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‘दुनिया मेरे आगे’ कॉलम में रजनी का लेख : छवियों के पार

मैं तब खुद भी नहीं जान पाई कि ऐसा क्या था उनमें जो मेरी दृष्टि रुक गई थी उन पर। खैर, वहां रोज दिन खत्म होता और शाम को सब लोग चाय पीने के लिए कैंटीन में आते।

Author नई दिल्ली | June 15, 2016 4:12 AM
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राजनीतिक मोर्चेबंदी को छोड़ दें तो कश्मीर का नाम सुनते ही सबसे पहले दो चीजें दिमाग में आती हैं। एक, असीम प्राकृतिक सौंदर्य, दूसरा है एक प्रकार का ‘खिंचाव’, जिसे कई बार ‘तनाव’ के रूप में भी देखा जा सकता है। आजादी के बाद से जिस तरह कश्मीर का राजनीतिकरण किया गया, उसे शायद ही कोई समझने से इनकार करेगाा। बचपन से ही फिल्मों, अखबारों और किताबों में कश्मीर को लेकर जो भी जाना, उसमें हमेशा से कश्मीर मेरे लिए एक मुद्दा ही रहा। वह मुद्दा जो विवादित है, जिसमें विवादों, तनावों, भय और आतंक का समावेश है। मैं नहीं जानती कि कश्मीर को लेकर यह छवि मेरे मन ने कब गढ़ ली! किसने क्या किया कि यह छवि मेरे मन में बैठी! वह छवि, जिसमें बसा है कश्मीर का सफेद सौंदर्य! छवि जिसमें बसा है भय और तनाव।

सवाल है कि यह भय या डर किससे है? क्या उस जगह से, या वहां के लोगों से? या फिर उन तस्वीरों से जो तमाम तरह के राजनीतिक प्रपंच ने गढ़ी है मेरे मन में! मन की संरचनाओं में ये गढ़ी हुई छवियां उस वक्त मेरे सामने चेतन रूप से उजागर हुई जब मैं पिछले महीने अकादमिक कार्यशाला के सिलसिले में पश्चिम बंगाल स्थित एक केंद्रीय विश्वविद्यालय में गई। इसमें देश के अलग-अलग राज्यों के कॉलेजों की छात्राओं और छात्रों ने हिस्सा लिया। इनमें चार विद्यार्थी कश्मीर से थे और अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी में पढ़ते थे। पहले दिन जब हम कार्यशाला में पहुंचे तो सभी का आपस में परिचय कराया गया। इसी दौरान ही हमने अपने उन चार साथियों को देखा जो एक समूह बनाए हुए हमसे दूर तीसरी पंक्ति में खड़े थे। जब मैंने यह सुना कि वे कश्मीर से हैं तभी से मेरी नजर थोड़ा ठहर गई उन पर।

मैं तब खुद भी नहीं जान पाई कि ऐसा क्या था उनमें जो मेरी दृष्टि रुक गई थी उन पर। खैर, वहां रोज दिन खत्म होता और शाम को सब लोग चाय पीने के लिए कैंटीन में आते। किसी प्रकार की चेतस अवचेतना से निर्मित तीस लोग छोटे-छोटे समूहों में बंट चुके थे। इन समूहों एक प्रकार की अमूर्त लगने वाली मूर्त सामाजिक संरचना विद्यमान थी, मसलन मोटे तौर पर एक विभाजन लड़के और लड़कियों का था। दूसरा विभाजन लड़कियों के समूह में समान धर्म, भाषा और क्षेत्र को लेकर था। इसी प्रकार लड़कों में भी इसी तरह के समूह बन गए थे। मैं और मेरी एक मित्र बहुत ही उत्साहित थे सबसे बात करने के लिए, इसलिए हमने यह करना शुरू कर दिया। लेकिन कश्मीर के वे चार विद्यार्थी कैंटीन के एक दूसरे कोने में एक साथ बैठ कर चाय पी रहे थे। मेरा और मेरी दोस्त का ध्यान इस पर गया। मेरी ओर एक नजर भर देख कर मेरी मित्र ने मुझसे कहाा कि ‘ये लोग कितने अलग हैं सभी से! किसी से बात ही नहीं कर रहे हैं। हम भी सबसे बात कर रहे हैं, पर उनसे बात नहीं कर रहें हैं’! इस पर मैंने उससे कहा कि ‘हां! हमें उसने भी तो बात करनी चाहिए न! कहीं उन्हें ऐसा न लगे कि कोई उन लोगों से बात ही नहीं कर रहा है। यों ये अपनी ओर से किसी से घुलने-मिलने की कोशिश क्यों नहीं करते!’ इतना कहते ही मन में कुछ कौंध-सा गया।

एक पल ठहर कर मैं अपने आखिरी एक वाक्य पर पुनर्विचार करने लगी। इसने मुझे मेरे भीतर बसी उस संरचना को देखने पर मुझे मजबूर किया कि कहीं यह विचार मेरे खुद में बसे बहुसंख्यक होने के भाव से तो प्रेरित नहीं हैं! क्या वाकई वे लोग खुद ही किसी से बात नहीं करना चाहते? या फिर इस एक दृश्य के पीछे बहुत लंबा इतिहास है। एक ऐसा इतिहास जो उन्हें एक अलग कोने में समेट रहा है! वह इतिहास जो मुझे उनके लिए ‘वे’ और अपने लिए ‘हम’ संबोधित करने के पीछे है। बीस-बाईस साल की ‘सर्वधर्म समान’, ‘निरपेक्ष’ और किन्हीं अर्थों में ‘विचारशील’ कही जाने वाली शिक्षा क्या मेरे भीतर की इन धारणाओं की संरचना को टटोलने में सहायक हो पाई है? या कोने में बैठे उन साथियों ने अपने भीतर की इन संरचनाओं को टटोला होगा! अपने भीतर की इन छवियों का गाढ़ापन क्या हम देख पाते हैं कभी, जब तक कि हमारे भीतर कोई ऐसा अहसास न हुआ हो! उन दस दिनों के दौरान मैंने अपने भीतर की कई गहरी गाढ़ी छवियों को महसूस किया। छवियां जिनका निर्माण शायद मेरे जन्म के साथ ही शुरू हो गया था!

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