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दुनिया मेरे आगेः पहचान की भूख

भारतीय समाज एक जटिल और बहुआयामी समाज है। समाज में हर दिन कुछ न कुछ नई चीजें देखने और सुनने को मिल ही जाती हैं। आए दिन अपने को पहचान दिलाने के लिए लोग कुछ न कुछ नया कर बैठते हैं। हाल ही में बिहार और झारखंड, बल्कि यों कहें कि हिंदी पट्टी में लोगों कि गाड़ी पर लगे नंबर प्लेट के ऊपर अपनी पहचान का एक बोर्ड लगा दिखाई पड़ा।

Author Published on: February 29, 2020 12:02 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

अमित चमड़िया

कई दशक पहले यशपाल ने ‘अखबार में नाम’ एक कहानी लिखी थी। इस कहानी के माध्यम से यशपाल यह बताते हैं कि कैसे लोगों में अपनी नाम और पहचान को सार्वजनिक करने की भूख है। इसे समझने के लिए कहानी की कुछ पंक्तियों पर दोबारा नजर डाली जा सकती है- ‘अगले दिन अखबार में छपा, मोटर दुर्घटना में आहत गुरदास को अदालत ने हर्जाना दिलाने से इनकार कर दिया। आहत के बयान से साबित हुआ कि अखबार में नाम छपाने के लिए ही वह जान-बूझ कर मोटर के सामने आ गया था। …गुरदास ने अखबार से अपना मुंह ढांप लिया। किसी को अपना मुंह कैसे दिखाता!’ दरअसल, इस कहानी की सार्थकता आज उस समय से ज्यादा दिख रही है। वर्तमान में मीडिया में किसी भी तरह से अपनी उपस्थिती दर्ज कराने की भूख लोगों मे ज्यादा बढ़ी है और अपनी गलती पर कोई भी गुरदास की तरह अपना मुंह भी नहीं ढांपता है। तकनीक के स्तर पर एक अंतर आया है। अब वर्तमान समय मे मीडिया के कई और रूप हो गए हैं जो इनकी ‘भूख’ को और हवा दे रहे हैं।

भारतीय समाज एक जटिल और बहुआयामी समाज है। समाज में हर दिन कुछ न कुछ नई चीजें देखने और सुनने को मिल ही जाती हैं। आए दिन अपने को पहचान दिलाने के लिए लोग कुछ न कुछ नया कर बैठते हैं। हाल ही में बिहार और झारखंड, बल्कि यों कहें कि हिंदी पट्टी में लोगों कि गाड़ी पर लगे नंबर प्लेट के ऊपर अपनी पहचान का एक बोर्ड लगा दिखाई पड़ा। उस बोर्ड पर लिखा था- ‘उत्तराधिकारी स्वतंत्रता सेनानी’। पहले स्वतंत्रता सेनानी बताना गर्व की बात होती थी। अब लोग ‘स्वतंत्रता सेनानी के उत्तराधिकारी’ के पहचान को महिमामंडित करने मे गर्व महसूस कर रहे हैं। यह कुछ अलग तरह की पहचान है जो एक प्रवृत्ति को बता रही है। जिनके पास अपने काम बताने के कुछ भी नहीं है, वे अब इस तरह के पहचान के साथ सड़कों पर दिखाई देने लगे हैं। शायद लोग इस तरह की पहचान के साथ जीने के इतने आदि हो चुके हैं कि बिना इसके उन्हें जीवन सहज नहीं लगता है।

पिछले महीने सरस्वती पूजा का समारोह संपन्न हुआ। यह पूजा देश के कई हिस्सों में आयोजित की जाती है। इसमें बच्चों और युवाओं की भागीदारी ज्यादा नजर आती है। इस बार बिहार के सासाराम शहर में एक जगह आयोजित पूजा में एक नई बात दिखाई पड़ी। पंद्रह और सोलह साल के बच्चों के भीतर अपनी पहचान को लेकर कितनी ज्यादा ‘तड़प’ है, इसका नमूना इस पूजा में देखने को मिला। लगभग सभी बच्चों के हर समूह अपने-अपने आयोजन स्थल पर एक फ्लेक्सी बोर्ड टांगे हुए थे, जिस पर उस आयोजक समूह के मुख्य लोगों की तस्वीर थी।

शायद अब बच्चे भी अपनी पहचान को सार्वजनिक करने और लोगों के दिमाग में बिठाने के मौके हाथ से नहीं निकलने देना चाहते हैं। यह हो सकता है कि अन्य शहरों में भी इस तरह तस्वीर वाले फ्लेक्सी बोर्ड सरस्वती पूजा के आयोजन स्थल पर लगे हों। सार्वजनिक स्थल पर विज्ञापन के लिए लगे बोर्ड पर अपने-अपने विज्ञापन लगाने के लिए स्थानीय निकाय- नगर निगम या नगर परिषद- अच्छा-खासा किराया वसूल करती है। अब इस बोर्ड पर किसी कंपनी के उत्पाद के विज्ञापन कम नजर आते हैं। बल्कि लोगों के अपने निजी पहचान बताने वाली प्रचार सामग्री ज्यादा नजर आती है।

लगभग हर धार्मिक उत्सव के बहाने लोग कुछ न कुछ बोल कर अपने पहचान, नाम और जाति को सार्वजनिक करने की होड़ में रहते हैं। अब हर छोटे-बड़े शहरों मे लगे होडिंंगों पर नजर डालने पर यह स्पष्ट हो जाएगा कि अब बच्चों में भी चाहे वह छोटे शहर के क्यों न हों, नए-नए प्रतीकों का इस्तेमाल करने लगे हैं। मसलन ‘महाकाल’ जैसे शब्द अपनी एक अलग आकृति के साथ एक ‘ब्रांड’ का रूप में समाज में दिखाई देते रहे हैं। अब तक इसका उपयोग केवल ज्यादा उम्र के लोग ही अपनी गाड़ी पर करते थे, लेकिन अब बच्चे भी अपनी-अपनी साइकिल पर इस आकृति वाले स्टीकर का उपयोग करने लगे हैं।

बाजार ने भी इनकी मांग को पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। ‘पहचान’ अब बड़ा सवाल है। लोग इसे पूरा करने के लिए नए-नए जुगाड़ ढूंढ़ रहे हैं। सोशल मीडिया ने पहचान की भूख को और ज्यादा बढ़ाया है। इसीलिए सोशल मीडिया लोगों की निजी जिंदगी में भी दखलंदाजी बढ़ाने लगी है। सवाल है कि पहचान की इस भूख का स्रोत क्या है? क्या यह किसी अभाव और खालीपन से उपजी हुई स्थिति की भरपाई की कोशिश है? या फिर यह सिर्फ चलन का असर है, जिसमें एक भीड़ की तरह लोग शामिल हो जाते हैं? अपनी उपस्थिति को दर्ज कराने के लिए अतिरिक्त कोशिश करने की यह कवायद किसी भी व्यक्ति या समूह के भीतर कैसी मानसिक तुष्टि देती होगी? ये विचार के सवाल हैं और हो सकता है कि आने वाले दिनों में इसकी कोई स्पष्ट तस्वीर सामने आए। लेकिन मेरे विचार से फिलहाल इसकी कोई दिशा नहीं दिखाई देती है।

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