निश्ंिचत हो जाते हैं, क्योंकि उन्हें मालूम है कि सरस्वती के मंदिर में बच्चा पूर्णरूप से तैयार होकर ही बाहर निकलेगा और परिवार, समाज तथा देश का नाम रोशन करेगा। इसलिए अक्सर स्कूलों के आगे बड़े अक्षरों में लिखा भी जाता है,‘ज्ञानार्थ प्रवेश और सेवार्थ प्रस्थान’। जब स्कूलों में बच्चों के साथ गलत हरकतें की जाती हैं तो समाज को यह सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि आखिर हमारे बच्चे कहां पर सुरक्षित हैं?

भारी भरकम बैग अपने नाजुक कंधे पर रख कर जब बच्चा स्कूल जाता है और जब तक वापस घर नहीं पहुंचता है तब तक मां-बाप के माथे पर चिंता की लकीरें खिंची रहती हैं। इस प्रतियोगी युग में बच्चे को अगर नहीं पढ़ाया गया तो बच्चा किसी भी लायक नहीं रहेगा। इसी सोच के साथ अभिभावक अपने बूते से बाहर जाकर बच्चे को ऊंचे और महंगे स्कूलों में दाखिला कराते हैं। गुरुग्राम रेयान इंटरनेशनल स्कूल में सात साल के बच्चे प्रद्युम्न की हत्या का मामला अभी पुराना नहीं पड़ा है। इसी बीच राजस्थान के सीकर जिले के अजीतगढ़ में एक छात्रा के साथ स्कूल के एक शिक्षक और स्कूल निदेशक द्वारा बलात्कार करने की घटना सामने आई है। स्थिति यह हो गई कि वह छात्रा गर्भवती हो गई। सोचिए कि उस छात्रा और उसके परिवार पर क्या गुजरी रही होगी। छात्रा को अतिरिक्त कक्षा के नाम पर शिक्षक उसे बुलाता और दुष्कर्म करता था। गर्भवती होने पर शिक्षक ने निजी अस्पताल की मिलीभगत से उसका गर्भपात कराया। वह तो कहिए कि छात्रा ने वहां किसी को असलियत बता दी, तब जाकर घटना का पता चला।

सीकर जिला आज कोटा के बाद शिक्षा का दूसरा केंद्र बना हुआ है। यहां पर कई राज्यों के अभिभावक अपने बच्चों को कुछ कर गुजरने का सपना लेकर भेजते हैं लेकिन जब इस प्रकार की घटनाएं होती हैं तो चिंतित होना स्वाभाविक है। देखादेखी में महंगे और सुिवधायुक्त स्कूलों में अपने बच्चों को शिक्षा दिलाना सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रश्न बनता जा रहा है। ऐसे महंगे स्कूलों में शिक्षा दिलाने भर से बच्चे का करिअ‍ॅर बन जाना निश्चित नहीं हो जाता। लेकिन आज भागदौड़ की जिंदगी और माता-पिता नौकरी पेशा होने के कारण उन्हें फुर्सत ही नहीं है कि वे अपने बच्चे के साथ स्कूल में क्या हो रहा है या उनकी मित्र मंडली कैसी है, इसकी जांच कर सकें। माता-पिता यही सोचते हैं कि सिर्फ महंगे स्कूल में बच्चे का दाखिला करा देना ही पर्याप्त है। यह सही है कि हर माता-पिता चाहता है कि उसका बच्चा समाज में कुछ नाम कमाए लेकिन क्या उनको यह मालूम कि जिस स्कूल परिसर में अपने लाडले को भेज रहे हैं, वहां सब कुछ ठीकठाक नहीं चल रहा है। जरूरी है कि अभिभावकों को यह भी पता हो कि वहां का वातावरण कैसा है और पढ़ाई के अलावा उसके बच्चे के साथ और भी क्या-कुछ हो रहा है।

इसके लिए बच्चे से नियमित बातचीत जरूरी है। स्कूल प्रबंधन बच्चे को दाखिला कराने के दौरान उसकी और उसके अभिभावकों की सारी कुंडली की जांच पड़ताल करता है तब उसके बाद बच्चे को प्रवेश देने की प्रक्रिया शुरू करता है। अभिभावकों को भी चाहिए कि वे जिस स्कूल में अपने बच्चे का दाखिला करा रहे हैं कि उसमें सुरक्षात्मक उपायों की पूरी जानकारी कर लें। सिर्फ महंगा होने से ही कोई स्कूल अच्छा नहीं हो जाता? सचमुच एक पारदर्शी प्रणाली की जरूरत है। आज अभिभावकों अंधेरे में रखा जाता है। रेयान स्कूल के प्रबंधक ने अभिभावकों को कभी नहीं बताया कि छात्र और स्कूल के चौथे दरजे का स्टाफ एक ही शौचालय इस्तेमाल करते हैं। यह भी देखा गया है कि ऐसे स्कूलों में कमियां होने के बावजूद अखबारों में इसलिए खबरें नहीं छपतीं क्योंकि उनका मुंह स्कूल प्रबंधन विज्ञापनों से बंद कर देता है। स्कूल के नाम शुद्धरूप से दुकानदारी की जा रही है। स्कूलों का समय-समय पर निरीक्षण होना चाहिए और वहां बच्चों को क्या पढ़ाया जा रहा है और वहां का स्टाफ प्रशिक्षित है या नहीं है, इसकी जांच होनी चाहिए। लेकिन स्थिति यह है कि जिस व्यक्ति को पढ़ाई-लिखाई से कुछ भी नहीं मतलब होता वह पैसे के दम पर स्कूल खोल कर बैठ जाता है। ऐसे में बच्चे का भविष्य कैसे तैयार होगा। सुरक्षा की बात तो कोसों दूर है। अगर अभिभावकों ने अपना थोड़ा सा समय भी बच्चों के लिए नहीं निकाला तो बच्चे अपने मन की बात आखिर किससे कहेंगे। इसके लिए सरकारों को भी कुछ सख्त कदम उठाने होंगे। अन्यथा हर साल सिर्फ चौदह नवंबर को बाल दिवस पर बच्चों की सुरक्षा और उनके सुनहरे भविष्य की बातें करते रहेंगे और उनके साथ दुष्कर्म की घटनाएं होती रहेंगी।

 

 

 

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