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दुनिया मेरे आगे – साइकिल की सवारी

मैंने जब पहले-पहल साइकिल सीखी थी, तब मौके की तलाश रहती थी कि कोई बाजार से कुछ लाने को कहे। दस गज की भी दूरी रहे, मगर हम साइकिल से ही जाना पसंद करते थे।

Author December 18, 2017 4:50 AM
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

बचपन में ‘साइकिल की सवारी’ कहानी पढ़ी थी। सुदर्शन की लिखी यह कहानी काफी मनोरंजक और सरल भाषा में थी। यह उस दौर में लिखी गई थी, जब साइकिल चलाना किसी आश्चर्य से कम नहीं था। किसी को साइकिल चलाना आता था तो वह अपने आप पर गर्व करता था। गांव में किशोरों की तो पहली पसंद थी साइकिल की सवारी। स्कूल-कॉलेजों में साइकिल का जो महत्त्व उस समय था, मोटरसाइकिल का आज के दौर में भी नहीं है। मैंने जब पहले-पहल साइकिल सीखी थी, तब मौके की तलाश रहती थी कि कोई बाजार से कुछ लाने को कहे। दस गज की भी दूरी रहे, मगर हम साइकिल से ही जाना पसंद करते थे। वे बेफिक्र रहते थे र्इंधन की खपत या अन्य तरह की परेशानियों की ओर से। समय बदले, लोगों की जरूरत भी बदल गई और आज उनकी सवारी भी बदल गई है। बाजारवाद और गलाकाट प्रतियोगिता ने लोगों को इतना व्यस्त बना दिया कि बेचारी लोहे की सवारी किसी कोने में पड़ी कराहती रहती है। असीमित गति से भागने वाली सवारी के सामने साइकिल की क्या बिसात! लोगों ने कभी कल्पना नहीं की होगी कि एक दिन ऐसा भी आएगा कि जिस द्रुत गति वाले वाहनों पर हम इतरा रहे हैं, वे हमारे लिए विष का वातावरण तैयार कर रहे हैं।

शायद ही किसी ने सोचा होगा कि कभी मैदानों में खेलते, सुबह पार्कों में टहलते और बाजारों में खरीदारी करते वक्त भी हमें मास्क लगा कर रहना होगा। हम सोच नहीं पा रहे हैं कि यह विकास है या विनाश! बाजार ने कई गैरजरूरी उत्पादों को हमारी आवश्यकता बना दिया है। ध्यान देने योग्य है कि बढ़ते प्रदूषण को रोकने के लिए देश-विदेश में बड़ी-बड़ी बैठकें, सेमिनार होते हैं। लोगों में जागरूकता बढ़े, इसके लिए विज्ञापनों पर अरबों रुपए खर्च किए जाते हैं। दूसरी ओर, गाड़ियों की बिक्री भी लगातार बढ़ती जा रही है। पहले चरण में लोगों ने आंखें मूंद कर मोटरसाइकिलें खरीदीं। फिर बाजार को लगा कि आधी आबादी हमारे उत्पादों से दूर है तो महिलाओं के लिए भी दोपहिया वाहन बाजार में आ गए। पिछले कुछ वर्षों से कारों की बिक्री ने जोर पकड़ी है। चारपहिया वाहनों की बिक्री प्रति वर्ष दस से पंद्रह प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। यह समझ से परे है। क्या ऐसे में प्रदूषण पर नियंत्रण हो पाएगा?
क्या यह जरूरी नहीं है कि वैसे नवधनाढ्य लोगों को वाहन खरीदने की स्वीकृति न दी जाए जो केवल दिखावे और शान के लिए निजी गाड़ियां खरीद रहे हैं? बचपन में पढ़ा करता था कि कार एक डॉक्टर के लिए अनिवार्य है, लेकिन एक शिक्षक के लिए विलासितापूर्ण आवश्यकता। लेकिन भूमंडलीकरण और बाजारवाद ने आवश्यकता के इस अंतर को मिटा कर गड्डमड्ड कर दिया है। बाजार को यह अधिकार किसने दिया कि मुनाफा कमाने के लिए संपूर्ण मानव जाति को ही दांव पर लगा दिया जाए?

स्वच्छता अभियान के पैरोकारों को इस दिशा में भी काम करने की आवश्यकता है कि सड़कों, नालों की सफाई के साथ-साथ वातावरण को शुद्ध और स्वच्छ रखने के लिए ज्यादा से ज्यादा साइकिल जैसे पर्यावरण के अनुकूल (इको-फ्रेंडली) साधनों के इस्तेमाल पर जोर दें। मनरेगा जैसी व्यवस्था में लाख बुराई हो, लेकिन हमने देखा है कि जहां पर भी चार आने काम हुए हैं, वहां पेड़-पौधे लहलहा रहे हैं। लेकिन आज शुद्ध पानी का विज्ञापन देखते-देखते अब शुद्ध हवा खरीदने के लिए कहा जा रहा है। यह अफसोसनाक है कि आजादी के सात दशकों में हम अपने नागरिकों को शुद्ध पानी और शुद्ध हवा नहीं दे सके, लेकिन खरीदने की तरकीब बता रहे हैं।विलुप्त होती साइकिल जैसी सवारी को वातावरण में फैले जहरीले धुएं ने फिर से जिंदा कर दिया है। बिहार सरकार ने तो किशोरियों को साइकिल देने की घोषणा कर दोहरा संकेत दिया है। एक ओर बंद होने के कगार पर आ चुके इस उद्योग को संजीवनी मिल गई, तो दूसरी ओर, पर्यावरण संरक्षण के प्रति संकल्पित होने का दावा भी मजबूत कर लिया गया।

उदास, मुरझाए हुए चेहरे पर खुशी की धूप खिल जाती है, जब गांव-टोले और कस्बे में फर्राटे से बच्चियां साइकिल से निकल जाती हैं। हमारे जिले में तो कुछ लोग एक मुहिम चला कर हवा में घुले जहर से निजात पाने के लिए बाकायदा सप्ताह के एक दिन ‘साइकिल पर संडे कार्यक्रम’ के तहत साइकिल की सवारी करते हैं। ‘साइकिल की सवारी’ कहानी में लेखक ने बताया था कि उन्होंने साइकिल सीखने के क्रम में बुरी तरह जख्मी होने के कारण फिर कभी साइकिल को हाथ नहीं लगाया। लेकिन वर्तमान समय में परिस्थति बदली हुई है। प्रदूषण का बढ़ता दायरा हमारे अस्तित्व को ही समाप्त करने पर तुला हुआ है। ऐसे में कहीं ऐसा न हो कि हमारी पीढ़ी साइकिल छूने के काबिल ही नहीं रहे। इसलिए तमाम व्यस्तताओं के बावजूद साइकिल की सवारी सुरक्षित और आनंददायक है।

 

 

 

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