ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगे: इस अनुशासन पर्व में

बंदी की स्थितियों में एक महत्त्वपूर्ण विषय पर सुकून मिला कि आपराधिक घटनाएं नहीं के बराबर हैं। इसका मतलब है कि आदमी घर से बाहर नहीं निकल रहा, तो अपराध भी नहीं करता। यानी रोज होने वाले अपराध, चाहे वे किसी भी प्रकृति के क्यों नहीं हों, उनमें बढ़ोतरी अहं के कारण होती है।

लॉकडाउन के दौरान वीरान पड़ी मुंबई की एक सड़क। (एक्सप्रेस फोटो)

सड़कों पर सन्नाटा पसरा है, पेट्रोल पंपों पर लंबी तो क्या, सामान्य लाइनें भी नहीं हैं। एटीएम रुपयों से भरे पड़े हैं, बैंकों में भीड़ नहीं लग रही। थानों में आपराधिक मामले दर्ज नहीं हो रहे हैं, लूट-खसोट, चोरी-बदमाशी, हत्याएं, यौन शोषण, बलात्कार जैसी घटनाएं बंदी के दौरान देखने-सुनने को नहीं मिल रहीं। इन सबके अलावा एक बात बार-बार सोचने को मजबूर करती है, जो कि व्यक्ति के अधिकार क्षेत्र में नहीं है, व्यक्ति की मृत्यु। बंदी के समय सामान्य स्थिति में होने वाली मृत्यु के आंकड़े जैसे इन दिनों ठहर गए हैं। ऐसा नहीं कि मृत्यु होनी बंद हो गई, पर मृत्यु के आकड़ों में कमी जरूर आई है। यह बंदी का ही परिणाम है कि लोग अपनी गंभीर बीमारी से लड़ने में पहले से और अधिक सक्षम हुए हैं। बंदी ने मनुष्यों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने का प्रयास किया है।

सड़क पर भीड़ नहीं है और भीड़ द्वारा होने वाली आपराधिक गतिविधियां, छिटपुट घटनाएं शून्य हैं। विद्वान सदैव कहते हैं कि भीड़ विवेकहीन हुआ करती है। आदमी खुद के नियंत्रण में रहने का उत्तम निर्णय चाहे किसी बीमारी के भय से करे, या पुलिस के डंडे के डर से, एकांतवास में जरूर है, घर की चारदीवारी में परिवार के लोगों के साथ आनंद का अनुभव कर रहा है। व्यक्ति की जरूरी आवश्यकताओं की पूर्ति तो जैसे-तैसे हो रही है, फिजूलखर्ची भी रुक गई है। व्यक्ति की आय में बढ़ोतरी नहीं हो रही है, पर अनावश्यक व्यय भी नहीं है।

कोरोना का कहर पसरा है, पर बंदी जैसे फैसले के कारण समय रहते अन्य देशों की तुलना में कोरोना भारत में बहुत अधिक लोगों को अपनी गिरफ्त में नहीं ले सका, क्योंकि लोग खुद की गिरफ्त में हैं। देश के छोटे-बड़े माननीय न्यायालय भी बंद हैं, क्योंकि अपराध न होने के कारण वहां जाने वाले भी अपने-अपने घरों में हैं। भारतीय परिप्रेक्ष्य में बात करें, तो इस समय यह स्पष्ट हो गया है कि व्यक्ति खुद की इंद्रियों को नियंत्रित कर सकता है।

सवाल है कि आदमी जिन छोटी-छोटी बीमारियों को घरेलू इलाज से काबू कर सकता है, उसके लिए लोग अस्पताल क्यों जाते हैं। फिर सामान्य दिनों में अस्पतालों में बढ़ रही भीड़ पर सरकारों और खुद लोगों को बंदी के बाद विचार करना होगा। बीमार, बिना अस्पताल गए जो उपाय इस समय कर रहे हैं उन उपायों को मजबूरी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि जो बीमारी जिन उपायों से एक माह के लगभग रोकी जा सकती है, उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उनसे डॉक्टरों के घरों पर लगने वाली लंबी लाइनों को रोका जा सकता है। अगर घर बैठे इलाज कर सकने की ताकत रखते हैं, तो ऐसी ताकत को पहचानने की जरूरत है।

बंदी की स्थितियों में एक महत्त्वपूर्ण विषय पर सुकून मिला कि आपराधिक घटनाएं नहीं के बराबर हैं। इसका मतलब है कि आदमी घर से बाहर नहीं निकल रहा, तो अपराध भी नहीं करता। यानी रोज होने वाले अपराध, चाहे वे किसी भी प्रकृति के क्यों नहीं हों, उनमें बढ़ोतरी अहं के कारण होती है। पुलिस और न्यायालयों में भीड़ बढ़ती है, जिसमें जन-धन की बर्बादी होती है, साथ ही उस एक व्यक्ति के कारण पूरे परिवार को मानसिक परेशानी झेलनी पड़ती है। जेलों में भीड़ बढ़ती है।

आए दिन महिलाओं के साथ होने वाले अत्याचार भी रुके हैं, चोरियां नहीं हो रहीं, बदमाश घरों में थमे हुए हैं। इन सबको रोकने के लिए हमारी पुलिस उल्लेखनीय काम कर रही है। देश-प्रदेश में पहले से कार्यरत पुलिस बंदी की पालना लगभग अक्षरश: करवा सकती है, तो फिर घरों में लोगों को अपराध करने से भी रोकने में सक्षम है।
सवाल है कि क्या लोकतंत्र में नागरिक और सरकार दोनों अलग-अलग पक्ष से हैं? बंदी के उद्देश्य पर ही सवाल खड़े किए जा रहे हैं, जबकि वर्तमान चुनौती अकेले हमारे देश के लिए नहीं है, इस संकट से बाहर निकलने का बंदी ही एकमात्र विकल्प है। यह समय देश को जातियों में विभाजित करने का नहीं है, मनुष्यता को बचाने का संकल्प है।

हमारे यहां धरती पर डॉक्टर को भगवान का दर्जा दिया गया है और भीड़ को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी पुलिस की है। अनेक स्थानों पर स्वास्थ्य कर्मियों और पुलिस पर पत्थरों से हमला करने का निंदनीय कृत्य होना महामारी से लड़ने के प्रयासों को कमजोर करना है।

बंदी ने हमें व्यक्तिगत अनुशासन दिया है, चुनौती से संघर्ष करने का अनुभव हुआ है। बंदी के माध्यम से सार्वजनिक अनुशासन सीखना होगा। बंदी के बाद देश के प्रदूषण में भारी गिरावट आई है। ध्यान रखना होगा कि फिर से वातावरण प्रदूषित न हो सके। बंदी के अनुभवों से नई जागरूकता और जीवन-शैली में परिवर्तन होना ही व्यावहारिक जीवन का आधार है। इसके उजले पक्ष को नकारा नहीं जा सकता।

Next Stories
1 दुनिया मेरे आगे: सहजीवन की दस्तक
2 दुनिया मेरे आगे: संस्कृति की जड़ें
3 दुनिया मेरे आगेः कुछ भी स्थायी नहीं
ये पढ़ा क्या?
X