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दुनिया मेरे आगेः मन कबूतर

मेरी स्मृतियों में ऐसे तमाम मुसलिम चेहरे शामिल हैं, जो लक्का कबूतर पर जान छिड़कते थे, लोटन कबूतर पर लहालोट हो जाते थे। प्राय: सभी हज्जाम, रंगरेज, जुलाहे जैसे सर्वहारा परिवारों के थे, जबकि हमारे गाजीपुर में धनी शिया और पठान जमींदारों की कमी नहीं थी।

Author Published on: April 10, 2020 12:28 AM
मेरी स्मृतियों में ऐसे तमाम मुसलिम चेहरे शामिल हैं, जो लक्का कबूतर पर जान छिड़कते थे, लोटन कबूतर पर लहालोट हो जाते थे

अरुणेंद्र नाथ वर्मा

शरीर घर में तालाबंद है, लेकिन मन को खुले आकाश में पंख मारने से कौन रोक सकता है। सुबह-सुबह जब कमरे की खिड़की से कच्ची किरणों के साथ घुस कर शरारती नीला आकाश मेरी सीमाबद्धता का उपहास उड़ाता है, तो बदला लेने के लिए उसे पलकों में बंद कर लेता हूं। तब अचानक मन में तालाबंद नीले आकाश में श्वेत, श्याम, भूरे कबूतर पर मारने लगते हैं। ‘दिल्ली-6’ में सोनम कपूर के सिर पर बैठ कर संतुलन और नृत्य का अद्भुत नजारा दिखाती मसक्कली-मटक्कली याद आती है। आकाश के विस्तार से उन्हें वापस अपने घर लौटते देख रस्किन बॉण्ड की कथा ‘ए फ्लाईट ऑफ पिजन्स’ पर आधारित ‘जुनून’ फिल्म में गुलाम भारत ने उम्मीद की थी कि उन्हीं की तरह फिरंगी भी एक दिन अपने देश लौट जाएंगे। वहां वे घरवापसी के प्रतीक थे, तो मासूमियत के प्रतीक थे उस कथा में, जिसमें नूरजहां के हाथों से छूट कर शहजादे जहांगीर की प्यारी कबूतरी उड़ गई थी और जहांगीर के प्रश्न ‘कैसे?’ के जवाब में नूरजहां ने दूसरे कबूतर को उड़ा कर कहा था ‘ऐसे’। लखनऊ के नवाब आसफुद्दौला, गाजीउद्दीन हैदर और नसीरुद्दीन हैदर भी कबूतरों पर जान छिड़कते थे। अपने देश में शायद लखनऊ, भोपाल, रामपुर, हैदराबाद जैसी पुरानी मुसलिम रियासतों वाले शहरों में ही कुछ लोग बचे हैं, जिन्हें आज भी कबूतरबाजी का शौक है। शतरंज का खेल, अफीम की गोली, खुशबूदार खमीरे वाली तंबाकू, हुक्के की पेंचदार निगाली, हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत और नवाब वाजिद अली शाह का प्रिय कथक नृत्य, ये सारे शौक जब नवाबी महलों से निकल कर अवाम के मनोरंजन के स्रोत बन कर फैले तो गंगा-जमुनी संस्कृति की पहचान बन कर हिंदू परिवारों में भी आए। लेकिन आम हिंदू परिवारों का कबूतर प्रेम सार्वजनिक स्थानों पर उन्हें दाना डालने तक ही सीमित रहा।

मेरी स्मृतियों में ऐसे तमाम मुसलिम चेहरे शामिल हैं, जो लक्का कबूतर पर जान छिड़कते थे, लोटन कबूतर पर लहालोट हो जाते थे। प्राय: सभी हज्जाम, रंगरेज, जुलाहे जैसे सर्वहारा परिवारों के थे, जबकि हमारे गाजीपुर में धनी शिया और पठान जमींदारों की कमी नहीं थी। खासा महंगा होने के बावजूद कबूतरबाजी का शौक समाज के हाशिये पर रहने वालों को अधिक था। उनके घरों की छतें भले नीची हों, लेकिन उनके नन्हे आंगन से आकाश में पलीता बांधने की कोशिश करती बांस की लग्गियां निकली रहती थीं। लग्गियों के सिरे पर बांस के फट्टों से बने आयताकार छत्ते उनके दिलों में जान से प्यारे कबूतरों के लिए आरक्षित जगह जितने बड़े होते थे। कबूतरों के दड़बे आंगन में इतनी ऊंचाई पर होते थे कि रात के अंधेरे में वार करने वाली बिल्ली और चारे के खर्चों से रात-दिन आजिज रहने वाली बेगम की पहुंच के बाहर रहे।

कल्लन मियां का बांबे हेयर कटिंग सैलून घर में आकर हजामत करने वाले ‘सीताराम नाऊ’ की अपेक्षा महंगा था, लेकिन कबूतरबाजी का उनका विलक्षण प्रेम मुझे उनकी सैलून तक खींच लाता था। कबूतरों के बारे में उनके लच्छेदार अफसाने अलिफलैला को मात करते। जान से प्यारे अपने कबूतरों की ऊंची उड़ानों के बारे में उनसे भी ऊंची डींग मारने में माहिर थे। लक्का और लोटन किस्म की उनकी दो प्रिय कबूतरियों के नाम थे निम्मी और नर्गिस। उनकी जिंदगी का सबसे खुशनुमा क्षण वह था, जब उन्होंने कबूतरों को दिन-रात कोसने वाली अपनी बेगम को एक दिन चुपके से अपनी चहेती कबूतरी नर्गिस को हथेली में लेकर चूमते हुए पकड़ा था।

कल्लन इतने प्यार से निम्मी और नर्गिस की बातें करते कि मेरे किशोर मन को कुछ अजीब-सा होने लगता। आसमान में गोल बांध कर उड़ने में उनके कबूतरों का जिले में कोई सानी न था। उड़ानों की ऊंचाई और अवधि पर लगाई गई बाजियों में वह हमेशा जीतने का ही दावा करते, लेकिन जब एकाध चश्मदीद गवाहों की मौजूदगी के कारण मानना पड़ता कि इस बार उनके लाड़ले बाजी हार गए थे, तो वे महंगाई को कोसते। पूछते कि मक्की और बाजरे के चारे से और क्या उम्मीद की जा सकती थी। खुद भूखे रह कर भी उन्हें बादाम-पिस्ता खिला सकते, तो बात कुछ और होती। फिर वे हेयरकट का इंतजार करते श्रोताओं के ऊपर हिकारत की नजर फेंकते, जो सहम कर निर्धारित रेट से ऊपर एकाध चवन्नी उन्हें पकड़ा देते।
कल्लन मियां जिस ग्राहक की दरियादिली से खुश होते उसे जुम्मे की नमाज के बाद, जब सैलून बंद रहता, घर बुला कर अपने कबूतरों के करतब देखने की दावत भी देते। कई बार जेबखर्च की चवन्नियां उन कबूतरों के नाम करके मैंने भी उन्हें कल्लन मियां की ‘ओह ओह’ की टेर पर आकाश की ऊंचाइयों में बीसों मिनट तक गोल-गोल उड़ानें भरते देखने का लुत्फ उठाया था। अब न कल्लन मियां हैं, न आज के मेरे महानगर में ऐसे लोग, जो कबूतरबाजी का अर्थ भी समझ सकें। मन के आकाश में कल्लन मियां के कबूतरों को उड़ानें भरते देखने की और दिवास्वप्न में खो जाने की फुर्सत भी।

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