दुनिया मेरे आगे- छीजते अहसास

बढ़े खर्च पर वे कहते थे कि बाप की नहीं, जब खुद की कमाई से खर्चोगे तब समझ में आएगा कि पैसे कित्ती मेहनत से कमाए जाते हैं। यह सच आज पता चल रहा है।

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प्रतीकात्मक चित्र।

पिछले दिनों की ही बात है। थोड़ी देर पहले पत्नी और बिटिया के मोबाइल का बिल अपने एटीएम कार्ड से करीब हजार रुपए अदा किया, लेकिन हजार रुपए खर्च करने का रत्ती भर एहसास नहीं हुआ। न तो हाथों में रुपया था और न ही हाथ उठा कर रुपया दिया। हवा में भुगतान कर दिया। तब भला पैसों का अहसास कैसे होता? शायद यही सच है कि बचपन से सुनता चला आ रहा था कि पैसा हाथ का मैल होता है। तब से अब तक इसका अर्थ समझने की कोशिश करता रह गया, लेकिन अर्थ नहीं समझ पाया। शायद हाथों में पैसों से ज्यादा मैल था तो पैसों का अर्थ कैसे समझ आता? अब जब ई-मनी का दौर चल पड़ा है तो समझ में आया कि पैसा हाथों का मैल कैसे होता था। हम बचपन में दो रुपए भी अधिक खर्च कर देते या कोई महंगा सामान खरीदने की जिद करते तो पिता की डांट का डंडा हमेशा तैयार रहता था। बढ़े खर्च पर वे कहते थे कि बाप की नहीं, जब खुद की कमाई से खर्चोगे तब समझ में आएगा कि पैसे कित्ती मेहनत से कमाए जाते हैं। यह सच आज पता चल रहा है।

लेकिन कमाई हो रही है, अहसास गुम होते जा रहे हैं। मुझे याद आता है कि एक समय वह भी था जब मैं अखबार की नौकरी में मुझे पहली दफा एक सौ अस्सी रुपए की तनख्वाह मिली थी। बात साल सन उन्नीस सौ तिरासी-चौरासी की है। इसके बाद बढ़ते-बढ़ते तनख्वाह हजार में पहुंच गई। इधर अनुभव बढ़ रहा था, तनख्वाह बढ़ रही थी और उधर अहसास गुम हो रहे थे। नगदी का चलन खत्म होने लगा था। चेक से भुगतान मिलने लगा। कुछ आधे-अधूरे अहसास बाकी रह गए थे। लेकिन आज के समय में रुपए पाने और देने का एहसास पूरी तरह गुम हो चुका है। हवा में पैसे आते हैं और हवा में ही खर्च हो जाते हैं। सुविधा की दृष्टि से इसे आप बेहतर कह सकते हैं। लेकिन इस सिस्टम ने खर्च को बेतहाशा बढ़ाया है। हाथ से नगद खर्च करते हुए मुठ्ठी का भींच जाना एक मध्यमवर्गीय परिवार के स्वभाव में होता था, लेकिन अब सब एक बराबर खड़े हो गए हैं।

हमारे दौर में जवान होती पीढ़ियां कागज की मुद्रा पर जिंदा हैं। बात-बात पर मोबाइल और इंटरनेट के सहारे लेन-देन करने की उनकी आदत है। कमाए गए पैसे इसी माध्यम से आते हैं और इसी माध्यम से चले जाते हैं। इस हवाई लेन-देन ने जहां रुपयों का अहसास छीन लिया है, वहीं उसने हमारे भीतर की संवेदना भी छीन ली है। हमारे अपनों के दर्द को अब हम अपना दर्द नहीं मानते हैं। किसी की अपने लिए की जा रही चिंता को हम उतनी ही बेमानी मानते हैं जितना कि हम किसी और के लिए करें। सुविधाभोगी समाज का विस्तार हो रहा है। बात-बात में पैसों को आगे कर दिया जाता है। किसी की पीड़ा पैसों से नहीं, उसे दिलासा देकर, उसके पास बैठ कर कम की जा सकती है लेकिन हवाई जिंदगी ने सब हवा कर दिया है। समय की कीमत सबको पता है लेकिन समय और कीमत को अलग कर देखने का नया चलन समाज में चल पड़ा है। समय अपने लिए रखते हैं और दूसरों की कीमत लगाते हैं। पांच मिनट किसी के सिर पर हाथ फेर कर जो सदियों का सुख दिया जा सकता है, वह समय हमारे पास नहीं है। हां, दर्द की दवा के लिए कीमत हमारी जेब में है। कीमत चुका कर मान लेते हैं कि हमने दर्द को छूमंतर कर दिया है। सच तो यह है कि ऐसा कर हम अपनों की पीड़ा को बढ़ा देते हैं।

इस बदलते वक्त की सच्चाई भी यही है कि अब इस जमाने में कोई चवन्नी-छाप नहीं बचा है। भारी-भरकम तनख्वाह और खर्चीले रहन-सहन से चवन्नी का कहीं दूर हो जाना एक बड़ी सच्चाई है। चलन में अठन्नी और रुपया भी है लेकिन औकात अब वह नहीं बची जो चवन्नी की होती थी। चवन्नी-छाप कहलाना तंज नहीं था बल्कि एक पहचान थी, एक ऐसी पहचान जो सीधे अपनों से जोड़ती थी। यह भी तय है कि ई-मनी ने हमें मालामाल कर दिया है लेकिन चवन्नी खोकर हम कंगाल हो गए हैं। ऐसे कंगाल जिनके पास संवेदना का कोई बटुआ नहीं है क्योंकि हर बटुए में कभी चवन्नी हुआ करती थी। अब दर्द हजार हैं, दवा बेकार है, क्योंकि किसी का कोई अपना नहीं है। ई-मनी है और संवेदनहीनता का बड़ा बाजार है। इस बाजार में सौदा-सुलुफ के लिए मैं या आप अकेले नहीं है, बल्कि इस बाजार में भीड़ बढ़ रही है क्योंकि हम सब आदमी से वस्तु में बदलते जा रहे हैं।

 

 

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