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दुनिया मेरे आगेः निजता की अदृश्य लकीर

स्कूल के दिनों में असेंबली या फिर खेल की कक्षा के वक्त विद्यार्थियों को पंक्तिबद्ध करने के पहले कहा जाता था कि हर व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से एक हाथ की दूरी बना कर खड़ा हो, ताकि सब स्वतंत्र और सहजता से अपना काम व्यस्थित रूप से कर सकें। यही सबक हमें फिर याद करने की जरूरत है। किसी के भी जीवन में हमें और किसी को भी अपने जीवन में इतना हस्तक्षेप नहीं करने देना चाहिए कि हमारी खुशियों और निजता पर उसका विपरीत प्रभाव पड़े।

Author Published on: August 23, 2019 2:23 AM
कार्यक्षेत्र और परिवार के बीच भी इस सीमा रेखा की सामान्यत: अनदेखी की जाती है। आप कैसे कपड़े पहनते हैं, आप मांसाहारी हैं या शाकाहारी हैं, आप अपनी भाषा बोलते हैं या विदेशी भाषा में संवाद करना पसंद करते हैं, आपका व्यवसाय, आपकी शादी, आपके बच्चे, विचार- इन सब संदर्भों में भी मनमाने ढंग से समाज के कुछ लोग अपने बनाए रूढ़िवादी मापदंडों और पूर्वाग्रहों को थोप कर जीवन में अनचाही मुश्किलें पैदा करने का प्रयास करते रहते हैं। (प्रतीकात्मक तस्वीर)

एकता कानूनगो बक्षी

मनुष्य सामाजिक प्राणी है और समाज की अपनी एक व्यवस्था है, जिसके अपने कुछ नियम और सलीके हैं। ये नियम हमें एक-दूसरे से जोड़े रखने का भी काम करते हैं। इन नियमों के साथ एक अदृश्य लकीर ऐसी भी हम सबके बीच खिंची होती है, जो हमारी और दूसरों की आजादी और उनकी निजता की सुरक्षा और मान को सुरक्षित रखा जाना सुनिश्चित करती है। इस लकीर का पालन किसी भी सभ्य समाज में रहने वाले हर व्यक्ति का दायित्व होना अपेक्षित रहता है।
देखा गया है कि वही समाज फलता-फूलता है, जहां नए का स्वागत हो और जिसमें हर इंसान को अपना जीवन अपनी पसंद से जीने की आजादी हो। कई बार इसके विपरीत भी देखने को मिलता है, जब समाज कोई एक ऐसा रूढ़ ढांचा बना लेता है, जिसमें अपनी तरह से ही चीजों का मूल्यांकन किया जाने लगता है। व्यापक और नए को स्वीकार करने की दृष्टि के अभाव में वह कई व्यक्तियों की गतिविधियों को खारिज कर देने को ही उचित मानने लगता है। अगर हम उनके बनाए मापदंडों पर खरे नहीं उतर पाते तो हमें असफल घोषित कर दिया जाता है। समाज की आकांक्षाओं का दबाव कभी-कभी उस सीमा रेखा को भी लांघ जाता है, जिसके चलते इंसान खुद को हताश, असहाय महसूस करने लगता है और गलत कदम उठा लेने पर भी विवश हो जाता है।

मनुष्य के अंदर अपार संभावनाएं है, जो हर बार पुराने मापदंड तोड़ती हैं और नया इतिहास रचती हैं। किसी निश्चित पैमाने और कुछ लोगों की उम्मीदों पर खरे उतरने से कहीं अधिक ऊंची उड़ान भरने में वह सक्षम हो सकता है। कुछ लोगों के सीमित ज्ञान और समझ से लागू किए निराधार मापदंडों से खुद का मूल्यांकन करना हमारी सबसे बड़ी भूल होगी। हर इंसान की अपनी यात्रा है, अपने संघर्ष हैं और अपने मुकाम भी। फिर कैसे लंबे समय से चले आ रहे कुछ रूढ़ पैमानों पर खुद को आंकने के लिए बाध्यता होनी चाहिए? जबकि अनंत संभावनाओं का विशाल आसमान हमारे सामने है।

स्कूल के दिनों में असेंबली या फिर खेल की कक्षा के वक्त विद्यार्थियों को पंक्तिबद्ध करने के पहले कहा जाता था कि हर व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से एक हाथ की दूरी बना कर खड़ा हो, ताकि सब स्वतंत्र और सहजता से अपना काम व्यस्थित रूप से कर सकें। यही सबक हमें फिर याद करने की जरूरत है। किसी के भी जीवन में हमें और किसी को भी अपने जीवन में इतना हस्तक्षेप नहीं करने देना चाहिए कि हमारी खुशियों और निजता पर उसका विपरीत प्रभाव पड़े। हर रिश्ते और समाज में एक ऐसी सीमा रेखा का होना बहुत जरूरी समझा जाना चाहिए। ख्यात शायर राहत इंदौरी साहब का एक शेर है- ‘अफवाह थी कि मेरी तबीयत खराब है, लोगों ने पूछ-पूछ कर बीमार कर दिया’। एक दूसरे की चिंता, मदद, सलाह, देखभाल जहां हमें एक-दूसरे के करीब लाती है, वहीं उसकी अति पूरी तरह से विपरीत प्रभाव भी डाल सकती है।

कार्यक्षेत्र और परिवार के बीच भी इस सीमा रेखा की सामान्यत: अनदेखी की जाती है। आप कैसे कपड़े पहनते हैं, आप मांसाहारी हैं या शाकाहारी हैं, आप अपनी भाषा बोलते हैं या विदेशी भाषा में संवाद करना पसंद करते हैं, आपका व्यवसाय, आपकी शादी, आपके बच्चे, विचार- इन सब संदर्भों में भी मनमाने ढंग से समाज के कुछ लोग अपने बनाए रूढ़िवादी मापदंडों और पूर्वाग्रहों को थोप कर जीवन में अनचाही मुश्किलें पैदा करने का प्रयास करते रहते हैं। अगर आप उनके पैमाने पर खरे नहीं हैं तो आप अधूरे हैं। जबकि अधूरापन उनकी सोच में होता है।

दरअसल, वे लोग वस्तुस्थिति और अन्य लोगों के मन और जीवन को समझने में सक्षम नहीं होते। ऐसे लोग पुरानी रूढ़िवादी परंपराओं में जकड़े हुए होते हैं और किसी भी बदलाव से असुरक्षित महसूस करते हैं। जबकि होना यह चाहिए कि पुराने अनुभवों और नए समय की जरूरतों को देख कर निर्णय लिए जाएं, न कि लोकलाज के किसी भय से प्रभावित होकर। हमारे यहां पुरानी कहावत है- ‘निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुहाय’। पर अपना सही आलोचक चुनना और उसकी किन बातों पर ध्यान देना है, इसका भी सही चयन करना आवश्यक है। एक बार हमारे विचारों और जीवन पथ का विचलन हुआ तो समझिए कि फिर सही राह पर आगे बढ़ना कठिन हो जाएगा।

अक्सर देखा जाता है कि बेहतर विकल्पों और खुलेपन की चाह के चलते कई लोग शहर, समाज, अपने देश तक से पलायन कर जाते हैं। हर व्यक्ति ऐसे समाज में रहना चाहता है, जहां वह खुश रह सके, अपने मन का कर सके, जहां उसका विकास हो सके। वह अपने जीवन में अपने निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हो, जहां उसकी निजता का सम्मान हो। आलोचनात्मक रवैए और थोपे गए विचारों और नियमों, मापदंडों से दूर वह अपनी पूर्णता में खुल कर जी सके। आजादी का एक मतलब खुल कर, अपराधमुक्त और सम्मान भाव से, बिना किसी की आजादी में खलल डाले, थोड़ी-सी दूरी बनाए रख कर, सबको साथ लेकर आगे भी बढ़ते जाना है।

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