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दुनिया मेरे आगे- दीवार के पार

उस दिन भी घर से निकलना रोज की तरह ही सामान्य था। मन में कई तरह के कामों को पूरा कर लेने का संकल्प, बहुत से सपनों को पूरा करने की जुगत।

Author May 23, 2017 5:12 AM
प्रतीकात्मक चित्र।

रजनी

उस दिन भी घर से निकलना रोज की तरह ही सामान्य था। मन में कई तरह के कामों को पूरा कर लेने का संकल्प, बहुत से सपनों को पूरा करने की जुगत। सड़क पर ऐसे कई पहचाने-से अपरिचित चेहरे सामने आए जो स्कूल में छठी और सातवीं क्लास के बाद कभी नजर नहीं आए थे। उन्हें देख कर मैं जमीन पर नजरें गड़ाए चली जा रही थी, कई तरह की घटनाओं के तार जोड़ते हुए। मन में आया कि सर अब चले गए हैं दिल्ली छोड़ कर, नहीं तो उन्हें भी यह किस्सा सुनाती! रोज की तरह कई आवाजों से मिल कर बना एक स्वर मेरे कानों में गूंजा- ‘मैडम आ जाओ! भजनपुरा-भजनपुरा!’ मैं आगे निकल गई। तभी एक अठारह-उन्नीस साल का युवक मेरे सामने आ गया- ‘हां! बताओ कहां जाओगी? खजूरी?’ मैंने नजरें उस पर टिकाते हुए ‘हां’ का इशारा किया। वह अपने आॅटो की तरफ बढ़ा, मैं भी बढ़ी बैठने। मैंने आॅटो में झांका और कदम पीछे हटा लिया। आॅटो में एक ऐसा व्यक्ति था, जिसे मैं अपने मन में अचानक हुई प्रतिक्रिया के आधार पर ‘विचित्र’ की संज्ञा दूं तो शायद एक दोयम दर्जे की सोच रखने वाली शिक्षित महिला कही जाऊंगी। मुझे संवेदनहीन भी कहा जा सकता है। एक जोखिम उठाते हुए मैं उस व्यक्ति की अपने मन में बसी छवि को देखना चाहती थी। वह छवि जिसमें चौड़े और सख्त चेहरे पर एक तीखी नाक है, माथे पर लाल रंग की चौड़ी बिंदी, होठों पर गहरे लाल रंग की लालिमा, बड़ी-बड़ी आंखों में मोटा-मोटा काजल। चटख नीले रंग का कुर्ता, गहरे लाल रंग की सलवार और उस पर सरसों के पीले रंग का दुपट्टा। मुंह में सिगरेट और कान में फोन लगाए इस व्यक्ति को देख मेरे कदम पीछे हट गए। मैं उनसे यह कहती हुई आॅटो के बाहर ही खड़ी रही कि कृपया आप सिगरेट न पीएं! उन्होंने कहा कि ‘आप अंदर बैठ जाओ!’ मैं यह सोच कर आॅटो में बैठ गई कि अब सिगरेट नहीं पी जाएगी! आॅटो में मेरे अलावा दो बच्चे एक महिला और ‘वह’ व्यक्ति था।

उसके बगल में बैठी तो जैसे मेरे भीतर की हजारों कमजोर कड़ियां कांप रही थीं। बैठने के कुछ क्षण मैं इस कश्मकश में थी कि ‘मैं हूं यहां!’ यह भय कैसे घर कर गया था मेरे भीतर की संरचनाओं में, जो अब उधड़ रहा था। मैं महसूस कर पा रही थी उस ‘वे’ कहे जाने वाले व्यक्ति के ‘हम’ होने के भाव को। बचपन में अक्सर आसपास से सुन कर बड़ी ही भयानक छवि बनी थी मेरे मन में ‘उनकी’। हमेशा लगता था कि ‘ये’ ऐसे लोग हैं जो ‘हम’ जैसे नहीं हैं। मैं अक्सर उनके घर और रहन-सहन के बारे में सोचा करती थी। बचपन में कई बार भयानक सपनों में भी ‘वे’ आ जाते थे। जीवन के कम से कम बीस साल मुझे ‘वे’ कभी ‘हम’ नहीं लगे। दस साल पहले जब मैं कॉलेज में आई थी, तब ‘जेंडर एंड स्कूलिंग’ का एक पेपर पढ़ने को मिला था। उसमें पता चला कि दुनिया में कितने तरह के समुदाय हैं जो लिंग आधारित अपनी अस्मिता के सम्मान और समाज में अपनी जगह पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। वहां से मैंने जानना शुरू किया कि ‘किन्नर’ कहे जाने वाले लोगों का हमारे समाज में बहिष्कार इसलिए कर दिया जाता है कि वे समाज की संस्थाबद्ध की गई स्त्री-पुरुष की भूमिका में ‘फिट’ नहीं हो पाते हैं। बहिष्कार का यह भाव इतना मजबूत है कि राज्य की भी किसी संस्था में ‘इन्हें’ देख पाना अपने आपमें हैरानी की बात लगता है। मुझे याद है कि मैंने अपने स्कूल, कॉलेज या कार्यस्थलों पर कभी भी समाज के इस वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हुए लोग नहीं देखे। हां! परिवार में होने वाले कुछ समारोह, जैसे घर में बेटे के जन्म और उसके विवाह के अवसरों पर मैं ‘इन्हें’ देख पाती थी। उस समय अपने बड़ों से तरह-तरह की बातें सुनी थीं ‘इनके’ बारे में। बातें, जो मन में डर पैदा करती थीं। वे धारणाएं मैंने नहीं गढ़ीं थीं, जो मेरे भीतर बिठाई गई थीं।

उस दिन जब आॅटो में बैठी थी तो पढ़ने से मिली हिम्मत ही थी जो मैं अपने भीतर के कम्पन से पार पा सकी और ‘उनसे’ बात कर पाई। सिर्फ दस मिनट के उस सफर में ‘उन्होंने’ अपने बारे में बताया। मोबाइल फोन में मौजूद अपनी तस्वीरें दिखार्इं, जिसमें उनके एक मित्र थे। मुझसे पूछा कि ‘कैसी लग रही है फोटो?’ मुझे लग रहा था ये भी हम सबकी तरह हंसते हैं, घूमते हैं, अपने दोस्तों से मिलते-जुलते हैं। बस कभी हमारे बीच नहीं होते, क्योंकि हमने इन्हें अपनी तरह ‘सामान्य’ का दर्जा नहीं दिया है। कुछ पलों का हमारा साथ का सफर खत्म हो चुका था और हम अपने-अपने रास्ते निकल चुके थे। लेकिन आज भी हम दोनों की वह बातचीत मेरे चेहरे पर मुस्कान ला देती है और मन ‘मेरे’ और ‘उनके’ से परे ‘हम’ के भाव से भरा हुआ लगता है!

 

 

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