ताज़ा खबर
 

‘दुनिया मेरे आगे’ कॉलम में शचींद्र आर्य का लेख सुविधाओं के टापू

नींद में था। अब भी उबासी आ रही है। लेटने से पहले बस यही सोच रहा था कि हम ही लोग तो थे, जो यहां आते थे, तब ‘लाइट-लाइट’ चिल्लाते थे। आज जब यही लाइट यानी बिजली यहां गांव में रहने वाले सभी लोगों को हमारे मुताबिक नहीं ढाल रही, तब परेशानी हो रही है। […]

फाइल फोटो

नींद में था। अब भी उबासी आ रही है। लेटने से पहले बस यही सोच रहा था कि हम ही लोग तो थे, जो यहां आते थे, तब ‘लाइट-लाइट’ चिल्लाते थे। आज जब यही लाइट यानी बिजली यहां गांव में रहने वाले सभी लोगों को हमारे मुताबिक नहीं ढाल रही, तब परेशानी हो रही है। परेशानी बिजली की प्रकृति में नहीं है। वह तो मूलभूत रूप से वैज्ञानिक उपकरणों को चलाए रखने वाली ऊर्जा है। परेशानी है इसके पूंजीवादी चरित्र में। यह बिजली इन सबको बड़े महीन तरीके से उपभोक्ता में तब्दील कर रही है।
इसे सीधे-सीधे कहना बहुत कुछ न कहने जैसा है। हमें यहां पल भर से कुछ ज्यादा ही ठहरना होगा और समझना होगा कि इनकी जिंदगी में बिजली के आने पर इनके कौन-कौन से काम में गुणात्मक परिवर्तन आया होगा! हमें उसकी गंभीरता से सूची बनानी होगी। पहले कौन-से काम बिल्कुल नहीं हो पा रहे थे या उनमें जो ‘अमानवीयता’ के गुण थे, वे बिजली के आने पर बिल्कुल नेपथ्य में चले गए। दूसरी तरफ, उन कामों, जरूरतों, अनावश्यक इच्छाओं में वृद्धि हुई, जिससे इनके जीवन से सहजता चली गई।

यहां खुद से महत्त्वपूर्ण सवाल यह पूछा जा सकता है कि ऐसी सूची का निर्माण हम गांव के संदर्भ में ही क्यों कर रहे हैं? शहर में आवश्यकता, जरूरत, इच्छा-अनिच्छा का प्रश्न क्यों हम लोग नहीं पूछ पा रहे? ये सवाल वहां क्यों गैरजरूरी लगते हैं? शायद यह हमारी तंगनजरी होगी या ऐसा ही कोई और सवाल इसके बीच से निकल कर आएगा। शहर की जो छवि हमारे अंदर है, क्या वह वैसी ही है, जैसे शहर हमें वहां नजर आते हैं? उनमें भी तो कितनी गुंजाइश बची रह गई होगी! वहां हम इन संभावनाओं को क्यों टटोलने से घबराते हैं? या यह उनकी त्रासदी मान कर हम उन्हें ऐसे ही छोड़ देना चाहते हैं! या फिर शहर वह प्रयोगशाला है, जहां सभी चीजों को देख-परख कर आंका जाता है और तब इन अंचलों में प्रवासियों द्वारा लाया जाता है! क्या बात दोतरफा है और गांव से भी प्रयोग होकर शहर बन रहे होंगे?

जो बात नींद में दिमाग में घूम रही थी वह यह कि टीवी का आविष्कार अगर वैज्ञानिक उपलब्धि माना जाए, तब इसमें ऐसा क्या गुण था कि इसकी व्याप्ति हमें समाज में हर तबके तक आसानी से दिख जाती है! इसे तकनीक का ‘लोकतंत्रीकरण’ नहीं कह सकते, पर अभी इससे अच्छा शब्द नहीं मिल रहा। लेकिन फिर ऐसी कौन-कौन वैज्ञानिक उपलब्धियां हैं, जो इतनी सरलता से समाज में व्याप्त हैं और उनकी उपस्थिति प्रकट हो जाती है। सड़क, रेल, बस- सब एक तरह के आविष्कार दिख रहे हैं, जो किसी स्तर पर इंसानियत को गुलाम बनाने की तरफ ले जाते हैं। उपनिवेश एक सही शब्द है। या गलत भी हो, तब भी यहां सही लग रहा है! विज्ञान ने हमें किसी शहर, अतृप्त इच्छा या किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी के उत्पाद का शासित बना कर रख छोड़ा है और उन तकनीकों को ‘लोक’ में व्याप्त नहीं होने दिया, जो जीवन को और बेहतर बना सकती थीं। वे वहां जीने लायक संभावनाओं को बचाए रखतीं। उलटे उसने ऐसी जीवनरक्षक प्रणालियों, दवाओं, आरामदायक बेहतर खोजों को एक खास तबके के लिए बचा कर रखा हुआ है। विज्ञान तो आजाद करने का जरिया होना चाहिए!

यह मामला सिर्फ जीवन को बेहतर करने के लिए तकनीक के इस्तेमाल का नहीं, बल्कि उसके ऊपर कब्जे का भी है। कल्पनाएं इस तरह एक सबल, सशक्त उपभोक्ता के सपनों का संसार निर्मित करती हैं। जीवन भी खरीदा जाने लगता है। उनका उद््देश्य उसे समाज में नहीं फैलने देना है। ये सुविधाओं के टापू हैं।

हो सकता है, पहली नजर में ये स्थापनाएं बहुत सतही लगें। लेकिन आप अपने चारों तरफ नजर घुमा कर देखिए। नजर में कुछ होगा जो चुभ जाएगा। ये अपनी-अपनी रिक्तताओं, आवश्यकताओं, अवकाशों के अभावों के परिणामस्वरूप हमें दिखने लगेंगी। अभाव है उस खास भाषा का, जिसमें उन्होंने ज्ञान को संरक्षित करके रख दिया है। अगर हमारे बच्चे उन निजी विद्यालयों में नहीं गए और उन खास तरह के विषयों को नहीं पढ़ पाए, तब तक इस संरचना को तोड़ पाना संभव नहीं लगता!

हमारी जरूरतों का सवाल इतना सरल और एकरेखीय नहीं है। वह इस शिक्षा तक होते हुए हमें यहां लाकर रख छोड़ता है, जहां हम कुछ करने लायक नहीं रहते। हमारे ही सामने विकास के नए पैमाने गढ़े जाते हैं। हम यह भी नहीं कह पाते कि हम अभी विकसित नहीं हुए हैं। हम कभी इस विकास के भागीदार भी नहीं बन पाते। हमें इसमें अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए अपनी जरूरतों को उस सत्ता तक पहुंचाना है, जहां अगर सड़क है, तब उससे थोड़ी जिंदगी, तो गांव भी चली आए। हमें बस यह ध्यान रखना है, इसकी ध्वनियां कहीं आगे तक जाएंगी। हमें बस उन्हें लगातार सुनते रहना है।

Next Stories
1 ‘दुनिया मेरे आगे’ कॉलम में क्षमा शर्मा का लेख : परंपरा में प्रकृति
2 ‘दुनिया मेरे आगे’ कॉलम में उमेश प्रताप सिंह का कॉलम : हंसब ठठाइ फुलाइब गालू
3 दुनिया मेरे आगेः आभाषी दुनिया के दंश
ये पढ़ा क्या?
X