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दुनिया मेरे आगे: ताकि आंख मिला सकें

बैलगाड़ी में एक तरफ बैल और दूसरी ओर जुते हुए किसान को देख 'मदर इंडिया' फिल्म का वह साहूकार याद आया, जो मदर इंडिया की मजबूरी का फायदा उठा कर अपनी कलुषित इच्छा को पूरी करना चाहता है। वह तो सफल नहीं पाता, लेकिन..!

Author Published on: May 25, 2020 12:39 AM
गरीबी और लाचारी के आगे सब बेबस हैं।

प्रताप राव कदम
बरसों पहले पढ़ी एक मराठी कहानी इन दिनों रह-रह कर याद आ रही है। कहानी का लब्बो-लुआब यह कि एक दंपति हैं। आपस में गहरा प्रेम है उनमें। एक छोटा बच्चा भी है उनका। एक रात उनके घर में डाकू घुस गए। जितना माल था, बांधा। हालांकि पोटली में कुछ ज्यादा नहीं था। दंपति डरे हुए कोने में खड़े थे। वे जाने को हुए तो उनके एक साथी ने कहा कि इतना खतरा उठाया और माल इतना-सा ही… इनको उड़ा दो। इतना सुनना था कि दंपति की हालत खराब हो गई।

बच्चे पर रहम आया या कुछ और कि डाकुओं में से एक ने कहा कि तुम पति-पत्नी में से एक को मरना होगा… तुम तय करो कि वह कौन हो। पति और पत्नी, दोनों ने बच्चे के लिए अपनी जरूरत बताई। पति ने पत्नी को मार डालने के लिए कहा और पत्नी ने पति को।

डाकू एक दूसरे को देख मुस्कराए और कहा- ‘तुम्हें मारने की जरूरत नहीं। तुम तो पहले से ही मरे हुए हो। जहां आपस में इस तरह का संबंध हो कि एक के मरने में दूसरा अपना भला देख रहा हो, वहां प्रेम काहे का? वे तो जिंदा ही मरे के समान हैं और ऐसे मरे लोगों का सामान क्या लूटना। इसके बाद डाकू लूटा हुआ सामान वहीं छोड़ चले गए। दंपति अब आपस में नजरें नहीं मिला पा रहे थे।

क्या हम सबकी दशा आज उस दंपति की तरह नहीं हो गई है? कोरोना महामारी डाकू की तरह हमारे घर में है और हमारे चेहरे का पर्दा उतर गया है। हमारे आपसी संबंधों, सामाजिक ताने-बाने में जो वायरस घुस गया है, वह कोरोना से भी ज्यादा भयानक है? इतनी लंबी विकास यात्रा का क्या हासिल हैं… वैमनस्य, घृणा, स्वार्थ! कितना लंबा सफर अब तक हमने तय कर लिया?

कोरोना का जाना तो तय है या उससे सामना करने का तरीका हमें आ जाएगा, लेकिन जब हम अपने भीतर झांकेंगे, तब क्या हम एक दूसरे से आंख मिलाने की स्थिति में होंगे? सामन्य स्थितियों में नहीं, असामान्य स्थितियों में आदमी, समाज और देश की पहचान होती है। इन दिनों घट रही घटनाएं हमारे चहरे से नकाब हटा रही है। हमारे मनुष्य होने पर प्रश्नचिह्न लगा रही हैं।

एक मोहल्ले में एक सब्जी वाला आवाज लगाता हैं। चार लोग उसे घेर कर उसका नाम पूछते हैं। फिर एक चीखता है कि तू इधर दिखना भी मत। नहीं तो तेरी टांग तोड़ देंगे। वह सब्जी वाला किसी तरह जान बचा कर वहां से निकलता है। इससे संबंधित संदेश हर मोबाइल में झांकने लगते हैं। कुछ इसे महिमामंडित भी करते हैं।

एक स्कूल में ठहरे है दसियों लोग। शासन वहीं उनके खान-पान की व्यवस्था करता है। खाना बनाने वाली किस जाति की होगी? दो युवक खाने से मना कर देते हैं। उधर सड़क पर सिर पर पोटली, कांख में बच्चा टांगे महिला, कुछ के पैरों में चप्पल, कुछ के पैरों में वह भी नहीं, सब चले जा रहें है बदहवास से।

कितने हैं? कोई गिनती नहीं। कहां गिर पड़ रहें हैं, कोई खबर नहीं। एक कहता है मत जाने दो इन्हें अपने गांव, इधर काम कौन करेगा फिर! यह सब जानते है कि उत्पादन के साधनों में सबसे जीवित साधन श्रम ही है। लेकिन उसकी मोलभाव करने की शक्ति कम होती है। कभी आप शहर की श्रम मंडी गए हैं? सुबह सात बजे से वहां चहल-पहल शुरू हो जाती है।

एक ठेकेदार आता है, मजदूरों का हुजूम उसे घेर लेता है। ठेकेदार कहता है कि दस मजदूरों की जरूरत है, इतना मिलेगा। कोई नहीं कहता कि सरकारी दर तो कहीं अधिक है। ठेकेदार कहता है कि दोपहर में खाने के तुरंत बाद काम शुरू होगा, शाम को घर जाने की जल्दी नहीं, कहीं कोई सवाल नहीं! दृश्य में पटरियों के पास बिखरी रोटियां उभरती है। गिट्टियां हैं, सीमेंट कंक्रीट के स्लीपर हैं, लोहे ही पटरियां हैं। इन सबको बनाने में श्रम ही लगा है, रोटियों की खातिर।

एक जगह हैंडपंप से पानी पीते हुए एक व्यक्ति से कुछ छीटें वहां रखे बर्तनों पर गिर गए। जाति-घृणा के दंश ने यहां भी मुंह काढ़ा। जिन्होंने पानी पिया था, उन्हें पेशाब पीने को मजबूर किया। जिसके साथ यह सब घटा, उसने आत्महत्या कर ली। इनकी गिनती कहां है? बैल किसान के खेत की जरूरत ही पूरी नहीं करते, उसकी गृहस्थी की गाड़ी भी खीचतें है।

बैलगाड़ी में एक तरफ बैल और दूसरी ओर जुते हुए किसान को देख ‘मदर इंडिया’ फिल्म का वह साहूकार याद आया, जो मदर इंडिया की मजबूरी का फायदा उठा कर अपनी कलुषित इच्छा को पूरी करना चाहता है। वह तो सफल नहीं पाता, लेकिन..!

क्या ये महज घटनाएं हैं? क्या कोरोना ने हमारा नकाब नहीं उतार दिया है? हमारे इस आवरण के नीचे कितना संकीर्ण आदमी बैठा हुआ है? यह महामारी भी अपनी नियति को पाएगी ही, लेकिन उसके जाने के बाद हम एक दूसरे से आंख मिला सकें, ऐसी स्थिति रहें तो यह हमारे लिए, समाज के लिए, देश के लिए बेहतर होगा।

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