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दुनिया मेरे आगे – ताकतवर ज्ञान

हम इनकी असफलता को स्वाभाविक घटना मानते हैं जिसमें शिक्षा व्यवस्था की कोई भूमिका नहीं है। यह व्याख्या संसाधन की उपलब्धता और सीखने के अवसरों की सुलभता पर आधारित है।
Author October 2, 2017 06:23 am
प्रतीकात्मक चित्र।

ऋषभ कुमार 

शिक्षा के प्रसार और प्रभाव का आकलन अक्सर आंकड़ों के आधार पर किया जाता है। ये आंकड़े समय के सापेक्ष नामांकन की दर, सामाजिक पृष्ठभूमि, जाति और लिंग के आधार पर तय होते हैं। इन पैमानों पर भारत में औपचारिक शिक्षा के प्रसार की दशा और दिशा सराहनीय बताई जाती है। लेकिन कई बार ‘ड्राप आउट’ के आंकड़े सारे किए-धरे पर पानी फेर देते हैं। उपलब्धियों की आंकड़ेबाजी जब पेश की जाती है तो उसमें विद्यार्थियों के शैक्षिक अनुभवों के बारे में कुछ नहीं बताया जाता।

हाल में एक साक्षात्कार के दौरान अनेक स्नातक विद्यार्थियों के शैक्षिक अनुभवों को जानने का मौका मिला। इनके अनुभव भारतीय शिक्षा व्यवस्था की अनकही कहानी कहते हैं। इन विद्यार्थियों में से अधिकतर की विद्यालयी और उच्च शिक्षा महानगरों के सरकारी संस्थानों में हुई थी। ये कलावर्ग के विद्यार्थी थे। इनकी स्नातक शिक्षा ‘दूर शिक्षा’ और ‘मुक्त शिक्षा’ के माध्यम से हुई थी। इस दौरान जब इनके हमउम्र दूसरे विद्यार्थी कैंपस, कैंटीन और फ्रेशर्स में लीन थे तब ये अपने परिवार की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने में व्यस्त थे। पहली नजर में इसकी व्याख्या इस तरह की जा सकती है कि परिवार की जिम्मेदारियों के चलते इनकी औपचारिक शिक्षा दोयम स्थान पर चली गई। कमाई करना इनका पहली जरूरत थी। इसके बावजूद ये शिक्षा के मूल्य को समझते हैं। इसलिए किसी भी सूरत में पढ़ाई जारी रखना चाहते थे।

हम इनकी असफलता को स्वाभाविक घटना मानते हैं जिसमें शिक्षा व्यवस्था की कोई भूमिका नहीं है। यह व्याख्या संसाधन की उपलब्धता और सीखने के अवसरों की सुलभता पर आधारित है। इन विद्यार्थियों के संदर्भ में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि वे महाविद्यालयों में प्रवेश के लिए अपनी पात्रता नहीं सिद्ध कर पाए। इस तरह से वे ज्ञानार्जन के अगले सोपान पर नहीं जा सके। यह तर्क दिया जा सकता है कि उन्होंने शिक्षा के लिए अपने संघर्ष को वैकल्पिक माध्यमों से जारी रखा। लेकिन माइकल यंग जैसे समाज वैज्ञानिक इसकी एक भिन्न व्याख्या प्रस्तुत करते हैं। उनके अनुसार, औपचारिक शिक्षा की विषयाधारित सीखने-सिखाने की संस्कृति, जो एक व्यवस्थित संरचना के अनुरूप संस्थागत ढांचे में संचालित होती है, वह अपने भागीदारों को एक खास प्रकार का ज्ञान प्रदान करती है। इसे वे ‘ताकतवर ज्ञान’ की संज्ञा देते हैं।

ताकतवर ज्ञान की अवधारणा को एक उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है। इन विद्यार्थियों से साक्षात्कार में जो सवाल पूछे जा रहे थे उनमें से अधिकांश विषयधारित, संदर्भ-निरपेक्ष, अमूर्त और सैद्धांतिक ज्ञान पर आधारित थे। इस तरह के सवाल ज्ञान की सत्ता और जानने वाले को ज्ञान के अधिकारी की भूमिका में प्रस्तुत करते हैं। इन सवालों का ‘सही जवाब’ जवाब देने वाले को ताकतवर ज्ञान का ‘धारक’ होने की पात्रता प्रदान करता है और ‘गलत उत्तर’ ज्ञानहीन बनाता है। यही ताकतवर ज्ञान, विचार और कर्म के माध्यम से व्यक्ति को सशक्त करता है क्योंकि इसके माध्यम से विद्यार्थी को नई आर्थिक और सामाजिक भूमिकाएं निभाने का पात्र समझा जाता है। जो विद्यार्थी इस मुख्यधारा में शामिल नहीं हो पाते हैं वे ताकतवर ज्ञान और इसके फलों से वंचित हो जाते हैं। इन विद्यार्थियों के साथ भी यही हुआ। एक बार व्यवस्था से बाहर होने के बाद व्यवस्था इन्हें लगातार हाशिए पर ढकेल रही थी।

इनमें से अधिकतर विद्यार्थी परास्नातक स्तर पर फिर किसी प्रतिष्ठित संस्थान में प्रवेश पाने में विफल रहे। इस बार मुक्त-शिक्षा या दूर-शिक्षा के माध्यम को न चुन कर इन विद्यार्थियों ने रोजगारपरक शिक्षा का रास्ता चुना। इस स्थिति में इन्होंने शिक्षक बनने की ठानी। इनका वर्तमान रोजगार कौशल-आधारित था, जैसे कंप्यूटर टाइपिंग, ड्राइविंग और डिलवरी मैन वगैरह। इस तरह के रोजगारों में वे नहीं बने रहना चाहते। कारण कि इन्हें सम्मानित नहीं समझा जाता। इसलिए ये कुशलता आधारित रोजगार से ज्ञान आधारित रोजगार की ओर बढ़ना चाहते हैं।

यह भी उल्लेखनीय है कि ये विद्यार्थी महानगरों के रहने वाले थे। महानगरों में कुछ ही अच्छे सरकारी संस्थान होते हैं। इनमें सीटें सीमित होती हैं और असंख्य आवेदन आते हैं। जब कोई गरीब, दलित, मुसलिम या महिला सर्वोच्च स्थान प्राप्त करती है तो इन अपवादों का महिमामंडन किया जाता है। इन अपवादों को छोड़ दें तो इस तरह के असंख्य विद्यार्थियों के हाथ असफलता लगती है। इस स्थिति में इन्हें महानगरों के बाहर ऐसे संस्थानों का रुख करना पड़ता है जहां प्रवेश प्रक्रिया में मारामारी न हो। कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो ये श्रेष्ठ संस्थान कमजोर सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से आने वाले विद्यार्थियों की पात्रता को खारिज कर देते हैं। बदले में उनके पास जो रास्ता बचता है, वह उन्हें ताकतवर ज्ञान के बजाय कमजोर ज्ञान की ओर ले जाता है। कई बार ऐसी चीजों को भाग्य से जोड़ा जाता है, जबकि यह पूरा मामला ही राजनीतिक व्यवस्था से जुड़ा है। यह सरकारों की जिम्मेदारी है कि वे सभी के लिए प्रवेश और स्तरीय संस्थाओं की व्यवस्था करें। एक नकारात्मक और गैरजरूरी होड़ पैदा करके कुछ को काबिल और कुछ को नाकाबिल सिद्ध करने की नीति खत्म होनी चाहिए।

 

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