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‘दुनिया मेरे आगे’ कॉलम में उमेश प्रताप सिंह का कॉलम : हंसब ठठाइ फुलाइब गालू

हमारे समाज में धनबल और बाहुबल का सम्मान सबसे ऊंचे आसन पर विराजमान है। हमारे समय की बुद्धिजीविता गरीबों के पक्ष में बोल-लिख कर धनी बनने के रास्ते की तलाश में लगी है।

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ठठा कर हंसना और गाल भी फुलाए रखना, यह एक साथ संभव नहीं है। तुलसी की कविता अपने समय में इस असंभावना को पूरी शक्ति के साथ संभव बनाने की जद्दोजहद में लथपथ है। हमारा समय असंभावना को साधने की निष्फल क्रियाओं का समय है क्या? शायद हां। ‘हां’ कहते हुए बड़ी पीड़ा होती है। अपार अवसाद घेर लेता है। फिर भी मैं कहता हूं- ‘हां’। हमारा समय बड़ा अजीब समय है। हम जो कहना चाहते हैं, कह नहीं पाते। कुछ बोलने के लिए खड़े होते हैं, मगर कुछ और बोल कर बैठ जाते हैं। हमें सुनने के लिए जो खड़े होते हैं, हम उनके लिए, बल्कि उनके लिए बोलने लग जाते हैं, जो हमें सुन नहीं रहे होते हैं। हम हर बार धिक्कार लिखने के लिए कलम उठाते हैं और हर बार धन्यवाद लिख कर रख देते हैं। पता नहीं ऐसा क्यों है!

हमारे समय की सबसे बड़ी समस्या यह है कि हमने समस्या की जगह समस्या की प्रतिमाएं गढ़ ली हैं। इन प्रतिमाओं के पीछे हम खुद को छिपाने के लिए खड़े हैं। दूर से समस्या के बारे में सोचना हमारी सबसे बड़ी समस्या है। हम समस्याओं के समाधान की जगह उनके विस्तार के आयोजक बन जाते हैं। ऐसा इसलिए है कि हमारे उपक्रम में ही गड़बड़ी है। कीड़े जड़ में घुसे हैं। दवा हम पत्तों पर छिड़क रहे हैं।

हम सारी बातों पर बहस करते हैं, मगर अपनी अभीप्सा के बारे में कोई बात नहीं करते। अपनी चाहतों के बारे में कभी कोई बात नहीं करते। हमें इस बारे में बात करते डर लगता है। अपने पाखंड के प्रगट हो जाने का डर लगता है। इससे बचने के लिए हम दूसरी बातें करने लग जाते हैं। अपने देश की आजादी के बाद हमने कभी अपनी अभीप्सा के बारे में गंभीरता से सोचा ही नहीं, वह चाहे व्यक्तिगत हो या सामाजिक, नागरिक और राष्ट्रीय। आज हम देख रहे हैं कि जाने-अनजाने हम दोहरी अभीप्सा के वारिस बन चुके हैं। हमारी समूची अभीप्सा सिर्फ छल की अभीप्सा बन कर रह गई है। हमारा समूचा राष्ट्रीय चरित्र छद्म और छल का चरित्र बन कर बन कर रह गया है।

बड़ा विचित्र है। हम जो कुछ कर रहे हैं, परिणाम उसका उलटा मिल रहा है। जबसे नैतिक शिक्षा को पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया गया है, समूची शिक्षा-व्यवस्था अनैतिक बन गई लगती है। जबसे हमारे पाठ्यक्रम में राष्ट्रगौरव का पर्चा शामिल किया गया है, तबसे हमारा राष्ट्रगौरव और अधिक धूल चाट रहा है। हमारे समय में अधिसंख्य विद्यार्थी बिना कुछ भी पढ़े अधिक से अधिक अंक पाने के आकांक्षी बने हुए हैं। हमारे समय का हर आदमी अमीर और धनी हो जाने की दौड़ में आंख पर पट्टी बांध कर दौड़ रहा है।

हमारे समाज में धनबल और बाहुबल का सम्मान सबसे ऊंचे आसन पर विराजमान है। हमारे समय की बुद्धिजीविता गरीबों के पक्ष में बोल-लिख कर धनी बनने के रास्ते की तलाश में लगी है। हमें चोरी या भ्रष्टाचार से नाराजगी नहीं रह गई है। हमारी समूची राजनीति केवल सत्ता पर कब्जा जमाने की राजनीति है। हमारे समय में आदमी, आदमी नहीं महज एक वोट है। हमारे समय में हमारी अभीप्सा ईमानदार दिखते हुए बेईमानी की हर तरकीब से अपने को बेहद समृद्ध और शक्तिशाली बना लेने की अभीप्सा है। हम कोई भी निर्माण अपने वर्चस्व के लिए करने के आकांक्षी हैं। हम अपनी राष्ट्रभक्ति को इस रूप में पेश करने को उत्सुक हैं कि दूसरों को राष्ट्रद्रोही ठहराया जा सके।

हम दलन के विरुद्ध चिंतन के पक्ष में नहीं हो पाते। हम दलित-हित के बारे में अपने चिंतन को प्रचारित करने के पक्षधर हैं। हम उनकी सहानुभूति और उनके सहयोग से अपनी अभ्युन्नति के लिए उनके पक्ष में बोलते हैं। स्त्री-उत्पीड़न के विरुद्ध भी हम शायद इसीलिए आवाज उठाते हैं। हमारा सारा आचरण छल का आचरण बन गया है। हमारा साहित्य, जो लिखना है, नहीं लिख पा रहा है। जो नहीं लिखना है, लिख रहा है। पता नहीं क्यों? हमारी भर्त्सना और हमारा अभिनंदन एक जैसा बन गया है।

आज हमारे समाज में बड़प्पन और सम्मान के जो मानदंड हैं, वे संविधान के विरोधी हैं। हमारे समय और समाज में राष्ट्र को कमजोर करने वाले कृत्यों का मूल्य और महत्त्व बढ़ता जा रहा है। आज अपनी जगह पर कोई नहीं है। जो शिक्षा, सेवा के क्षेत्र में हैं, वे ठेकेदारी कर रहे हैं। जो व्यापार में हैं, वे राजनीति कर रहे हैं। जो राजनीति में हैं, वे व्यापार कर रहे हैं। हम प्रतिपक्ष में दिखते हुए सत्ता के सुख भोग के आकांक्षी है। हम अपने विरोध के लिए पुरस्कार पाने की लालसा के अनुचर हैं। हम गाल फुला कर ठट्ठा मार हंसने की असंभावना के अभ्यासी हैं। हम एक असंभव के लिए अभ्यास में लीन हैं। नहीं, यह कभी नहीं सधेगा। हमें खुद से पूछना होगा- हम हंसेगे या गाल फुलाए बैठे रहेंगे!

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