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दुनिया मेरे आगेः क्षणभंगुर इस जीवन में

दूसरों को देख कर ईर्ष्या करना हमारे दुख का कारण बनता है। इससे कई विकार उत्पन्न होते हैं। किसी की अच्छाई को अनदेखा करना, अतीत को बार-बार कुरेदना, हार की चोट, मादक द्रव्यों का सेवन, कटु आलोचना, अपराध प्रवृत्ति जैसे कई विकार हैं जो हमसे हमारे आनंद के क्षण को छीन लेते हैं।

Author Published on: May 22, 2020 1:59 AM
दूसरों को देख कर ईर्ष्या करना हमारे दुख का कारण बनता है। इससे कई विकार उत्पन्न होते हैं।

सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

सूचना के संदर्भ में देखें, तो दुनिया आज मुट्ठी में कैद हो गई है। परिवार के सदस्य अपनों से संवाद कम और मोबाइल पर अधिक समय बिताने लगे हैं। अब प्राथमिकताएं बदल गई हैं। मानवता की जगह सिमट रही है। छोटे परिवारों का चलन बढ़ता जा रहा है। रिश्ते-नाते भी व्यापार से लगने लगे हैं। लोग आवश्यकता पड़ने पर ही एक-दूसरे से बात करते हैं। ‘हमारा’ कहने वाले लोग अब ‘मेरा’ का बिगुल बजा रहे हैं। सभी अपने स्वार्थों की होड़ में हैं। जीवन का लेखा-जोखा देखने तक उम्र ढल जाती है। कब बूढ़े हो गए, इसका पता भी नहीं चलता। असली को छोड़, नकली के पीछे दौड़ना फैशन-सा हो गया है। यह भी ठीक से याद नहीं कि कब हम जी भर कर हंसे थे। जीवन का परमार्थ स्वार्थ में बदल चुका है। शिक्षा आनंददायी न होकर व्यापार के चौखट पर बेची जा रही है।

सवाल है कि इस रास्ते समाज और संसार का सफर कहां खत्म होगा! इसकी कल्पना भी सिहरा देती है। लेकिन अगर हम कुछ बचाना चाहते हैं तो अब भी समय है। आंखें खोलने का एक अवसर खुद को अवश्य देना चाहिए। जीवन बिताने की जगह जीने का प्रयास करते हैं। आनंद अमूल्य है। यह हाट-बाजार में नहीं बिकता, इसे अपने भीतर ढूंढ़ना पड़ता है। मोबाइल से सेल्फी लेते समय एक बनावटी हंसी दिखाई पड़ती है। लेकिन हमें बनावटी नहीं, सहज हंसी की आवश्यकता है। सुकून भरे पलों के लिए छोटी-छोटी खुशियों की पूंजी जमा करनी चाहिए। हमारे चारों ओर ऐसे कई परिवार हैं जो हर रोज पेट भरने के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं। पसीने से तर-बतर शरीर, रूखा-सूखा खाकर प्रसन्न रहने की अद्भुत कला के धनी हैं। सच है कि जीवन में धन-दौलत का महत्त्व है, लेकिन वही सब कुछ नहीं है। बहुतों के पास अकूत संपत्ति है, पर वे महंगे बिस्तर पर सो नहीं पाते, मनचाहा भोजन कर नहीं सकते। सुखी व्यक्ति परिस्थितियों के अनुसार ढला हुआ नहीं होता, बल्कि उसके जीवन जीने का दृष्टिकोण और नजरिया अलग होता है। हमें हमेशा याद रखना चाहिए कि जीवन की लंबाई नहीं, गहराई मायने रखती है।
बच्चों में असीमित आनंद, स्वच्छंदता, भोलापन कूट-कूट कर भरा होता है। जैसे-जैसे वे बड़े होते जाते हैं, उनमें संघर्ष, हार-जीत की भावना बढ़ती जाती हैं। धीरे-धीरे वे खुशियों की परिभाषा बदल कर घुटन भरी जिंदगी जीने को ही सार्थकता समझने लगते हैं। सीमित में असीमित, संघर्ष तथा आत्मसम्मान का गुण धन-दौलत से कहीं अधिक मायने रखता है। जिंदगी जीने का कोई संक्षिप्त तरीका नहीं है। इसे जीना भी एक कला है। एक छोटी-सी जिंदगी में सभी को साथ लेकर चलना पड़ता है। जीवन को सुखी बनाने के लिए सबसे बड़ा मूल मंत्र है कि हम किसी से अपेक्षा न रखें। जहां अपेक्षा की गंध होती है, वहां उपेक्षा की मक्खियां अवश्य भिनभिनाती हैं।

दूसरों को देख कर ईर्ष्या करना हमारे दुख का कारण बनता है। इससे कई विकार उत्पन्न होते हैं। किसी की अच्छाई को अनदेखा करना, अतीत को बार-बार कुरेदना, हार की चोट, मादक द्रव्यों का सेवन, कटु आलोचना, अपराध प्रवृत्ति जैसे कई विकार हैं जो हमसे हमारे आनंद के क्षण को छीन लेते हैं। सामंजस्य करने वाला व्यक्तित्व, समयानुसार भोजन करने वाला, निजी साफ-सफाई, मूल्यों से भरा जीवन, अच्छाई का स्वागत करना, चिंतन करना, स्वमूल्यांकन करना, अपने काम से प्रेम करना जैसी प्रवृत्तियां हमारे जीवन में खुशियों का अंबार खड़ा कर देती हैं। इनके साथ-साथ मानव-संबंध, आर्थिक स्थिति, सामाजिक मूल्य, संस्कृति, पंरपरा, हमारी भलाई चाहने वालों के साथ हमारा व्यवहार जैसी बातें भी जीवन को काफी हद तक प्रभावित करती हैं। जीवन में उतार-चढ़ाव, हार-जीत, गिरना-संभलना तो लगा रहता है। इन सबके बीच खुद को आत्मसंयमित रखना सबसे महान गुण है। प्रतिकूल स्थिति हो या फिर पीड़ादायी क्षण, इन सबके बीच अपने धैर्य को डगमगाने नहीं देना चाहिए। खुशी-खुशी सकारात्मकता के साथ काम करने से निराशा दूर रहती है। हमें यह बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि किसी को अपना बनाने के लिए हमारी सारी खूबियां भी कम पड़ जाती हैं, जबकि किसी को खोने के लिए एक कमी ही काफी है। हममें आत्मविश्वास होना चाहिए, अतिविश्वास नहीं। मैं कर सकता हूं, यह आत्मविश्वास है, जबकि केवल मैं ही कर सकता हूं, यह अतिविश्वास है। जिनमें आत्मविश्वास नहीं, उसका जीवन नीरस और व्यर्थ बन जाता है।

दरअसल, मानवता ही मनुष्य को श्रेष्ठ बनाती है। जो दूसरों की पीड़ा को अपनी पीड़ा समझ कर मरहम-पट्टी करता है, वही श्रेष्ठ मनुष्य कहलाता है। जीवों के प्रति दया, करुणा, सहानुभूति जरूरी है। सर्वश्रेष्ठ प्राणी होने के नाते, उसका दायित्व बनता है कि प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षण के लिए कार्य करे, विनाश के लिए नहीं। सच्चे अर्थों में मनुष्य का जीवन एक धर्म है। ऐसा धर्म, जो न तो पुस्तकों में है, न ही धार्मिक सिद्धांतों में। इसे हरेक व्यक्ति अपने भीतर ही अनुभूत कर सकता है।

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