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दुनिया मेरे आगे: सहजीवन की दस्तक

इन दिनों इंसानी हस्तक्षेप कम होने से प्रकृति फिर से समृद्ध हो रही है। वन्य जीवों का मानव आबादी में बेखौफ भ्रमण इसका प्रमाण है। कोरोना वायरस के इस दौर ने हमें दिखाया है कि इंसानों का दखल बंद होने पर प्रकृति ने खुद को संभाल कर फिर से स्वयं को समृद्ध करना शुरू कर दिया है।

गांव में घुसे टाइगर (फाइल फोटो)

आलोक यात्री
इन दिनों सामाजिक प्राणी कहा जाने वाला इंसान जब घर की चारदीवारी में कैद है, वन्य प्राणी शहरों के भ्रमण पर हैं। उनका शहरों की तरफ आना इस बात का संकेत है कि हमने उनके इलाके में घुसपैठ की है, उनके ठिकानों पर कब्जा किया है, जिसे वे भूले नहीं हैं। मानव और वन्य जीवों के बीच सहजीवन का जो बंधन लुप्त हो गया था वह एक बार फिर प्रकृति के साथ संधि करता नजर आ रहा है। कोरोना की चपेट में आई दुनिया की बहुत बड़ी आबादी बंदी के चलते घरों में कैद है। मानव गति के तमाम पहिए अवरुद्ध हैं। गांव-देहात के गली-मोहल्लों से लेकर कस्बे, शहर, महानगर की तमाम सड़कें सन्नाटे की चादर ओढ़े बैठी हैं।

चौबीसों घंटे आपाधापी का पर्याय शहर सुप्तावस्था में हैं। विज्ञान साबित कर चुका है कि धरती पर मानव गतिविधियों की धमक ब्रह्मांड में भी महसूस की जाती है। यह धमक मानव को छोड़ कर धरती पर विचरण करने वाले हर प्राणी के लिए खतरे की घंटी है। बीते बीस-बाईस दिनों से खतरे की यह घंटी भी स्थगित है। इसके विपरीत शहरों में पसरे सन्नाटे की प्रतिध्वनि जंगलात तक जा पहुंची है। इसी का नतीजा है कि नोएडा, हरिद्वार, चंडीगढ़ सहित देश के कई इलाकों में वन्य प्राणी शहरों में चहलकदमी करने चले आए हैं।

भारतीय वन सेवा के अधिकारियों ने इन वन्य जीवों के वीडियो साझा किए हैं, जिनमें विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुके कस्तूरी बिलाव का वीडियो भी शामिल है। कस्तूरी बिलाव आखिरी बार 1990 में देखा गया था। यह जीव गंभीर रूप से खतरे में है और अब कुल ढाई सौ वयस्क बिलाव ही दुनिया में बचे हैं। एक अन्य वीडियो में देहरादून की सड़क पर रात के समय चीतल दौड़ता दिख रहा है। एक वीडियो में चंडीगढ़ में सड़क पर सांभर हिरण तो दूसरे में तेंदुआ गश्त लगा रहा है। इस दौरान ओड़िशा की ऋषिकुलया नदी में दुर्लभ प्रजाति के आलिव रिडले कछुओं का देखा जाना भी एक सुखद दृश्य है। वन अधिकारियों को वहां दुर्लभ प्रजाति के अलबीनो कछुआ भी मिले हैं।

इन दिनों इंसानी हस्तक्षेप कम होने से प्रकृति फिर से समृद्ध हो रही है। वन्य जीवों का मानव आबादी में बेखौफ भ्रमण इसका प्रमाण है। कोरोना वायरस के इस दौर ने हमें दिखाया है कि इंसानों का दखल बंद होने पर प्रकृति ने खुद को संभाल कर फिर से स्वयं को समृद्ध करना शुरू कर दिया है। वन्य जीवों को प्रदूषण से निजात मिलना भी इसकी एक वजह हो सकती है। इससे साबित हो गया है कि सरकार ने जंगलों को सिर्फ कारोबार के मकसद से इस्तेमाल किया है। जानवरों के न पर्याप्त भोजन की चिंता की गई, न ही उनके अस्तित्व और पुनर्वास के बारे में विचार किया गया।

उत्तर भारत में मानव विकास की गाथा संभवत: सबसे पहले गंगा और यमुना नदी के बीच के भू-भाग पर ही लिखी गई होगी। यह पूरा भू-भाग अरावली और शिवालिक पर्वत शृंखला के बीच आता है। दिल्ली के आसपास की अरावली और शिवालिक पर्वत मालाओं के अस्तित्व की गाथा महाभारत में भी देखने को मिलती है। अरावली पर्वत शृंखला करीब सात सौ किलोमीटर तक फैली हुई है। यह संसार की प्राचीनतम पर्वत शृंखलाओं में से एक है। यह पर्वतमाला भारत के राजस्थान, हरियाणा, गुजरात के अलावा पाकिस्तान के पंजाब और सिंध प्रांत से होकर गुजरती है।

अरावली के जंगलों में प्रमुख रूप से चीता, बाघ, लकड़बग्घा, तेंदुआ, लोमड़ी, सियार, नेवला, जंगली वराह, काला हिरण, नीलगाय थे। पक्षियों की विभिन्न प्रजातियां भी यहां पाई जाती थीं। इलाके में मुगल सम्राटों की शिकारगाहों के प्रमाण भी मिलते हैं। फिरोज शाह तुगलक के काल में यहां चार शिकार महलों- मालचा महल, कुश्क महल, भूली-भटियारी का महल और गालिब का महल के प्रमाण भी मिलते हैं।

दिल्ली के आसपास और उत्तर भारत की दूसरी प्रमुख पर्वतमाला शृंखला हैं- शिवालिक। इसका विस्तार उत्तराखंड से लेकर नेपाल तक है। जिम कार्बेट नेशनल पार्क भी इसी इलाके में आता है। इस पर्वत शृंखला को सबसे युवा पहाड़ी शृंखला माना जाता है। इस पर्वत शृंखला को हिमालयी क्षेत्र के रूप में भी जाना जाता है। इस क्षेत्र में जिराफ और दरियाई घोड़े जैसे अफ्रीकी जानवर पाए जाने के प्रमाण भी मिलते हैं। हाथी, गैंडा, हिरण, तेंदुआ, भालू, लंगूर, हंगुल, याक और लाल पांडा भी यहां पाए जाते थे।

अरावली और शिवालिक पर्वत शृंखला के बीच के जंगलात का एक बड़ा भाग मानव बस्तियों ने पाट दिया है। बचे हुए हिस्से को मानव अपने खाद्यान्न के लिए इस्तेमाल कर रहा है। अरावली पर्वत शृंखला में वन्य प्राणियों की मौजूदगी नगण्य ही रह गई है। अब जबकि बंदी के दौरान वन्य प्राणी अपने आसरे की तरफ लौट रहे हैं, तो हम इंसानों को भी सहअस्तित्व की अवधारणा और प्रकृति और पारिस्थितिकी से संतुलन कायम करने पर नए सिरे से विचार करना होगा।

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