ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगे- गुणवत्ता का पाठ

शिक्षकों और खासकर सरकारी स्कूल के शिक्षकों के प्रति समाज से लेकर सरकार तक के बीच एक हेय नजरिया कायम है।

Author January 29, 2018 06:13 am
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है। (Express Photo)

कालू राम शर्मा

शिक्षकों और खासकर सरकारी स्कूल के शिक्षकों के प्रति समाज से लेकर सरकार तक के बीच एक हेय नजरिया कायम है। शिक्षा के तंत्र को संचालित करने वाले प्रशासनिक तंत्र में बैठे अधिकारियों की सोच भी यही है कि शिक्षक पढ़ाते नहीं है। अधिकारी स्कूलों में शक भरे अंदाज में जाते हैं और हर हाल में वे स्कूल, शिक्षक और वहां पढ़ने वाले बच्चों में मीन-मेख निकाल कर ही आते हैं। असल में व्यापक तौर पर शिक्षकों की नियति कुछ ऐसी बना दी गई है कि उन्हें लगता है वाकई वे नालायक हैं या सबसे हीन कर्मचारी हैं। ऊपर से शिक्षकों से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को स्थापित करने की अपेक्षाएं की जाती हैं। सवाल है कि हमारे यहां की स्कूली शिक्षा काबिल छात्र क्यों नहीं बना पा रही है! एक अहम बात यह है कि हम अगर शिक्षकों को तैयार करने की प्रक्रिया को ठीक से समझ लें तो यह काम आसान हो जाएगा। शिक्षक वैसे ही बनाए जाने चाहिए जो विद्यार्थियों को ठीक से तैयार करने में कामयाब हों। हर कोई चाहता है कि स्कूलों में शिक्षक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा बच्चों को उपलब्ध कराएं। लेकिन शिक्षकों को शिक्षा के व्यापक मकसद को अर्जित करने के लिए जब तैयार ही नहीं किया गया तो वे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का बीजारोपण कैसे कर सकेंगे। शिक्षक बनने के लिए पूर्व सेवाकालीन शिक्षक-प्रशिक्षण का ढांचा चरमराया हुआ है। नई शिक्षा नीति के तहत ‘डायट’ जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान को जिले में ‘लाइट हाउस’ के रूप में देखा गया, क्योंकि प्राथमिक कक्षाओं में शिक्षण के लिए शिक्षकों को तैयार करने का जिम्मा प्रमुख रूप से ‘डायट’ के पास है।

शिक्षकों को प्रशिक्षण के जरिए जैसा तैयार किया जाएगा वैसा ही कमोबेश वे अपने स्कूलों में प्रदर्शन करेंगे। और स्कूलों के हालात हमारे सामने हैं। बच्चे स्कूलों में आ रहे हैं, लेकिन अपेक्षित शिक्षण नहीं हो पा रहा है। सदियों पुरानी रटंत प्रणाली के दर्शन हमें स्कूलों में होते हैं। इसकी वजह यह है कि इन प्रशिक्षण संस्थानों में रटंत प्रणाली को खत्म करने का जज्बा पैदा नहीं हो पाया। स्कूलों से अपेक्षाएं महज डिग्री प्रदान करने भर की नहीं है। सिर्फ डिग्री प्रदान करने का अर्थ है कि चाहे शिक्षा हो या न हो, बस परीक्षा ले लो और उन्हें डिग्री दे दो। भारत में अमूमन हर राज्य के मंत्री से लेकर अधिकारी तक परीक्षा के पीछे ही पड़े हुए हैं। दूसरी ओर, स्कूलों में प्रयोगशालाएं और पुस्तकालय दम तोड़ रहे हैं, शिक्षकों की भारी कमी है। फिर भी परीक्षाएं होनी चाहिए।

अगर नदी सूखी है या उसमें तैरना सिखाने के लिए पर्याप्त पानी नहीं है तो कोई व्यक्ति कैसे तैरना सीखेगा? शिक्षा जगत में तो सीखना चाहे न हो, लेकिन परीक्षा जरूर होती रहती है। किसी भी तरह से विद्यार्थी परीक्षाओं में बेहतर अंक प्राप्त करें और वे मेरिट में आएं। इसके लिए चाहे कोई भी हथकंडा अपनाना पड़े। जोहन होल्ट ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘बच्चे असफल कैसे होते हैं’ में यही कहा है। जब तक शिक्षा को परीक्षा से मुक्त नहीं किया जाएगा, तब तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की बात बेमानी ही होगी। बहरहाल, शिक्षकोें की पेशेवर तैयारी का मामला परीक्षाओं के चक्कर में नजरअंदाज कर दिया जाता रहा है। शिक्षक प्रशिक्षण भी परीक्षा के इर्द-गिर्द ही अपनी व्यूहरचना बनाते दिखते हैं। इसकी वजह यह है कि उन ‘डायट’ के शिक्षक-प्रशिक्षकों को भी इसी तरह से तैयार किया गया है।
दरअसल, अभी जो शिक्षा दी जा रही है वह संवैधानिक मूल्यों को पोषित करने के मकसद को पूरा नहीं करती। वह केवल डिग्री देने वाली है। सर्वशिक्षा अभियान के प्रारंभिक दस्तावेजों में यह स्वीकार किया गया था कि जिस तेजी से स्कूलों की संख्या और उनमें नामांकन बढ़ा है, उसे ध्यान में रखते हुए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए शिक्षकों को तैयार किया जाना होगा। अध्यापक शिक्षा के लिए पाठ्यचर्या की रूपरेखा में साफ तौर पर कहा गया है कि हमें ऐसे शिक्षक तैयार करने होंगे जो बच्चों का खयाल रख सकें और जीवन में आने वाली दुविधा से मुकाबला कर सकें। दस्तावेज यह भी कहता है कि संविधान में निहित मूल्यों का अनुपालन हो।

शिक्षा जगत में बैठे नीतिकारों को यह सोचना चाहिए कि शिक्षकों की पेशेवर तैयारी के लिए आगे आएं, शिक्षकों पर भरोसा जताएं। उन्हें यह अहसास कराएं कि वे बेहतर कर सकते हैं। जो शिक्षक अपने दम पर बेहतर कर रहे हैं उन्हें मिसाल के तौर पर पेश करें, ताकि उन मिसालों से सबक लेकर अन्य शिक्षक भी आगे आएं और सकारात्मक हवा बहे। प्रशिक्षण संस्थानों में नीरसता का आलम है। पुस्तकालय और प्रयोगशालाएं दम तोड़ रही हैं। वहां शिक्षकों और प्रशिक्षकों के बीच शैक्षिक संवाद की गुंजाइशों को बढ़ाने की जरूरत है। शिक्षकों पर आरोप लगाने के पहले हमारे शिक्षा जगत को अपने प्रशिक्षण संस्थानों पर ध्यान देना चाहिए। इन संस्थानों को वैसा बनाया जाए जैसा स्कूलों से अपेक्षा की जाती है, ताकि इन संस्थानों में संवैधानिक मूल्यों को महसूस किया जा सके।

 

 

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App