ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगे: संवादहीनता का सन्नाटा

संवाद के अभाव में परिवारों में अवसाद का अंधेरा भर रहा है। जरूरी है कि जैसे भी हो, आपसी संवाद बना रहे। बुजुर्गों और बच्चों को भी सुबह-शाम पार्क में जाना चाहिए, मिल बैठकर आपस में बातचीत करना उन्हें अच्छा लगेगा।

घरों और समाज में बढ़ती संवादहीनता ने एक साथ रहकर भी सबको अलग कर दिया है।

घर में सन्नाटा था। देखने गई थी। मिली थी उनसे। बहुत देर तक बात नहीं हो सकी। फिर उन्होंने बताया, अवसाद हो गया है। कुछ भी अच्छा नहीं लगता। भूख भी मर गई है। एक अंधेरा-सा घिर गया है जीवन में। बच्चे दोनों बाहर चले गए थे। दोनों अकेले रह गए थे। पत्नी अवसादग्रस्त थी। पति परेशान थे।

यह स्थिति केवल इस दंपत्ति की नहीं है। आज अनेक बुजुर्ग घर में अकेले रह गए हैं। बच्चे बाहर रह रहे हैं। आश्चर्य तब हुआ था जब पता चला कि चौदह-पंद्रह वर्ष का छात्र अवसादग्रस्त था। उसके माता-पिता परेशान थे। मनोवैज्ञानिक चिकित्सक के पास लेकर आए थे। पर क्या यह किशोर बालक अकेला था? यहां भी पता चला कि आज की किशोर और युवा पीढ़ी में भी अवसाद की स्थिति बढ़ रही है। अभी एक सर्वेक्षण के अनुसार जहां अकेले रहने वाले चालीस प्रतिशत बुजुर्ग अवसादग्रस्त हैं, वहीं एकल परिवारों में बारह-तेरह प्रतिशत युवा और किशोर अवसाद ग्रस्त हो रहे हैं।

घर में सब कुछ है। सारी सुविधाएं हैं। बुजुर्गों को उनके बच्चे पैसे भेजते हैं। फोन करते हैं। साल दो साल में आते भी हैं। घर में युवा और किशोर बच्चे अच्छे पब्लिक स्कूलों में पढ़ रहे हैं। वे जो चाहते हैं उन्हें मिल जाता है। उनकी मांगें पूरी होती हैं। मां-बाप ने इन्हें सारे सुख दिए हैं। मोबाइल है, टीवी है, आने जाने के लिए गाड़ी है, ड्राइवर है। पर फिर भी ये अवसादग्रस्त हैं।

हमारी पीढ़ी में घरों में चार-छह बच्चे आम बात होती थी। अच्छे मध्यवर्ग के परिवारों में मां-बाप उन्हें स्कूलों, सरकारी स्कूलों में पढ़ाते थे। सब साथ मिलकर जो बनता था खाते थे। आपस में लड़ते-झगड़ते, पर खेलते-कूदते थे। घर में कभी कोई चीज मिलती भी नहीं थी। नाराज होते, पर सब ठीक था। बच्चे बीमार होते थे, पर कभी अवसादग्रस्त हों, ऐसा कभी नहीं था। पर आज ऐसा क्या हुआ? वास्तव में बीच का संवाद खत्म हो गया। पहले आस-पड़ोस में आना-जाना, लेना-देना, मिल बैठ कर बतियाना, घर-बाहर की बातें करना आम बात थी। बालकनी में, छत पर, शाम को बाहर औरतें आपस में बतियाती थीं। हर तरह की, घर, बच्चों, पतियों की बातें करती थीं। किसी के घर में कोई विशेष व्यंजन बनता तो पड़ोस में दिया जाता। फिर उस पर चर्चा होती। अब ऐसा नहीं रहा।

सब अपने में सिमट गए। गांवों में चौपाल होती थी। शाम को सभी वहां इकट्ठा होते थे। आपस में बातचीत होती। कोई भी समस्या होती, तो उसे सबके सामने रखा जाता। उस पर बातचीत होती और कोई न कोई समाधान ढूंढ़ लिया जाता। गांवों का शहरीकरण हुआ। अब शहरों का विदेशीकरण हो गया। मध्यवर्ग में परिवारों में सत्तर-पचहत्तर प्रतिशत बच्चे बाहर पढ़ने के लिए चले गए हैं या जा रहे हैं। जो गए थे, उनमें से भी पचास से साठ प्रतिशत बच्चे वहीं रहने लगे हैं। पीछे बचते हैं, बुर्जुग माता-पिता। उनके पास सुविधाओं, पैसों की कमी नहीं। घर में संपन्नता है, पर अकेलापन है। वही अकेलापन उन्हें भीतर से खोखला कर देता है। वे अवसादग्रस्त हो जाते हैं।

एक तरह की ‘अड््डेबाजी’ या ‘मोहल्लेबाजी’ भी जरूरी होती है। जहां आपस में मिल बैठ कर बतियाया जा सके। किसी भी विषय पर बातचीत की जा सके। इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में मैं देखती थी कि कुछ लोग सुबह से शाम तक, कुछ दोपहर से देर शाम तक बैठे रहते हैं। ज्यादातर उनमें बुजुर्ग पीढ़ी के लोग हैं। उनमें राजनीतिज्ञ हैं, पत्रकार हैं, आईएएस, आईएफएस, सभी क्षेत्रों के लोग हैं। वे आपस में विभिन्न विषयों पर चर्चा करते हैं, चाय पीते हैं। लोदी गार्डन में शाम को घूमते हैं। रात को घर पहुंचते हैं। पहले समझ नहीं आता था। धीरे-धीरे जाना कि यह संवाद, आपस में मिलजुल कर बैठना, बतियाना, चाय-कॉफी पर चर्चा करना कितना जरूरी है जीवंतता के लिए। यह उनमें ऊर्जा भरता है। उन्हें अकेलेपन से बचा कर रखता है।

इस संवाद के अभाव में परिवारों में अवसाद का अंधेरा भर रहा है। जरूरी है कि जैसे भी हो, आपसी संवाद बना रहे। बुजुर्गों और बच्चों को भी सुबह-शाम पार्क में जाना चाहिए, मिल बैठकर आपस में बातचीत करना उन्हें अच्छा लगेगा।

अब भी कुछ तो करना होगा। जैसे भी हो संवाद बनाए रखना जरूरी है। जब भी अकेलापन लगे, अकेले नहीं रहना चाहिए। बाहर निकल कर किसी से भी बात करना या बाजार में भीड़ में चले जाना भी एक उपाय है। मॉल में जाने वालों में सभी पीढ़ी के लोग होते हैं। अधिकतर युवा हैं। आश्चर्य हुआ यह जान कर कि उनमें से भी कुछ अकेलेपन से बचने के लिए, अवसाद से बचने के लिए मॉल में आते हैं। उन्हें खरीदारी नहीं करनी होती। बस इधर-उधर घूम कर भीड़ का हिस्सा बन कर वे अच्छा अनुभव करते हैं। जो भी, जैसे भी हो, जानकारी और समझदारी से अवसाद से निस्तार पाना संभव है। यह जानकारी साझा भी की जानी चाहिए।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 दुनिया मेरे आगे: खुली खिड़कियों से आती बयार
2 दुनिया मेरे आगे: गौरैया का आना
3 दुनिया मेरे आगे: बात में बीज है
यह पढ़ा क्या?
X